एक वक्त था जब महेमान आते थे तो सारा परिवार खुश हो जाता था,साथ ही पडोशी भी खुश होते थे,पूरे महोल्ला वाले चाय पीने के लिये बुलाते थे,
आज वही दौर बदल गया है,जब कचरा ले जाने वाली गाड़ी आती है,तो सब खुश हो जाते है,सबके चहरे पर ख़ुशि की लहर दौड़ जाती है।
Photo AI
मध्य प्रदेश के हेड कांस्टेबल विवेकानंद तिवारी आजकल काफी सुर्ख़ियों में ।
सोशल मीडिया पर उन्होंने वीडियो बनाकर डाले और वे काफी वायरल हो गई ,और विवेकानंद की सोशल मीडिया पर काफी पहचान बन गई।
जिससे You tube,Facebook और इंस्टाग्राम आमदनी का श्रोत बन गया ,जिसकी भनक पुलिस विभाग को लग गई।
इसलिए पुलिस विभाग ने इन्हें Suspend कर दिया ,और विभागीय जांच के आदेश दे दिए।
विवेकानंद को गुस्सा आया और उसने पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया ,
लेकिन विभाग ने इस्तीफा अस्वीकार करके इनकी पत्नी की आय पर भी जांच बैठा दी है।
क्योंकि सोशल मीडिया से जो कमाई हो रही थी, उसका लेनदेन विवेकानंद की पत्नी के बैंक अकाउंट में होने की बात समाने आई है।
क्या आप जानते है ?
पुलिस सेवा में जाकर अगर कोई व्यक्ति अन्य आमदनी श्रोत में लग जाता है
तो उसे विभागीय नियमों का उल्लंघन माना जाता हैं ,और उस कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हो सकती हैं।
क्योंकि कोई भी लोक सेवक(सरकारी कर्मचारी) अन्य आमदनी का काम नहीं कर सकता हैं।
E20 Petrol की वजह से यूट्यूबर मनीष कश्यप के बाद फेमस मैथ्स टीचर अभिनय सर की कार खराब,
चलते-चलते अचानक बंद हुई Volvo XC90,
सर्विस सेंटर जाने पर उन्हें बताया गया कि खराब पेट्रोल भरवाने की वजह से इंजन में खराबी आई।
उन्होंने कहा कि शायद खराब पेट्रोल भरवाने की वजह से हुआ होगा,
क्योंकि गाड़ी 36 जगहों पर जाती है, कहीं भी पेट्रोल भरवाया जा सकता था।
अब मैं सोच रहा हूं... माइलेज तो निश्चित रूप से कम हो गया है, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन हमें इसका ज्यादा पता भी नहीं चलता।
लेकिन सोचिए... अगर इतनी बढ़िया, सबसे सुरक्षित गाड़ियों के इंजन भी खराब हो सकते हैं,
तो भविष्य में हमारे पूरे परिवहन सिस्टम का क्या होगा ?
उन्होंने समस्या हमको एक्स पर भी शेयर किया
9 वर्ष, 242 करोड़ से अधिक वृक्षारोपण जनभागीदारी से साकार होता संकल्प।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के विज़न और देशवासियों की सक्रिय जनभागीदारी ने पर्यावरण संरक्षण को एक जनआंदोलन का रूप दिया है।
5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर "एक पेड़ माँ के नाम" अभियान के तहत भी 5 करोड़ से अधिक पौधों का रोपण किया गया। यह अभियान प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी और माँ के सम्मान का सुंदर प्रतीक बन गया है।
हम सभी अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर हरित, स्वच्छ और समृद्ध भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।
बारिश ने छीन लिया आख़िरी सहारा... अब सुनील और उसकी बहन के पास बचा ही क्या?
झारखंड के हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की हकीकत है जिनकी जिंदगी रोज़ संघर्ष के सहारे चलती है।
सुनील तिर्की के माता-पिता इस दुनिया को पहले ही अलविदा कह चुके हैं। घर में अब सिर्फ दो भाई-बहन हैं। न सिर पर मां का हाथ है, न पिता का सहारा। एक-दूसरे का साथ ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
गुजारा करने के लिए दोनों दूसरों के घरों में मजदूरी और छोटे-मोटे काम करते हैं। दिनभर की मेहनत के बाद जो थोड़ा-बहुत मिलता है, उसी से दो वक्त की रोटी का इंतजाम होता है।
उनकी जिंदगी का आख़िरी सहारा एक छोटा-सा मिट्टी का घर था। बरसों से उसी में रहकर दोनों ने हर मौसम काटा, हर मुश्किल झेली। लेकिन इस बार की लगातार बारिश ने वह सहारा भी छीन लिया। मिट्टी का घर भरभराकर गिर पड़ा और कुछ ही पलों में दोनों बेघर हो गए।
आज उनके पास रहने के लिए सुरक्षित छत नहीं है। रात कैसे कटेगी, बारिश से कैसे बचेंगे, इसकी चिंता हर पल उन्हें सता रही है।
सबसे दर्दनाक बात यह है कि सुनील के पास न आधार कार्ड है और न ही राशन कार्ड। ऐसे में सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना भी मुश्किल हो जाता है। न मुफ्त राशन की गारंटी, न किसी सहायता योजना तक आसानी से पहुंच।
जरा सोचिए, जब पहचान का दस्तावेज़ ही न हो, तो कोई अपनी जरूरत कैसे साबित करे? ऐसे लोगों तक मदद आखिर कैसे पहुंचे?
यह कहानी सिर्फ एक टूटे हुए घर की नहीं, बल्कि टूटती उम्मीदों की भी है। एक भाई अपनी बहन की जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हालात हर कदम पर उसकी परीक्षा ले रहे हैं।
जरूरत है कि स्थानीय प्रशासन इस मामले पर ध्यान दे, उनके दस्तावेज़ बनवाने में मदद करे, रहने की व्यवस्था सुनिश्चित करे और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाए, ताकि दो भाई-बहन फिर से सम्मान के साथ अपनी जिंदगी शुरू कर सकें।
कभी-कभी एक मजबूत छत, कुछ जरूरी दस्तावेज़ और समय पर मिली मदद किसी की पूरी जिंदगी बदल सकती है। उम्मीद है कि सुनील तिर्की और उसकी बहन की आवाज़ उन लोगों तक पहुंचे जो उनकी मदद कर सकते हैं ताकि उन्हें मुख्य धारा से जोड़ा जा सके,
लड़का: साबुन मिल जाएगा?
लड़की: हाँजी, कौन सा?
लड़का: जिससे आप नहाती हैं।
लड़की: हाँजी।
लड़का: जो आप यूज़ करती हैं, वो वाला दे दीजिए।
लड़का: और एक टूथपेस्ट।
लड़की: कौन सा?
लड़का: आपके दाँत इतने सफ़ेद हैं और स्ट्रांग भी लग रहे हैं, तो वही दे दीजिए जो आप यूज़ करती हैं।
लड़का: और एक शैम्पू।
लड़की: और भी सारा सामान दे दूँ, जो मैं यूज़ करती हूँ? यूज़ कर लेना तुम।
लड़का: नहीं, बाकी और चीज़ें तो मैं यूज़ नहीं कर पाऊँगा ना।
लड़का: वैसे, आप सच में यही सारा सामान यूज़ करती हैं?
लड़की: हाँ, तो...
लड़का: वैसे आप ये च्यूइंगम कौन सी खा रही हैं?
लड़की: सेंटर फ्रूट।
लड़का: पाँच ये भी दे दीजिए।
लड़की: तो जो भी है ना, अगर मेरे पापा को पता चल गया ना कि दुकान पे आके तू मुझे छेड़ रहा है, तो तुझे इसी साबुन से धो देंगे।
लड़का: मैडम, क्या बोले जा रही हो? मैंने कब छेड़ा आपको? मैं तो आपसे बस सामान माँग रहा हूँ ना।
लड़की: तुझे वही सारा सामान चाहिए जो मैं यूज़ करती हूँ?
लड़का: हाँ, तो इसकी स्किन अच्छी लगी तो साबुन माँग लिया, दाँत अच्छे लगे तो ये दंतकांति माँग लिया और बाल अच्छे लगे तो शैम्पू माँग लिया। इसमें क्या गलत किया?
लड़की: तो पूछने का तरीका होता है।
लड़का: मैडम, मैंने कब बदतमीज़ी कर ली? मैंने भी तो आपसे प्यार से ही पूछा ना।
लड़की: वैसे तुमने सच में मेरी स्किन अच्छी लगी?
लड़का: हूँ।
लड़की: और दाँत?
लड़का: हाँ।
लड़की: और बाल भी?