शिव कौन हैं
आचार्य प्रशांत: महाशिवरात्रि का समय है और आपकी बहुत-सी जिज्ञासाएँ आयी हैं। आपने कहा कि जैसे अभी पूरी बात समझायी आपने कि ईश्वर माने क्या, आत्मा माने क्या, माया माने क्या, चार राम कौन से होते हैं — और श्री कृष्ण की गीता पर तो लंबे और पूरे व्याख्यान होते ही रहते हैं — तो वैसे ही अलग-अलग शब्दों में आपने कहा है कि अब महाशिवरात्री के समय पर, शिव पर भी पूरी बात करी जाए, शिव कौन हैं।
तो मैंने सोचा कि शिव पर तो मैं इतना बोल चुका हूँ, इतनी बार बात कर चुका हूँ, पूरी हमारी एक पुस्तक ही है शिव पर 'शिवोऽहम्' नाम से और अगर आप विडियोज़ ढूँढ़ रहे होंगे, तो सैकड़ों नहीं तो दर्ज़नों विडियो तो होंगे ही शिव पर। तो अपनी बात तो मैं भरपूर कर ही चुका हूँ।
आज क्यों न शिव को उनके ही माध्यम से आप तक लाया जाए, जिन्होंने शिवत्व को समझा है। तो आज आचार्य शंकर, आदिशंकराचार्य का ‘निर्वाण षट्कम', ‘अवधूत गीता', लाल देद माने लल्लेश्वरी देवी के कुछ वाक्, अक्का महादेवी के कुछ वचन और इसके अलावा अगर संभव हुआ तो कुछ शैव उपनिषदों से कुछ श्लोक लेंगे। जिससे यह बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा कि शिव कौन हैं।
आपने जो प्रश्न भेजे हैं, जो जिज्ञासाएँ करी हैं, वो सीधे-सीधे यही नहीं हैं कि शिव कौन हैं। यह तो मैं चाहता हूँ कि मैं आपसे बात करूँ कि शिव माने क्या। आपके प्रश्न बहुत तरीक़े के हैं। उदाहरण के लिए आपने पूछा है कि 'क्या कैलाश पर्वत पर कुछ पारलौकिक शक्तियों का वास है?' आपने पूछा है कि 'डमरू का क्या महत्व है?' आपने पूछा है कि 'शिव के जो हमें अनेक रूप बताए जाते हैं, वो सब क्या हैं?'
तो मैंने सोचा कि शिव के विषय में जो इतनी बातें हैं जिनमें से अधिकांश मात्र भ्रांतियाँ हैं, उन बातों को लूँ और उनमें से एक-एक का परिक्षण करूँ और फिर उनको नकारूँ, उससे कहीं बेहतर है कि जो एक मूल बात है — ठीक, सीधी, साफ़, सच्ची — वो आपसे कर दी जाए।
आप जान जाएँगे एक बार कि शिव हैं कौन, तो फिर शिवत्व से सम्बन्धित जितनी भी आज प्रचलित भ्रांतियाँ हैं, इनको तो फिर आप ख़ुद-ब-ख़ुद ही नकार देंगे न। फिर आपको आवश्यकता नहीं पड़ेगी कि हर छोटी बात में मुझसे या किसी से पूछना पड़े कि इसका अर्थ बताओ, उसका अर्थ बताओ।
और हमने राम, कृष्ण, शिव, ये तीन जो मुझे बहुत प्रिय हैं और पूज्य हैं, हमने इन तीनों के साथ ही कुछ अच्छा व्यवहार नहीं करा है। तीनों की ही बात को हमने समझने से इंकार करा है और तीनों के ही अर्थ को हमारे अहंकार ने ख़ूब विकृत करा है। और इन विकृत अर्थों को ही अब हम यूँ मानने लगे हैं और प्रचारित भी करने लगे हैं जैसे सत्य हो।
तो बहुत सारे हैं विकृत अर्थ, और वो बहुत-बहुत जगहों से प्रचारित हो रहे हैं। कुछ तो जो विकृतियाँ हैं, वो पारंपरिक रही हैं, अतीत से चली आ रही हैं। और बहुत सारी ऐसी हैं जो एकदम नयी-ताज़ी हैं, हालिया हैं। पिछले दस-बीस सालों में ही वो ज़्यादा पनपी हैं और ज़्यादा प्रचलित हुई हैं, और बहुत जगहों से दुष्प्रचार हुआ है।
तो उतनी सारी चीज़ों की, उतनी सारी भ्राँतियों और विकृतियों की मैं क्या बात करूँगा, है न? उससे कहीं बेहतर है कि जो शिवत्व का वास्तिवक अर्थ है, हम वो समझ लें। वो अर्थ समझने के बाद भी आप भ्रांतियों में विश्वास रखना चाहते हैं, तो वो आपकी मर्ज़ी है। और उसका तो फिर कुछ करा नहीं जा सकता।
लेकिन हम जो असली मतलब है शिवत्व का, आज उसको समझने का प्रयास करेंगे। ठीक है? तो बात लंबी चलेगी, दूर तक जाएगी, और गहराई पकड़ेगी। जिनमें शिवत्व के प्रति जिज्ञासा हो, संयम हो, और श्रद्धा हो वही मेरे साथ रह पाएँगे।
तो हम आरंभ करते हैं शंकराचार्य के 'निर्वाण षट्कम' से। इसकी पृष्ठभूमि तो आपको पता ही होगी न। तो बालक से थे, किशोर भी नहीं हुए थे शंकराचार्य। तो वो अपने गुरु के पास गए और गुरु के बारे में प्रसिद्ध था कि वो आसानी से शिष्य किसी को स्वीकार करते नहीं थे। तो गुरु ने इनको देखा और कम उनकी उम्र बहुत, तो बोलते हैं, 'अच्छा, ज़रा परिचय देना अपना, हो कौन तुम?'
तो बालक शंकर ने अपना परिचय ही इस अंदाज़ से दिया कि गुरु को महा आश्चर्यचकित होकर और प्रेमविह्वल होकर शंकर को शिष्य स्वीकारना ही पड़ा। तो यह जो हमारे सामने आ रहा है 'निवार्ण षट्कम', यह वास्तव में आदि शंकराचार्य ने अपना परिचय दिया है। और अपना परिचय देते हुए बोले, 'मेरे बारे में, बाकी सब बातें मैं बताऊँ क्या आपको श्रीमान। बाकी सब बातें बताने लायक नहीं हैं, मेरे बारे में। जो भी है, एक ही चीज़ है, मेरे बारे में बताने लायक — शिवोऽहम्, मैं शिव हूँ।'
तो इसमें बिलकुल रस्सी पर चलते हैं आचार्य शंकर। एक ओर तो वो सबकुछ जो किसी के बारे में भी महत्वपूर्ण माना जाता है, जिन चीज़ों को हम अपनी पहचान बताते हैं, उनको काटते चलते हैं और जैसे-जैसे काटते जाते हैं, साथ में बोलते हैं, ‘चिदानंदरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।' मैं वो सब नहीं हूँ और वो सब यदि नहीं हूँ तो मैं कौन हूँ? मैं यह हूँ — मैं विशुद्ध सतत चेतना मात्र हूँ। मैं आनंदमयी चेतनामात्र हूँ, और उसका नाम शिव है।
अब देखिए, मैंने क्यों चुना है आज 'निर्वाण षटकम्' को, आपसे शिव का परिचय कराने के लिए? इसलिए चुना है, क्योंकि जिन्होंने शिव को जाना — शंकराचार्य — वो जिन-जिन चीज़ों को नकार कर, काट कर, कह रहे हैं, 'यह सब मैं नहीं हूँ।' माने यह सब शिव नहीं हैं। 'मैं कौन हूँ?' अपनेआप को बोलते हैं 'शिवोऽहम्।' और जिन-जिन चीज़ों को कहते हैं, 'मैं नहीं हूँ', उन चीज़ों के बारे में यही तो कह दिया न कि वो सब बातें शिव से सम्बन्धित नहीं हैं क्योंकि 'मैं कौन हूँ?' मैं बराबर शिव।
तो जितनी बातों को वो कह रहे हैं, मैं नहीं हूँ, उतनी बातों को वो यही कह रहे हैं कि वो सब बातें शिव से कोई रिश्ता नहीं रखतीं। तो मैंने निर्वाण षटकम् इसलिए चुना है, क्योंकि जिन-जिन बातों को हमें आचार्य शंकर बता रहे हैं कि शिव से कोई सम्बन्ध नहीं रखतीं, हमने आज शिव का सम्बन्ध उन्हीं सब बातों से जोड़ दिया। और मात्र, उन्हीं सब बातों से जोड़ दिया है।
अब यह तो एक अजीब विडंबना हो गई न भाई कि जो करने के लिए हमको मना कर गए ज्ञानी, हम ठीक वही कर रहे हैं। गज़ब माया है! ऐसा भी नहीं कि थोड़ी बहुत ग़लती कर दी है। शत प्रतिशत ग़लती, जैसे कि बिलकुल हिसाब लगाकर के गलती करी गई हो। जैसे कि कोई पूछ रहा हो, 'अच्छा बताओ, क्या क्या नहीं करना है?' और जो नहीं करना है वही सब करा हो। और कह रहा हो, 'नहीं-नहीं पहले बता दो, क्या-क्या नहीं करना है, ताकि हम जान जाएँ कि वही सबकुछ तो हमें करना है।'
तो जो कुछ हमें यहाँ पर आचार्य शंकर मना कर रहे हैं — शिव के विषय में सोचने को — हमने शिव के विषय में वही सबकुछ सोच रखा है। और महाशिवरात्रि जैसे पर्व को भी हम बड़ा कलुषित कर देते हैं, जब हमारी शिव की धारणा ही इतनी विकृत होती है।
तो कह रहे हैं आचार्य शंकर —
मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं,
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योमभूमि- र्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥
मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, अंत:करण के हिस्से होते हैं, ये सब, ये चार, शास्त्रीय तौर पर। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार। बोल रहे हैं, 'इनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं।' माने इनसे शिव का कोई सम्बन्ध नहीं। क्योंकि मैं कौन हूँ? मैं शिव हूँ। तो जिन चीज़ों से मेरा सम्बन्ध नहीं, उनसे शिव का भी सम्बन्ध नहीं। तो इन चीज़ो से शिव का कोई सम्बन्ध नहीं — मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार।
और शिव वो नहीं हैं जो इंद्रियों की पकड़ में आ सकें। श्रोत्र माने? कान। जिह्वा माने? जीभ। घ्राण माने? नाक। नेत्र माने? आँख।
मन, बुद्धि, अहंकार, स्मृति इनका उपयोग करके शिव को सोचने मत लग जाना। और न शिव को कोई ऐसा रूप दे देना जिसे आँखें देख सकती हों। न शिव के बारे में कोई ऐसी बात कह देना जिसे कान सुन सकते हों। शिव को जिसने रूप दे दिया — हमको आचार्य शंकर समझा रहे हैं — उसने शिव को खो दिया। क्योंकि सब रूप तो मानसिक ही होते हैं न। सब रूपों को हम अपने ही रूप से ढालते हैं। हैं न? जैसा हमारा रूप होता है, वैसा ही या उससे सम्बन्धित। हम किसी को भी कोई रूप दे देते हैं।
तो कह रहे हैं, 'तुम्हारे मन से शिव की जो भी धारणा निकलेगी, गलत होगी। तुम्हारी बुद्धि से शिव के विषय में जो भी विचार निकलेगा, वो भी गलत होगा, एकदम गलत होगा — छोट-मोटा नहीं।' इसका क्या यह अर्थ है कि एक विचार ग़लत हो सकता है शिव के विषय में, दूसरा विचार सही हो सकता है? नहीं। तुम जो भी विचार करोगे, वो उठ तो तुम्हारे ही अहंकार के केन्द्र से रहा है न, तो वह भी सब ग़लत होगा।
शिव के विषय में तुमने जो कुछ भी कह दिया, वो गलत। शिव के विषय में तुमने जो कुछ भी सुन लिया, वो गलत। जिह्वा ने कुछ कह दिया शिव के विषय में, गलत। बुद्धि ने कुछ अनुमान लगा लिया शिव के विषय में, कोई भी कहानी बना ली तुमने शिव के विषय में — शिव के विषय में कहानी छोड़ो, एक शब्द भी अगर तुमने कह दिया, तो तुम शिव से बहुत दूर हो गए। वाणी उनका वर्णन नहीं कर सकती, नेत्र उनका दर्शन नहीं कर सकते, कान उनका श्रवण नहीं कर सकते।
और हम क्या करते हैं? कहानियाँ-ही-कहानियाँ। 'वो यहाँ बैठे हैं, फिर यह कर रहे हैं, फिर उन्होंने यह करा, फिर कुपित हो गए, फिर ऐसा हो गया, वैसा हो गया।' इनमें से कुछ कहानियाँ हैं जो किताबों से आ रही हैं, और कुछ कहानियाँ हैं जो आजकल बहुत फैला दी गई हैं।
देखिए, आज जो फैला दी गई हैं कहानियाँ, उनके बारे में तो बात करना व्यर्थ ही है; क्योंकि कोई कुछ भी फैला सकता है, उसमें क्या रखा है। लेकिन लोग अटक जाते हैं जब उनको दिखता है कि बहुत सारी कहानियाँ तो आ रही हैं उन किताबों से जिनको हम थोड़ा सम्मान की दृष्टि से देखते हैं — धार्मिक क्षेत्र की किताबें, पुराण, वगैरह।
कुछ बात समझनी पड़ेगी। वो ये है कि जिसको आप धार्मिक साहित्य कहते हैं वो एक बड़ा विस्तृत और विराट संकलन होता है। खासकर भारत में ऐसा ही रहा है। यहाँ ऐसा नहीं रहा है कि धर्म की कोई एक ही किताब हो। यहाँ धर्म से सम्बन्धित बहुत-बहुत सारी किताबें रही हैं और उसी वजह से बड़ी गड़बड़ हो गई है।
बात मात्र इतनी ही होती कि बहुत सारी भी अगर धार्मिक पुस्तकें हैं, तो भी कोई हानि नहीं होती। लेकिन हानि तब बहुत हो जाती है जब बहुत सारी धार्मिक पुस्तक हों और उनमें भी लोगों को यह ज्ञान न हो कि कौन-सी पुस्तक केन्द्रीय है या सर्वोच्च है। तो जिसके जो मन में आता है वो अपने अनुसार उस पुस्तक को उठा करके उसी को श्रेष्ठ मान लेता है। और ज़ाहिर-सी बात है, आप वही पुस्तक उठाएँगे जो आपके अहंकार के अनुकूल होगी।
तो जो आपकी केन्द्रीय पुस्तक है, उसका नाम तो आप जानते ही होंगे? उसको वेद बोलते हैं। और वेदों का जो दर्शन है, उसको वेदांत बोलते हैं। और वेदांत के दर्शन में जो आख़िरी सत्य है उसको आत्मा बोलते हैं।
तो शिव कौन हैं? शिव वेदांत की आत्मा हैं। (दोहराते हुए) शिव कौन हैं? शिव वेदांत की आत्मा हैं। जितनी बातें यहाँ पर आचार्य शंकर अपने बारे में या शिव के बारे में बोल रहे हैं, वो सारी बातें वास्तव में आत्मा के बारे में बोल रहे हैं। वो यही कह रहे हैं कि 'मैं आत्मा हूँ, और शिव आत्मा का दूसरा नाम है, और आत्मा इंद्रियों से अतीत होती है; मन से उसका चिंतन नहीं हो सकता, अनुभव में वो आती नहीं, स्मृति में वो बैठती नहीं।'
समझ आ रही है बात?
और यह जो बात है, यह उच्चतम बात है शिव के बारे में। अब अगर आपको शिव के बारे में और बहुत सारी बातें मिलती हैं — अन्य पस्तकों में — जो इस बात के विपरीत जाती हैं, तो उसमें कोई हमें संशय नहीं होना चाहिए, कोई विचार की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए। जो वेदांत की बात है वही मान्य होगी। बाकी सब बातों का कोई महत्व नहीं है।
एक बार उपनिषदों ने यह कह दिया कि शिव के विषय में कोई कल्पना न करो, उन्हें कोई रूप-रंग, आकार देने का प्रयास न करो। उनके बारे में कोई किस्से-कहानी सोचना ही धृष्टता है, तो उसके बाद और कहीं भी आपको बताया जा रहा हो कि लो शिव के बारे में यह कथा ले लो, यह कहानी ले लो, आपको उन सब कथाओं को तुरंत अस्वीकार कर देना चाहिए न?
मैं कहा करता हूँ कि वेदांत सनातन धर्म का सुप्रीम कोर्ट है। जो बात वेदांत ने बोल दी वो नीचे के सब न्यायालयों की बात पर भारी पड़नी है। नीचे के जो न्यायालय हैं — बाकी सब किताबें हैं, जो हिन्दु धर्म में चलती हैं — तो नीचे के जो न्यायालय हैं उनकी बात भी सुनी जा सकती है, पर मात्र तब तक सुनी जा सकती है, जब तक उनकी बात उच्चतम न्यायालय की बात का खंडन न करती हो या उच्चतम न्यायालय की बात के विपरीत न जाती हो।
इतनी सारी किताबें हैं, ठीक है। उनमें भी मूल्य है, उनमें भी बहुत कुछ ऐसा है जो लाभप्रद है। पर उन किताबों का महत्व मात्र उस सीमा तक है, जिस सीमा तक वो वेदांत के विरुद्ध नहीं चली जातीं। जहाँ पर किसी भी पुस्तक में और वेदांत में ज़रा भी टकराव आएगा, वहाँ पर हमें विचार नहीं करना चाहिए कि किस पुस्तक को मानना है, बिलकुल स्पष्ट होना चाहिए। कहीं पर भी वेदांत विरुद्ध कोई बात हो रही है, तो वो बात ख़ारिज। भले ही वो बात किसी तथाकथित धार्मिक पुस्तक में ही क्यों न हो रही हो। वो बात आपको ख़ारिज करनी पड़ेगी।
न व्योम (अर्थात्) आकाश, आसमान, न भूमि, न तेज, न वायु — किसी से कोई प्रयोजन नहीं। पूरी प्रकृति समा जाती है न, ज़मीन और आसमान के बीच में? पूरी प्रकृति में ही जो कुछ है, मैं वो नहीं हूँ, वो आत्मा नहीं है, वो शिव नहीं है — यह मेरा परिचय है, यही शिवत्व का परिचय है। 'चिदानन्दरूप:' — चेतना मात्र। विशुद्ध चेतना को ही शिव कहते हैं।
शिव कोई व्यक्ति नहीं हैं, शिव का कोई व्यक्तित्व नहीं हो सकता। शिव कोई रूप-रंग, नाम, आकार नहीं हैं। शिव कोई मनुष्य नहीं हैं, जो कभी हुआ था। शिव कोई इंसान नहीं हैं, जो किसी घर में रहता है या किसी जगह पर रहता है। विशुद्ध चेतना को ही शिव कहते हैं। 'चिदानंदरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्' — विशुद्ध चेतना मात्र को ही शिव कहते हैं।
और चेतना के दूषण कौन होते हैं? वही सब जिनको अभी-अभी नकारा गया है। कौन? पृथ्वी से लेकर के आकाश के बीच में जो कुछ है, वो दूषण है। और वो आगे दूषित किसको करता है? इन्हीं को — मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को दूषित करता है। किसके माध्यम से वो मन तक पहुँचता है? अरे! यही भाई — जिह्वा, नेत्र, घ्राण। जिह्वा, नेत्र, घ्राण इनके माध्यम से कौन प्रवेश करता है आपमें? वो जो व्योम से लेकर भूमि तक है। और वो प्रवेश करके किसको कलुषित कर देता है? मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को।
तो पूरी जो दूषण की प्रक्रिया है, 'निर्वाण षट्कम' माने छह बातें कहेंगे इसमें। वो छह बातों में पहली ही बात में वो पूरी दूषण की प्रकिया है, मिलावट का जो खेल है, उसको आचार्य शंकर ने साफ़ कर दिया है। बोल रहे हैं, 'ज़मीन से आसमान तक जो कुछ है, नहीं हैं शिव! वो जो ज़मीन से लेकर आसमान तक है, वो आपमें जिस रास्ते से प्रवेश करता है, वो भी नहीं हैं शिव। और वो जहाँ जाकर बैठ जाता है, वो भी नहीं हैं शिव।' क्योंकि यह सारी प्रक्रिया ही दूषण की, माने मिश्रण की, मिलावट की है न?
शिव क्या हैं? 'चिदानंदरूप:' माने जहाँ कोई मिलावट नहीं है, विशुद्ध चैतन्य मात्र है। माने चेतना से यह सब चीज़ें, जो प्राकृतिक हैं, जब हट जाती हैं तो चेतना का जो विशुद्ध नृत्य होता है, चेतना का जो अकलुषित प्रकाश होता है उसको शिव कहते हैं।
चेतना का दूषण किसको बोलते हैं? चेतना का विषय ही चेतना का दूषण होता है। आप जिस चीज़ को पकड़े हुए हो — चाहे सोच रहे हो उसके बारे में, चाहे आपकी कोई भावना है, चाहे आप उसको बचाना चाहते हो, चाहे आप उससे बचना चाहते हो — जिस भी चीज़ को आप पकड़े हुए हो, वही चेतना का विषय है और वही चेतना का दूषण है। चेतना जिस चीज़ से संप्रक्त है, आसक्त है, वही चीज़ चेतना को गंदी कर देती है।
शिव कौन हैं? वो चेतना जो ज़मीन से लेकर आसमान तक किसी भी चीज़ को इतना मूल्यवान नहीं मानती कि उसको…। कुछ नहीं है इतना मूल्यवान कि हम उसको पकड़ें भाई! और आपमें भी फिर जब शिवत्व उदित होता है, तो ऐसी बेपरवाही आती है, आप में! 'क्या है, बहुत बड़ी चीज़ है? कहाँ की है? ज़मीन की होगी नहीं तो आसमान की होगी। ज़मीन से लेकर आसमान तक कुछ इतना बड़ा नहीं है कि हमको व्यग्र कर जाए।' जिसकी चेतना ऐसी होने लग जाती है, जान लीजिए कि उसमें शिव के प्रति प्रेम है।
और यही शिव के प्रति प्रेम का प्रमाण होता है, चेतना में एक उन्मुक्तता का उतर आना। आप एक शिवालय बना लें या आप जाकर के चित्र की या मूर्ति की पूजा कर लें, इतने से नहीं कुछ प्रमाणित होता। शिव शिवालय में कहाँ हैं? जितनो ने जाना हैं, उन्होंने बार-बार पूछा है, 'शिवालय में हैं क्या शिव?' अनंत को तुमने एक घर में रख दिया, कैसे कर लिया?
शिव जहाँ हो सकते हैं, उनको वहाँ होने दो न। शिव मात्र विशुद्ध चेतना में हो सकते हैं। और वहाँ तुम उनको होने नहीं देते, अहंकार गवारा नहीं करता। तो उनके लिए तुमने बहुत सारी चीज़ें बना लीं। उनके लिए एक विशिष्ट दिन बना लिया, उनके लिए एक विशिष्ट जगह बना दी, उनको एक विशिष्ट पर्वत भी दे दिया। और उनके बारे में न जाने कितने तरह की क्या-क्या बातें कह डालीं — उनमें से किसी में भी शिव नहीं हैं। सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारी साफ़ चेतना का ही नाम शिव है।
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातु- र्न वा पञ्चकोशः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिदानन्दरूपः
शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥
ये जितनी बातें यहाँ बोली गई हैं, देखिएगा कि क्या हैं वो सब; क्योंकि आचार्य बहुत सारी चीज़ों को नकारते हैं निर्वाण षट्कम में। वो जिन-जिन को नकार रहे हैं, उनमें खो जाना आसान है। पर आप देख लें कि उनका साझा नाम क्या है, तो खोएँगे नहीं और बात एकदम स्पष्ट होकर उभरेगी।
'प्राण, वायु, धातु, कोष, वाक्, पाणि, पाद।' वाक् — तालू, पाणि — हथैली, पाद — पैर। चौपस्थपायू — जो आपकी उत्सर्जन की इंद्रियाँ होती हैं। तो आपकी जो कर्मेंद्रियाँ हैं, वो भी नहीं हैं। जो पंचवायु आप अपने शरीर के भीतर रखते हो, वो भी नहीं है। सप्तधातु नहीं। वो जो पंचकोष होते हैं, जिनसे जीव के अस्तित्व का हम पूरा विवरण ही दे देते हैं न, वो भी नहीं हैं।
आत्मा और अनात्मा के परित: हम पाँच कोष बनाकर कहते हैं — यह जीव है, और ये जो पाँचों कोष हैं, जब वो छिलके की तरह उतार दिए जाते हैं तो उनके मध्य में जो आत्मा है, वही मात्र सच्चाई है। तो यह जो पाँच कोष हैं, ये तो मिथ्या ही हैं। कह रहे हैं, 'इनमें से कुछ भी नहीं।' ये सब बातें प्रकृति के अंतर्गत आती हैं, शिव इनमें से कुछ भी नहीं हैं।
और अब अपनेआप से आप पूछिएगा कि आपने शिव की जो धारणा बना रखी है, क्या वो इन सबसे मुक्त है एकदम? और अगर नहीं मुक्त है, तो वो धारणा बना करके आप शिव के निकट जा रहे हैं, या शिव से एकदम दूर कर दे रही है आपको आपकी ही धारणा?
हम धारणाओं को ही सत्य मान लेते हैं। हम परंपराओं, मान्यताओं को ही सत्य मानकर उनमें जीना शुरू कर देते हैं। हम कहते हैं, 'सिर्फ़ इसलिए कि कोई काम होता आ रहा है वो ठीक ही होगा न। सिर्फ़ इसलिए कि कोई बात मानी जाती आ रही है, तो वो ठीक ही होगी न।' अरे! थोड़ा उनसे भी तो सुन लो, जिन्होंने जाना है। यह भी अगर कहते हो कि अतीत में ही सत्य है तो अतीत में आचार्य शंकर भी तो हैं, उनकी बात सुनने में क्या इतनी बाधा है भई?
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ,
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥३॥
आत्मा, मैं, शिव, इन तीनों के बारे में साझी बात — इनमें न द्वेष है, न राग है। 'न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ'। न लोभ है, न मोह है। किसके प्रति? द्वेष और राग हमेशा किसके प्रति होते हैं? प्रकृति के प्रति। प्रकृति में कोई विषय होता है न, उसके प्रति कभी द्वेष हो जाता है, कभी अनुराग हो जाता है, कभी लोभ लगता है, कभी भय लगता है, कभी मोह हो जाता है।
ये जितनी भी बातें हैं, ये सम्बन्ध को इंगित कर रही हैं न कि एक सम्बन्ध स्थापित कर लिया। आपके सामने कोई वस्तु है, उससे आपने क्या स्थापित किया? सम्बन्ध। सम्बन्ध का नाम हो सकता है — द्वेष, राग, लोभ, मोह, भय, मद, मात्सर्य। तो इन सबको सिरे से नकारे दे रहे हैं। आदि से अंत तक नकारे दे रहे हैं आचार्य। कह रहे हैं आचार्य —
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ,
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः,
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥३॥
मद माने चेतना का गिर जाना, अहंकार और सघन हो जाना, नशा। ईर्ष्या भी आपको सदा किसके प्रति होती है? कोई प्रकृतिगत विषय होता है। आप भी अपनेआप को प्रकृति का ही विषय समझते हो; वो जो सामने विषय है, वह आपको अपनेआप से बड़ा लगता है, तो आपमें ईर्ष्या उठ आती है।
मद भी आप पर चढ़े, इसके लिए चेतना का आच्छादित होना ज़रूरी है। किससे? प्रकृति के ही किसी विषय से। जब प्रकृति का कोई विषय चेतना पर एकदम छा जाता है, तो नशा हो जाता है, मनुष्य विवेक खो देता है। तो ये सारी बातें किसको संबोधित करके कही गई हैं? प्रकृति को। और प्रकृति से क्या कहा गया है? 'नहीं बाबा! तुमसे मेरा नहीं कोई रिश्ता है।' जिसका प्रकृति से कोई सम्बन्ध न हो, उसको शिव कहते हैं।
किसी भी तरह कोई सम्बन्ध न हो — लोभ का नहीं, मोह का नहीं, राग का नहीं, द्वेष का नहीं, भय का नहीं, मद का नहीं, मात्सर्य का नहीं, हर्ष का नहीं, शोक का नहीं, लाभ का नहीं, हानि का नहीं। जो प्रकृति को इतना जान गया है, इतना जान गया है कि उसके लिए अब संभव ही नहीं रह गया है प्रकृति पर हाथ डालना, उसे शिव कहते हैं।
वो चेतना है एक, व्यक्ति नहीं है। फिर से, जल्दी से कोई छवि न खड़ी कर लीजिएगा। जो चेतना प्रकृति को इतना समझ गई है कि अब वो चाहकर भी प्रकृति से बंध नहीं सकती, उसको शिव कहते हैं। और प्रकृति को उतना समझा कैसे जाता है? प्रकृति के निकट आकर के। बिना निकटता के कुछ समझ में नहीं आएगा। बहुत दूरी बनाना तो द्वेष का लक्षण होता है न। और निकट आने का मतलब आसक्ति हो आवश्यक नहीं है।
जब मैं कह रहा हूँ, निकट आना, तो मेरा अर्थ है, निकट आना अवलोकन करने के लिए, जानने के लिए क़रीब आना; आसक्त होने के लिए, आबद्ध होने के लिए नहीं, जानने के लिए निकट आना। तो प्रकृति से ऐसी निकटता रखी है, ऐसी खोजी दृष्टि से, ऐसी निष्पक्ष दृष्टि से तलाशा है प्रकृति को।
मैं यहाँ तक कह सकता हूँ, इतने प्रेम से सम्बन्ध बनाया है प्रकृति से कि प्रकृति ने अपने सारे रहस्य ही खोल कर रख दिए हैं। ऐसी चेतना जो प्रकृति को पूरा-पूरा जान गई है, वो ऐसे देख रही है, वो पूरा सब समझ गई और वो मुस्कुराती है। उसे प्रकृति से अब कोई समस्या नहीं है।
ऐसा कुछ नहीं है कि उसने कहा है कि प्रकृति पाप है, दूर रहना है। ऐसा कुछ नहीं है! प्रकृति बहुत अच्छी है, प्यारी है। पूरा उसको जानते हैं, इसीलिए उसका शोषण नहीं करते। प्रेम है उससे, इसलिए उसका शोषण नहीं करते। लेकिन चूँकि उसको पूरा जानते हैं, इसीलिए यह भी नहीं कर पाएँगे कि उसमें बंध जाएँ। चूँकि उसमें हम बंधेंगे नहीं, इसलिए भाई देह नहीं हो पाएँगे। जो देह होने से इंकार कर दे चेतना, उसको शिव कहते हैं।
हमने क्या ख़ुराफ़ात कर दी? हमने शिव को ही देह पहना दी! जो चेतना देह होने को अस्वीकार कर दे, उसको शिव कहते हैं। और हमने इतना बड़ा अनर्थ कर दिया कि हमने शिव को ही देह पहना दी।
साधारणतया, जो आम धर्मावलंबी होता है वो कहता है, 'चार पुरुषार्थ होते हैं, यही — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।' (आचार्य शंकर) कह रहे हैं, 'यह साधारण चेतना के लिए होते होंगे!' जिसकी चेतना को न धर्म चाहिए, न अर्थ चाहिए, न काम, न मोक्ष चाहिए वो शिव है।
ये बातें निचले स्तर की होती हैं। ये बातें बिलकुल आम आदमी के लिए होती हैं, जो आम ही रहना चाहता हो। कि उसको बोल दिया जाता है कि देखो, ये सब जीवन के लक्ष्य हैं, इनको पुरूषार्थ कहते हैं, ये सब तुमको हासिल करना है। और यह जो बात है, यह बहुत ही साधारण-सी बात है। बहुत औसत दर्ज़े की बात है कि धर्म है, अर्थ है, काम है, मोक्ष है। 'अरे! ये क्या चार बातें बता रहे हो। जो आखिरी बात है, वो पर्याप्त है, मुक्ति।' और काम, जो काम में उलझ गया वो कैसे जाएगा मुक्ति की ओर? और अगर धर्म पहली बात है, तो धर्म तो अर्थ नहीं परमार्थ समझा देगा। तो धर्म के बाद अर्थ का पीछा कैसे कर लोगे भाई?
अगर धर्म प्रथम है, तो धर्म से तो सीधा बायपास जाएगा मोक्ष की ओर। ये बीच में अर्थ और काम नाम के पड़ाव तो फिर आएँगे ही नहीं। तो चूँकि ये बहुत साधारण तल की बात है, तो कह रहे हैं, वो चेतना शिव है जो ऐसी बातों के परे जा चुकी है, ऐसी बातों से अब प्रयोजन नहीं रखती। ऐसी बातों पर मुस्कुरा मात्र देती है।
तो आम संसारी जैसा मन रखता है, जैसे विचार, जैसे लक्ष्य, जैसी चेतना रखता है, वो शिव से बहुत दूर है। आपको अगर आम संसारी बने रहना है तो शिव की अपेक्षा नहीं करें। आप कहें कि मुझे अपना साधारण जीवन ही चलाना है और साल में एकाध-दो दिन में जाकर के शिव के नाम पर कुछ उत्सव कर लूँगा — जिनमें अधिकांशत: हुड़दंग मात्र होता है। तो उससे आपको शिव की निकटता नहीं मिल जाने वाली है। जिनको अभी अर्थ, काम और ऐसी चीज़ों में और सस्ती बातों में बहुत अभी रुचि हो, प्रयोजन हो, उनके लिए शिव नहीं हैं।
'चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्'
जो मुक्ति को लक्ष्य भी बनाये हुए हैं, शिव उसके लिए भी नहीं हैं। कब तक लक्ष्य बनाये रहोगे? एक बार जान गये कि बंधन में हो, तो बंधन को छोड़ दो न। ये लक्ष्य क्या होता है? लक्ष्य का तो मतलब यही होता है, अभी नहीं छोड़ूँगा भविष्य में छोड़ूँगा, क्योंकि लक्ष्यों की पूर्ति तो सदा भविष्य में होती है न। तो लक्ष्य क्या है? इसीलिए आचार्य बड़े विवेक से कह रहे हैं कि धर्म, अर्थ, काम यह सब तो हटाओ; मोक्ष भी जिसका लक्ष्य है वो मैं नहीं।
जानने को जीना बनाने में एक पल का भी विलंब क्यों भाई! यदि जान गए हो बंधन में हो, बंधन एक पल भी और क्यों ढो रहे हो। अगर ढो रहे हो, तो ढो सकते हो, मर्ज़ी है। फिर यह न कहो कि शिव से बड़ा प्रेम है।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम्
न मन्त्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः।
अब देखिए, यहाँ किन बातों को नकारा जा रहा है। देखिए कि इशारे जा किधर को रहे हैं। जो आम संसारी है, वो जिन-जिन चीज़ों को महत्व देता है, हर उस चीज़ को कहा जा रहा है, जबतक ये चीज़ तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है, तब तक शिव के तुम आसपास भी नहीं भटक रहे भाई! ये पाप और पूण्य, यह साधारण धार्मिकता।
यूँ ही नहीं अभी कहा था — 'न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः'। ये सब बातें हम धर्म के अंतर्गत मान लेते हैं न कि भाई पाप से बचना है, पुण्य कर्म करना है। कह रह हैं, 'जब तक तुम्हें अभी यह पाप-पूण्य वगैरह चल रहा है, तब तक तुम शिव से बहुत दूर हो।' क्योंकि पाप और पूण्य दोनों में ही क्या बैठी हुई है? कामना।
पुण्य करना है, ताकि पुण्य करके कुछ लाभ मिले, या पूण्य करना है, ताकि पुराने पाप कटे। पाप से बचना है, क्योंकि दुख की कामना नहीं है, दुख से भय है। तो जो अभी सकामता में जी रहा है, जिसके पास कामनाएँ हैं, माने वो अभी अहंकार के चलाये चल रहा है। सब कामनाएँ अहंकार की होती है न। तो पाप-पुण्य पर चलने वाला कौन होता है? अहंकार होता है। इसीलिए आगे कह दिया है — 'न सौख्यं न दुःखम्।' पाप का संबंध होता है दुख से, और पुण्य का संबंध होता है सुख से।
कह रहे हैं, अभी जो सुख-दुख के खेल में है, और सुख बढ़ जाए इसके लिए वो पूण्य इत्यादि का भी पालन कर लेता है, शिव उसके लिए नहीं हैं। और यह सब जो आम धार्मिक लोग हैं, उनके ऊपर बड़ा प्रहार है। प्रहार ही नहीं, वज्रपात है।
कहते हैं — 'न मन्त्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः।' जो शिव को लेकर के मंत्रोच्चारण कर रहे हों, वो सब दूर हटें। उनके लिए शिव नहीं हैं। तुमको क्यों लग रहा है कि शिव मंत्रों में बैठे हैं? मंत्रों को लेकर के तो आजकल बड़ा बाज़ार है। यह तो छोड़ो कि मंत्रों में जो बात लिखी है, उससे शिव मिल सकतें हैं कि नहीं, अभी तो बाज़ार में यह है कि मंत्रों में जो बात लिखी है वो पता होनी भी ज़रूरी नहीं है।
मंत्रों की ध्वनि में ही कुछ खास ऐसे स्पंदन होते हैं, ऐसे वायब्रेशन होते हैं कि आपको लाभ हो जाता है। और यह बात बड़े-बड़े मंचों से प्रचारित की जा रही है। कह रहे हैं, 'मंत्र समझने की भी ज़रूरत नहीं है, मंत्र सुन भर लो। उससे ऐसी पाज़िटिव वाइब्ज़ (सकारात्मक अनुभूति) आएँगी कि तुम्हारा फ़ायदा हो जाएगा।'
और यहाँ जो आपके शीर्ष दार्शनिक हुए हैं, वेदांत के सर्वोच्च ज्ञानी हुए हैं, वो आपसे कह रहे हैं कि यह तो छोड़ दो कि किसी तरह का स्पदंन या लहर मंत्र से निकलेगा और तुम्हें लाभ दे देगा; जो मंत्र के शब्द भी हैं शिव उनमें भी नहीं हैं। नहीं होने वाला! क्योंकि यह सब बातें भी अगर समझो तो हैं प्रकृति के अतंर्गत न। तीन गुण हैं प्रकृति में। हो सकता है यह सब सतोगुणी बातें हों, लेकिन सतोगुणी भी है तो प्रकृति का ही। और शिव नहीं हैं प्रकृति में। सतोगुण में भी शिव नहीं हैं।
'न मन्त्रो न तीर्थ न वेदा न यज्ञाः।' यह जितने तुम काम करते हो, ये सब तुम अपनी बुद्धि से करते हो, अपना विचार लगाकर करते हो और इन सब कामों में तुम्हारी कामनाएँ छुपी होती हैं — चेतना की कामना का नाम शिव नहीं है। चेतना जिसकी इच्छा कर सके, उसका नाम शिव नहीं है। चेतना जिसकी छवि बना सके, उसका नाम शिव नहीं है। चेतना जिसके बारे में कोई गुण बता सके, उसका नाम भी शिव नहीं है। क्योंकि गुण बताया माने क्या बता दिया? प्रकृति बता दी। और शिव तो वही हैं न — अभी हमने क्या कहा था उनके बारे में? 'जो प्रकृति को इतना जान गया है, जो बोध स्वरूप ही हो गया है कि अब वो प्रकृति का मात्र निष्पक्ष दृष्टा हो सकता है, साक्षी भर हो सकता है। वो प्रकृति का कभी आलिंगन करता भी पाया जा सकता है, लेकिन कभी आसक्त नहीं होने वाला।'
आपको शायद यह पता होगा की बारिश कैसे होती है
लेकिन आपको इस वीडियो में एक-एक छोटी-छोटी डिटेल पता चल जाएगी कि आखिर बारिश होने मैं क्या-क्या चीजों की जरूरत होती है
और किस कारण से बारिश कम हो सकती है
इस वीडियो को अंत तक जरूर देखना 🙏
@arvindchotia चोटिया साहब राजवीर जी ने तो अपनी बात बहुत ही अच्छे तरीके से कह दी अब आप उनकी बात राजभवन तक या राज्य सरकार तक कैसे पहुंचा सकते हो यह आपके प्रयासों से ही संभव हो सकेगा
आज इस आवाज में दर्द है...
राजवीर सिंह चलकोई को हम सुनते रहे हैं। उनकी बोली में हमेशा एक खनक रहती है अल्हड़पन झलकता है। मैंने इस पूरे वीडियो में देखा कि वो बात कहीं भी नहीं है। क्यों?
क्योंकि हमारे आत्मसम्मान पर चोट ही हुई है
राज्यपाल महोदय ने एक आदेश जारी कर राजस्थान के सभी विश्वविद्यालयों में मराठी के केंद्र खोलने के लिए कह दिया है। दूसरी तरफ वर्षों से राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए संघर्ष कर रहे लोग अभी तक राजस्थान के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी के केंद्र नहीं खुलवा पाए हैं। स्कूलों में राजस्थानी की पढ़ाई शुरू नहीं करवा पाए हैं। राजस्थान की राजभाषा नहीं बनवा पाए हैं। पीड़ा तो है। सच्ची है। झलकेगी ही। छलकेगी ही।
राजस्थान वालों के चेहरे पर ऐसा जोरदार झापड़ मारा गया है, जिसका अहसास तो हुआ है लेकिन आत्म गौरव खो चुके लोग यह तय नहीं कर पा रहे कि रिएक्ट क्या करना है और कैसे करना है। इस पीड़ा को सभी सुनें और और सोचें कि हम अभागे लोग कहां खड़े हैं?
वीडियो साभार @republic
33 अक्षरों में छुपा है मृत्यु को रोकने का विज्ञान - महामृत्युंजय मंत्र
क्या आप जानते हैं कि महामृत्युंजय मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है?
यह एक ध्वनि-यंत्र है - जिसके 33 अक्षरों में एक ऐसा ब्रह्मांडीय विज्ञान छुपा है जिसे शिव पुराण में हजारों साल पहले लिखा गया था। मार्कंडेय ऋषि ने सोलह साल की उम्र में यमराज को इसी मंत्र की शक्ति से हराया था। लेकिन उन्होंने यह कैसे किया - यह रहस्य आज तक अधिकांश लोगों तक नहीं पहुंचा।
महामृत्युंजय मंत्र की असली उत्पत्ति - शिव पुराण में मार्कंडेय ऋषि की वह कथा जो इस मंत्र को महज एक श्लोक से अलग करती है
33 अक्षरों का ध्वनि विज्ञान हर अक्षर एक विशेष कंपन पर क्यों टिका है और यह ब्रह्मांड की 33 मूल शक्तियों से कैसे जुडा है
शरीर की कोशिकाओं पर इस मंत्र का वैज्ञानिक प्रभाव - वेगस तंत्रिका, विशुद्ध चक्र, और आधुनिक साउंड थेरेपी का संबंध
किन परिस्थितियों में यह मंत्र सबसे अधिक शक्तिशाली होता है - नाथ योगी परंपरा का वह गुप्त ज्ञान जो गुरु-शिष्य परंपरा में संरक्षित था
गलत उच्चारण और गलत समझ का खतरा चेतावनी जो ऋषियों ने दी थी वह
यह वीडियो उन लोगों के लिए है जो इस मंत्र को केवल रटना नहीं चाहते - बल्कि इसे समझना चाहते हैं, जीना चाहते हैं।
अगर आप अंत तक बने रहे - तो महामृत्युंजय मंत्र के बारे में आपका हर प्रश्न आज यहीं हल हो जाएगा।
कमेंट में लिखिए - मृत्युंजय
क्या आपने कभी महसूस किया है कि जिन विचारों से आप बचना चाहते हैं, वही बार-बार आपके मन में लौट आते हैं? जितना आप किसी विचार को दबाने की कोशिश करते हैं, वह उतना ही शक्तिशाली होकर वापस आता है। आखिर ऐसा क्यों होता है?
हम श्रीमद्भगवद्गीता, योग सूत्र, अष्टावक्र गीता और सनातन ज्ञान की दृष्टि से मन के इस गहरे रहस्य को समझेंगे। जानेंगे कि विचारों से लड़ना समाधान नहीं है, बल्कि साक्षी भाव ही वह मार्ग है जो मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
यदि आपके मन में बार-बार नकारात्मक, डरावने या परेशान करने वाले विचार आते हैं, तो यह वीडियो आपके लिए एक नई दृष्टि लेकर आएगा।
🍁1 मिनट कुंभक से 12 मिनट की उम्र बढ़ती है 🍁
श्वास पर नियंत्रण ही जीवन पर नियंत्रण है।
कुंभक (श्वास रोकना) से प्राण शक्ति का संरक्षण होता है और यही संरक्षण आयु को बढ़ाता है।
नाड़ी शोधन प्राणायाम के तीन भाग
पूरक (श्वास लेना) → कुंभक (श्वास रोकना) → रेचक (श्वास छोड़ना)
हाय-तौबा आखिर किस बात की?
अगर एसीबी ने रिश्वत लेते अधिकारियों को रंगे हाथों पकड़ा है, तो सवाल कार्रवाई पर नहीं, भ्रष्टाचार पर उठना चाहिए। फिर यह नैरेटिव क्यों गढ़ा जा रहा है कि इससे मंत्री किरोड़ी लाल मीणा पर सवाल खड़े हो गए?
हकीकत तो बिल्कुल उलट दिखती है।
किरोड़ी लाल मीणा जब अपने विभाग में लगातार छापेमारी कर रहे थे, जमाखोरों और अधिकारियों की मिलीभगत उजागर कर रहे थे, तब कहा गया कि मंत्री अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। अब वही खेल एसीबी ने पकड़ लिया है—अधिकारी मोटी रकम लेकर बड़े कारोबारियों की धांधलियों पर पर्दा डाल रहे थे।
यानी एसीबी की कार्रवाई ने मंत्री के आरोपों को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत किया है।
यह कार्रवाई दरअसल इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार की जड़ें विभाग के भीतर कितनी गहरी थीं। इतना गहरा नेटवर्क था कि विभागीय मंत्री की सक्रियता के बावजूद कुछ लोग सिस्टम को अपनी जागीर समझकर चलाते रहे।
जांच एसीबी कर रही है, जो दोषी होगा उस पर कार्रवाई होगी। लेकिन इतना तो साफ है कि इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साबित कर दी—किरोड़ी लाल मीणा जिस भ्रष्ट तंत्र की ओर लगातार इशारा कर रहे थे, वह कोई राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं थी, बल्कि जमीन पर मौजूद हकीकत थी।
ऐसे में इस्तीफे की मांग का तर्क समझ से परे है। अगर भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई होना मंत्री की विफलता है, तो फिर भ्रष्टाचारियों को पकड़ना सफलता किसे माना जाएगा?
असल संदेश यह है कि सरकार ने अपनी ही एजेंसी के ज़रिए यह साबित किया है कि सिस्टम में गड़बड़ी थी, और अब उस पर प्रहार हो रहा है। और भजनलाल सरकार में ऐसे भ्रष्ट लोगों हर जगह से ढूँढ निकाला जाएगा
इसलिए यह मामला किसी एक मंत्री के खिलाफ नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही लड़ाई का सबसे बड़ा सबूत बनकर सामने आया है।