सभी देशवासियों के नाम खुला पत्र
क्या आप चाहते हैं कि भारत एक लोकतंत्र बना रहे? यदि हाँ तो कृपया जागे और देखे। SIR - मतदाता सूचि के विशेष पुनरीदान - के नाम पर वोटरों को मतदाता सूची से काट कर लोकतंत्र पर प्रहार किया जा रहा है।
- विशेष पुनरीदान के नाम पर कानून का उल्लंघन कर अभी तक 13 करोड़ मतदाताओं को मतदाता सूची से निकला गया है। इनमे से 99 प्रतिशत गरीब भारतीय नागरिक है।
• कानून की धारा 21 के अनुसार, विशेष पुनरीक्षण केवल विशेष कारणों से ही किया जाना है और वह भी केवल किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से में तथा प्रत्येक मामले में विषिस्ट कारणों को लिखित रूप में उल्लेख किया जाना है। अतः पुरे देश में एक साथ विशेष पुनरीक्षण (Intensive Revision) का आदेश अवैध था। विशेष परिस्थितियों के लिए किया गया अपवाद स्वस्वरूप प्रावधान सामान्य नियम नहीं बन सकता। SIR विशेष गहन पुनरीक्षण को कानूनन ठहराने वाला सुप्रीम कोर्ट का आदेश गलत था।
एक प्रश्न यह भी है कि पूरे देश में SIR का निर्णय किसने लिया? क्या यह पूरे आयोग का निर्णय था या केवल ज्ञानेश कुमार का?
• जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of The People Act 1950) की धारा 21 के अनुसार जब किसी मतदाता सूची (Electoral Roll) का पुनरीक्षण शुरू किया जाता है, तो पुनरीक्षण की अधिसूचना जारी किए जाने के समय लागू मतदाता सूची तब तक प्रभावी रहती है जब तक पुनरीक्षण समाप्त होने की उपरांत नई मतदाता सूची प्रकाशित नहीं हो जाती है। पुनरीक्षण तभी पूर्ण मानी जाती है जब नाम जोड़ने या हटाने के संबंध में दायर सभी अपीलों का निपटारा हो जाए। जहाँ अपीलें लंबित थीं, वहाँ पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई थी, अतः पुनरीक्षण के पूर्व वैध मतदाता सूची का ही उपयोग किया जाना था। इसके विपरीत, पुनरीक्षण में तैयार की जा रही नई मतदाता सूची - जो उस समय अपूर्ण थी चूँकि लाखों अपील लंबित थी उसका उपयोग चुनाव हेतु किया गया। यह अवैध था।
• जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 के अनुसार, किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाने का अधिकार केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को है, किसी अन्य व्यक्ति को नहीं; और वह भी केवल धारा 22(a), (b) और (c) में दिए गए कारणों के आधार पर विशिष्ट जांच करने तथा संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर दिए जाने के उपरांत ही आदेश पारित करके और उस आदेश के विरुद्ध अपीलों के निपटारे के बाद ही नाम हटाया जा सकता है। ज्ञानेश कुमार ने 2003 के बाद मतदाता सूची में ERO द्वारा वैध तरीके से जोड़े गए सभी मतदाताओं के नाम बिना किसी आधार, बिना किसी जांच और पंजीकृत मतदाताओं को कोई कारण बताओ नोटिस दिए बिना हटा दिया। यह स्पष्ट रूप से अवैध था।
जिन व्यक्तियों के नाम बिना उचित प्रक्रिया के हटा दिए गए, उन्हें नए मतदाता के रूप में फॉर्म 6 भरकर आवेदन करना पड़ा और यह प्रमाण देना पड़ा कि वे पंजीकरण के पात्र हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय के Lal Babu Hussain and Others v. Electoral Registration Officer and Others, [(1995) 3 SCC 100] के फैसले का स्पष्ट उल्लंघन है। इस फैसले में कहा गया था कि किसी पंजीकृत मतदाता को अयोग्य ठहराने के दावे के समर्थन में आवश्यक साक्ष्य जांच प्राधिकारी द्वारा या आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत करना होगा, न कि मतदाता को; और ऐसे मामलों में मतदाता को अवसर दिया जायगा कि जांच अधिकारी द्वारा प्रस्तुत आधारों पर अपनी प्रतिक्रिया दे और उसके उपरांत मतदाता पंजीकरण पदाधिकारी द्वारा सुनवाई कर लिखित आदेश दिया जाएगा। इनमें से कुछ भी नहीं किया गया।
स्थापित न्यायिक सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति पर किसी प्रकार की अयोग्यता या दंड लगाए जाने के लिए पर्याप्त आधार होने का प्रमाण देने का भार उस व्यक्ति या संस्था पर होता है जो वह दंड या कार्रवाई करना चाहती है। ज्ञानेश कुमार ने प्रमाण का भार उलट दिया है। यह भी कानून के विरुद्ध है।
अब तक सभी सरकार और निर्वाचन आयोगों के प्रयास हमेशा रहा है कि सभी पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल किया जाए। यह लोकतंत्र को मजबूत करने और सभी नागरिकों को सशक्त बनाने का मिशन था। देश के इतिहास में यह पहली बार है कि पुनरीक्षण का मकसद अधिक से अधिक मतदाताओं को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करना बन गया।
ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म छे में एक नया परिशिष्ट (Appendix) जोड़ दिया। उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि फॉर्म 6 वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित है। उन्होंने यह परिशिष्ट दोनों निर्वाचन आयुक्तों की राय के विरुद्ध जोड़ा। कानून के अनुसार आयोग के निर्णय या तो सर्वसम्मति से लिए जाने है अथवा बहुमत से। इस मामले में दोनों निर्वाचन आयुक्त इस नए परिशिष्ट को जोड़ने के खिलाफ थे। इसलिए नया परिशिष्ट जोड़ना स्वयं आयोग के निर्णय के विरुद्ध था। फिर इसे कैसे जोड़ा गया और किसके आदेश पर यह सवाल है। यह परिशिष्ट अभी भी लागू है। इस परिशिष्ट में मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदक से कहा गया है कि वे यह बताये कि 2003 की मतदाता सूची में उनके माता पिता का नाम किस क्रमांक पर था। ज़रा सोचें कि 18 वर्ष का कोई युवा—2003 की मतदाता सूची कैसे उपलब्ध कर सकता है? इससे सभी युवा मतदाताओं के पंजीकरण में बाधा उत्पन्न हुई। BJP जानती है कि युवा मतदाता उसे वोट नहीं देंगे।
फॉर्म 7 में मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के विरुद्ध आपत्तियाँ दी जा सकती हैं। बड़ी संख्या में एक साथ सैकड़ों, हजारों, लाखों आपत्तियां फॉर्म 7 में दाखिल की गईं। इन्हें किसने दाखिल किया? जिन लोगों का इन पर हस्ताक्षर है, वे स्वयं उपस्थित नहीं हुए। फिर इन फॉर्मों को कैसे स्वीकार किया गया और उन पर कार्रवाई कैसे की गई? ये आपत्तियां किसी राजनितिक दाल द्वारा थोक में जाली दस्तखत कराकर कराई गयी होगी। उन्हें बिना सवाल किये स्वीकार कर लिया गया और उसके आधार पर मतदाताओं का पंजीकरण रोका गया। यह सरासर धांधली थी।
बंगाल में ERO द्वारा वैध पाए गए 16 लाख मतदाताओं के नाम पंजीकृत नहीं किए गए क्योंकि किसी ने उनके विरुद्ध अपीलें दाखिल कीं। किस ने या किन लोगों ने अपील दायर किया यह स्पष्ट नहीं है। कहा जाता है कि आयोग ने खुद अपील दायर किया। आयोग मतदाता के पंजीकरण के विरुद्ध अपील दायर करे यह अप्रत्याशित है। आयोग को अपील दाखिल करने का अधिकार किसने दिया? दो निर्वाचन आयुक्तों का कहना है कि उन्होंने ऐसा करने का निर्देश नहीं दिया। इसलिए आयोग ने किसी को अपील दाखिल करने के लिए अधिकृत नहीं किया था। फिर यह किसने अपील दायर किया? ज्ञानेश कुमार ने? इस आधार पर उन मतदाताओं को चुनाव में मतदान करने से रोक दिया गया। यह गंभीर धांधली है।
क्या निर्वाचन आयोग और किसी राजनीतिक दल के कुछ लोग मिलीभगत करके बड़ी संख्या में फर्जी फॉर्म 7 की आपत्तियाँ दाखिल करवा रहे थे और नाम हटवा रहे थे?
जब लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित थीं, तब चुनाव कैसे होने दिए गए? निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को इसका जवाब देना होगा। जिन अपीलों का अब तक निपटारा हुआ है, वे दिखाती हैं कि जिन मतदाताओं को बाहर रखा गया था, उसमे 90 प्रतिशत वैध मतदाता थे।
एक हास्यास्पद बात सामने आई है। अब मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के ERO के आदेश पर कंप्यूटर भी आपत्ति कर पंजीकरण रोक देता है। इसको कहा गया है "logical discrepancy"। यह बताया गया है कि पिता और पुत्र में 15 वर्ष से काम का अंतर "logical discrepancy" है। ज्ञानेश कुमार को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि भारत में गरीब लोग कैसे रहते हैं। उनके बच्चे अस्पतालों में पैदा नहीं होते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं होते। आज़ादी के इतने वर्षो बाद भी हमारे अधिकांश गरीब मतदाता अनपढ़ है। उनके घरों में कैलेंडर नहीं होते। जब BLO उन्हें मतदाता सूची में शामिल करने के लिए उनके पास जाता है तो वे अपने जन्म का वर्ष अंदाजे से बताते है। इसी प्रकार, जब उनके पिता के नाम निर्वाचक नामावली में दर्ज किया गया तब उन्होंने भी अपने जन्म का वर्ष अंदाजे से बताया था। इसमें एक दो वर्ष इधर उधर होंगे। उसे logical discrepancy बताकर मतदाता सूची में उनका पंजीकरण रोक देना - जब कि वह व्यक्ति आपके सामने है, व्यस्क है तथा भारतीय है गरीब के साथ अन्याय है। कंप्यूटर द्वारा "logical discrepancy" बताये जाने के आधार पर लाखों लोगों के नाम बिना किसी जांच के हटा दिए गए। यह अधिनियम की धारा 21 के सरासर विरुद्ध है।
सबसे अधिक संख्या में बाहर किए गए लोग गरीब और वंचित वर्गों से हैं—वे लोग जिनकी कोई आवाज नहीं है। वे अपने घरों से दूर रहकर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। लाखों लोग दूर-दराज के स्थानों/राज्यों में काम कर रहे हैं। वे अपने नाम दर्ज कराने के लिए एक महीने के लिए अपने घर वापस जाने का खर्च नहीं उठा सकते। यदि वे काम नहीं करेंगे तो भूखे रह जाएंगे। वे जटिल फॉर्म नहीं भर सकते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र और आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं। वे वोट के लिए अपनी रोज की मजदूरी का नुकसान उठाना नहीं चाहते हैं। अधिकतर इन गरीब लोगों का नाम मतदाता सूची से काट दिया गया। इससे विदेशी नहीं छंटे। विदेशी नागरिक जो अवैध रूप से भारत आये है वे सबसे पहले अपने कागजात - आधार कार्ड/राशन कार्ड - बनवा लेते है। निर्वाचन आयोग में बैठे लोगों को यह समझ नहीं आया।
ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूची को कंप्यूटर पर डाल कर उस डिजिटल मतदाता सूची पर पूरा नियंत्रण अपने तथा अपने अधीन एक पदाधिकारी द्वारा कर रखे है। उस डिजिटल मतदाता सूची पर बाकी दोनों चुनाव आयुक्त को कोई अधिकार नहीं है। जो Electoral Registration officer - मतदान पंजीकरण पदाधिकारी मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का आदेश पारित करते है - अथवा उनके अपीलीय पदाधिकारी आदेश पारित करते है वे लागू होंगे या नहीं यह आयोग तय करता है। ERO के आदेश के बाद भी logical discrepancy के नाम पर मतदाता के नाम नहीं दर्ज जाते है। यह कानून के विरुद्ध है। कानून के अनुसार नाम जोड़ने या हटाने और मतदाता सूची प्रकाशित करने का अधिकार केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को दिया गया है। इसके विपरीत, मतदाता सूची को केंद्रीकृत कर दिया गया और मतदाता सूची का पुनरीक्षण भी केंद्रीय स्तर पर किया गया। यह अवैध था।
दोनों निर्वाचन आयुक्तों को ERO तथा DEO और CEO, जो कानून द्वारा मतदाता सूची मई नाम जोड़ने या हटाने के लिए अधिकृत है ने बताया कि उनको मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने नहीं दिया जा रहा है। गोवा में 97 मतदाताओं को वैध और मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया गया। वहाँ के ERO, DEO तथा CEO मतदाता सूची में उनका नाम शामिल नहीं करवा पाए हैं।
मतदाता सूची में संशोधन का केंद्रीकरण गैर कानूनी एवं खतरनाक है। इसका उपयोग उन बूथों से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा सकता है जो किसी पार्टी विशेष के विरुद्ध मतदान करते हैं। क्या ऐसा ही हुआ?
बिना जांच तथा सुनवाई के मतदाताओं के नाम हटाना एक गंभीर अपराध है और ज्ञानेश कुमार इसके लिए दोषी हैं।
SIR के माध्यम से अब तक 13 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं। यह कुल मतदाताओं का 13% है और SIR अभी समाप्त नहीं हुआ है। 2024 के चुनावों में NDA और INDIA के बीच अंतर केवल 3% था। इसलिए इन नामों को हटाए जाने का चुनावों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है और पड़ेगा।
26 सितंबर को आयोग की बैठक के बाद जारी प्रेस नोट ऊपर बताए गए अवैध कार्यों की पुष्टि करता है।
प्रश्न है कि ज्ञानेश कुमार ने ये सभी अवैध कार्य स्वतः किए या किसी ने उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया?
विपक्ष का कहना है कि वह ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाएगा। यह व्यर्थ होगा। इसके लिए विपक्ष के पास आवश्यक संख्या नहीं है। यदि वास्तव में उन्हें निष्पक्ष चुनाव चाहिए, तो उन्हें ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज कराने चाहिए, तथा सभी विपक्षी दल एकजुट होकर निश्चय करें कि वे तब तक किसी भी चुनाव में भाग नहीं लेंगे, जब तक कि वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्त इस्तीफा नहीं देते और उनके उत्तराधिकारियों का चयन पिछली चयन प्रणाली के अनुसार नहीं किया जाता—जिसमें प्रधानमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। उन्हें यह भी मांग करनी चाहिए कि जिन राज्यों में लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित रहते हुए चुनाव कराए गए, उन चुनावों को निरस्त किया जाए और नए चुनाव कराए जाए। यह भी माँग हो कि मतदान EVM के बजाय बैलेट पेपर से हो, क्योंकि अभी तक ऐसी कोई इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली नहीं बनाई गई है जिसे हैक न किया जा सके। यही कारण है कि विकसित देशों में EVM का उपयोग नहीं किया जाता।
यदि हम अपने लोकतंत्र को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो पूरे देश को जागरूक और एकजुट करना होगा।
SIR पर दिए गए फैसले से सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है। यह प्रतिष्ठा की दृष्टि से उस फैसले के समान है जिसने आपातकाल को सही ठहराया था। निर्वाचन आयुक्तों के चयन से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर हो रही देरी भी सर्वोच्च न्यायालय के बारे में गलत संदेश दे रही है—क्योंकि यह स्पष्ट है कि निर्वाचन आयुक्तों का चयन सत्तारूढ़ दल द्वारा नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष चयन समिति द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि उनकी निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
आइए, हम सब मिलकर लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट हों।
आर. के. सिंह
(सेवानिवृत्त IAS, पूर्व केंद्रीय गृह सचिव)
@abhijeet_dipke@Cockroachisback@RahulGandhi@kharge@ArvindKejriwal@MamataOfficial@yadavakhilesh@mkstalin@yadavtejashwi@Pawankhera
दिल्ली की BJP सरकार के एक मंत्री वीडियो में एक नौजवान को थप्पड़ मारते दिख रहे हैं।
उसका गुनाह? वो वीडियो बना रहा था।
मंत्री के सामने सड़क खोदकर दिखाई जा रही थी, और उसके हाथ में कैमरा था।
ये उस सत्ता का चेहरा है जिसे अब वोटर से डर लगना बंद हो गया है।
सड़क पर सवाल पूछो - थप्पड़।
पेपर लीक पर सवाल पूछो - लाठी।
संसद में सवाल पूछो - माइक बंद।
ये लोग ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि इन्हें अब ये डर ही नहीं कि चुनाव इन्हें हटा सकता है। वोट चोरी यही ख़रीदती है - सिर्फ़ नतीजा नहीं, उसके बाद आने वाला अहंकार भी।
जो सरकार जीत को पक्का मान लेती है, उसे आपकी रज़ामंदी नहीं चाहिए - आपकी ख़ामोशी और अंधभक्ति चाहिए।
मैं हूँ बॉन्ड
क़र्ज़ अमेरिका की सरकार ले रही है और भुगत भारत का शेयर बाज़ार रहा है. आप सोच रहे होंगे कि ये क्या बात हुई? तो हिसाब किताब में समझ लीजिए.
अमेरिकी सरकार (दुनिया की हर सरकार)अपना खर्च पूरा करने के लिए बॉन्ड बेचती है.निवेशक बॉन्ड ख़रीदकर सरकार को डॉलर देते हैं. सरकार की आमदनी कम होती है और खर्च ज़्यादा. इसकी भरपाई बॉन्ड से होती है.इसमें 10 और 30 साल अवधि के बॉन्ड की चर्चा ज़्यादा है. अमेरिकी बॉन्ड सबसे सेफ माने जाते हैं. इसके पीछे निवेशकों का विश्वास है कि अमेरिका की सरकार डिफ़ॉल्ट नहीं कर सकती है. 10 साल बॉन्ड पर अब 5.2% ब्याज मिल रहा है तो विदेशी निवेशक (FII) भारतीय शेयरों में पैसे क्यों लगाएँगे? यहां रिस्क है और वहाँ लगभग रिस्क फ्री.
अब भारतीय शेयर बाजार की हालत देखिए. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का सूचकांक निफ़्टी सितंबर 2024 में 26 हज़ार के आसपास था और अब 23 हज़ार के क़रीब घूम रहा है. अगर आपने निफ़्टी में दो साल पहले 1 लाख रुपये लगाए थे तो आज उनकी क़ीमत करीब 90 हज़ार रुपये होती यानी आप 10 हज़ार रुपये के घाटे पर बैठे होते. शेयर बाज़ार पिछले दो साल से बढ़ ही नहीं रहा है. इसका एक बड़ा कारण है कि विदेशी निवेशकों (FII) ने भारत से हाथ खींच लिए हैं. वो करीब 5 लाख करोड़ रुपये की नेट बिक्री कर चुके हैं.
FII के हाथ खींचने के कई कारण हैं.
AI स्टॉक भारत में नहीं है. अमेरिका, कोरिया और ताइवान में AI शेयरों के कारण तेज़ी है.
भारतीय शेयरों का महंगा होना.निफ़्टी का PE रेशियो 20 है जबकि 15 साल का औसत 17 रहा है यानी गिरावट के बाद भी बाजार महंगा है.
डॉलर के मुक़ाबले रुपया टूटने से FII का रिटर्न कम हो जाता है. इस साल की शुरुआत में डॉलर की क़ीमत ₹90 के आसपास थी और अब ₹96. जब
FII शेयर बेचकर अपने देश ले जाते हैं तो उन्हें डॉलर ख़रीदने पड़ते हैं. जब शेयर ख़रीदे थे तो डॉलर बेचकर रूपए लगाए थे. डॉलर महंगा होने से उनका रिटर्न कम होता है.
इस कड़ी में अमेरिकी बॉन्ड भी जुड़ गए हैं जब वहाँ 5% सेफ रिटर्न हैं तो भारत के शेयरों में रिस्क क्यों लिया जाएँ? आप जानते ही हैं कि शेयरों में बॉन्ड से ज़्यादा रिस्क है.
अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड बढ़ना दुनिया भर की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है. अमेरिकी सरकार का क़र्ज़ 40 ट्रिलियन डॉलर पार कर चुका है. टैरिफ़ और ईरान युद्ध के कारण निवेशकों में अमेरिकी बॉन्ड को लेकर चिंता बढ़ गई है. वहाँ ब्याज दरों में और बढ़ोतरी होने की आशंका है. हमारे यहां भी बढ़ोतरी के आसार बने हुए हैं. ब्याज दर बढ़ती है तो चाहे सरकार हो या कंपनी, कमजोरी बाहर आ जाती हैं. क़र्ज़ लेकर आख़िर कब तक घी पी सकते हैं.
🚨IMPORTANT NEWS🚨
Since Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar is in the news, I have some very important but sad news to share about a Supreme Court judge.
Supreme Court judge Justice Satish Chandra Sharma. Just two months away from retirement.
If you remember, the Allahabad High Court had imposed a penalty on Medha Roopam, the DM of Noida and daughter of Gyanesh Kumar with a fine of five lakh rupees for irrationally issuing NSA order against a student Activist for Noida labour protest.
That order was challenged before the Supreme Court of India. Live Law, the news portal, reported that Gyanesh’s daughter’s case was listed before Justice Satish Chandra Sharma out of turn and in violation of the Supreme Court roster and rules and convention. The challenge ought to have gone before Justice Nagarathna’s bench, known to be an independent upright judge.
Two days back, when the matter was listed for hearing, Justice Sharma‘s bench switched off the audio of the Supreme Court proceeding, which is highly unusual and almost never done. ALARMING. There was no explanation from the judge’s side as to why this extraordinary favour was done for Gyanesh’s daughter.
In any case the fine and the adverse remarks of the Allahabad High Court were stayed by Justice Sharma immediately.
Same day, in another case related to Gyanesh Kumar—the constitutional challenge that was filed against the 2023 law on election commissioners of India was finally decided by a two judge bench of which Justice Sharma was a part of.
Under challenge was the appointments procedure where the leader of opposition today holds only an ornamental seat in the Three-member selection committee that selects Election commissioner of India. The other two are PM and his Cabinet Minister. Justice Sharma dissented which led to a split verdict and the case has now been sent before the Chief Justice of India for constituting a larger bench. This has delayed the case by years probably. This split verdict itself came after three years. This is how the Supreme Court refuses to hear most important cases that affect our lives and the country.
A separate blanket immunity granted to past and present election commissioners of India by Modi’s government is also pending for last 9 months before CJI Surya Kant. Today, the Chief Election Commissioner has been exposed for gross illegalities and for stealing votes and elections at the behest of powers that be. Any sane, sorted, neutral, just person can see that the selection process of ECIs is not independent and tilted in govt’s favour. But not Justice Sharma.
And here’s the big news: his son holds not one, not two, but four big, plum government counsel panels, including income, tax department, GST, customs, and excise, and a Madhya Pradesh government lawyer panel. I need not explain the great perks and influence that come along when you hold such plum government panels. Read my Justice Swarana Kanta Sharma report where I exposed the same thing.
I am withholding the name of the son for now.
The important question is: how can a judge be expected to do impartial and fair Justice in politically sensitive cases if his family members serve at the pleasure of the government? The judge is also retiring two months later, and several lawyers have informed me that there are vacancies in NCLAT and other search plum tribunals.
I’M SORRY TO SAY such a system of judiciary does not inspire confidence in its ability to do impartial justice. There is a reason why the ethics code for judges require them to maintain a sense of aloofness and not do anything which can harm the their image and that of the judiciary.
Both in Justice Swarna Kanta’s case and several other judges case, including that of the Supreme Court, it is TRAGIC to notice the complete capture of the institution of the Indian judiciary. Can the judiciary go on like this?
@RitikaChopra__ और @1Simranbakshi , दो महिलाओं ने इस मोदी सरकार के गुब्बारे को एक ही दिन में फोड़ कर जमीन पर ला दिया है.
और अब चूहे जहाज बदलने लगे है.
Hats off to these Rani lakshmibai.
नोएडा DM मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से राहत तो मिल गई लेकिन CJI जस्टिस सूर्यकांत पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है ! क्या राहत देने के लिए बदली गई बेंच?
https://t.co/vKa8ZmvN7B
Yesterday, @IndianExpress reported an unprecedented rupture inside the Election Commission: TWO of its three members objecting on record, 14 times in 10 months, to decisions taken without their knowledge.
Today, the second part of our investigation looks at the concern Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi flagged most often: Who really controls our electoral rolls?
We followed that question to Goa, where we found something deeply concerning.
Stay with me....
(1/14) 🧵
“Yeh blackmailing kism ke aadmi hai”… yes 100% correct @Subhashgarg1960 ! Fake degree kism ke aadmi bhi. Don’t fear his defamation/ Lokpal/ ED/CBI threats - tell him to blow his pipe till he bursts. Well done, Sir for speaking the truth. Respect.
Shame on all those journalists, especially the senior ones who will put out stories today on how the ECI has denied the story by @RitikaChopra__. You could not do the work she did, at least stop being govt’s puppet for a day. Instead ask for accountability. Millions suffering
The Election Commission of India is under fire like never before.
The SIR has struck 13 crore names off draft rolls, putting the EC at the centre of intense public debate over its role in deciding who gets to vote — and who doesn’t.
HOWEVER, what nobody knew: through that same period, some of the sharpest questions were being asked from inside.
Out today, after months of work. Our #ExpressInvestigation 🧵
(1/10)
बीजेपी के मीडिया विभाग और रणनीतिकार अगर समझदार होंगे तो इस विडियो पर प्रतिक्रिया नहीं देंगे।अन्यथा ये बात दूर तक चली जाएगी।राहुल गांधी की टीम तो यही चाहती हैं कि बीजेपी इसका मुद्दा बनाए…
FCNR(B) scheme will cost India at least 1.75 lakh crore in additional interest payments and 3.18 lakh crore in foreign exchange depreciation. A 1.76 lakh crore notional loss in bad old days had created a storm. What about this 3 times larger loss? https://t.co/04eLQow33y
टाटा में खेला कैसे हुआ?
टाटा संस के सबसे बड़े शेयर होल्डर टाटा ट्रस्ट (करीब 66%) हैं. टाटा परिवार के पास करीब 3% शेयर हैं. परिवार ने ग्रुप की रचना इस तरह से बनाई है कि टाटा संस का शेयर होल्डर होने के नाते ट्रस्ट को डिवीडेंड मिलता रहेगा और डिवीडेंड से चैरिटी के काम चलते रहेंगे. टाटा संस ग्रुप की बाकी कंपनियों का प्रमोटर हैं.
टाटा संस के बोर्ड में अभी 6 डायरेक्टर हैं इनमें से 2 डायरेक्टर नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवास ट्रस्ट की तरफ़ से हैं. वेणु दक्षिण भारत के TVS ग्रुप से आते हैं. ट्रस्ट ने N चंद्रशेखरन के दोबारा चेयरमैन नहीं बनने के फ़ैसले के बाद उनका उत्तराधिकारी खोजने की प्रकिया शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया था. ट्रस्ट टाटा संस का IPO लाने के खिलाफ था. रिजर्व बैंक ने टाटा संस को लिस्ट करने का आदेश दिया है. नोएल इसके खिलाफ है क्योंकि यह टाटा की परंपरा के विपरीत है.
टाटा संस की बोर्ड मीटिंग में आज वेणु श्रीनिवासन ने टाटा ट्रस्ट की राय के खिलाफ जाकर वोट डाला. 4-1 से फ़ैसला हुआ कि चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाया जाए और IPO लाया जाए.अकेले नोएल टाटा ने विरोध में वोट डाला. चंद्रशेखरन ने वोट नहीं डाला.
टाटा ट्रस्ट कह रहा है कि चेयरमैन की नियुक्ति अवैध है. टाटा संस के Article of Association के मुताबिक़ ट्रस्ट के वोटों का बहुमत ज़रूरी है. ट्रस्ट का वोट 1-1 ( वेणु और नोएल) बंट गया है इसलिए यह नियुक्ति अवैध है. यह क़ानूनी लड़ाई लंबी चलेगी. फिलहाल टाटा ग्रुप में टाटा की ही नहीं चल सकी है.
UPI चार्ज और झुठल्ली संघियों का खेल समझिए 👇
बैंक ट्रांसफर में 24 घंटे लगते हैं
20 हजार से ऊपर कैश ले नहीं सकते
कार्ड स्वाइप पे भी चार्ज है
अब UPI पे भी चार्ज है
इन भाई साहब का कैलकुलेशन है कि "होल सेल के व्यापार में मुझे साल भर का 60 लाख से एक करोड़ भरना पड़ेगा तो मैं कहां से करूंगा? इसका बोझ कस्टमर पर आएगा।"
अमेरिका के दबाव नरेंदर ने तगड़ा सरेंडर किया है।
यूपी में करोड़ों रुपये ख़र्च करके एक्सप्रेसवे बनाए गए. मगर ऐसे कई मौक़े रहे, जब उद्घाटन के कुछ दिनों या महीनों के अंदर ही एक्सप्रेसवे कई जगहों से ख़राब हाल में दिखे.
बीबीसी ने यूपी में एक्सप्रेसवे में ऐसी कई जगहों का दौरा किया. कुछ जगह नए एक्सप्रेसवे पर इतने गड्ढे दिखे कि गिनती करना भी मुश्किल हो गया.
एनएचएआई ने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे में आई गड़बड़ियों को लेकर पीएनसी इंफ्राटेक की सब्सिडियरी कंपनी अवध एक्सप्रेसवे प्राइवेट लिमिटेड को तीन साल के लिए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, एनएचएआई और उनकी एजेंसियों से जुड़े किसी भी प्रोजेक्ट में भविष्य में बोली लगाने से प्रतिबंधित कर दिया है
कंपनी के पास इस प्रतिबंध के ख़िलाफ़ अदालत जाने का विकल्प है.
देखिए यूपी से बीबीसी की प्रेरणा और तारिक ख़ान की ये ग्राउंड रिपोर्ट.
@bbcprerana@shehrigrapher
Bhai Chandra sahab ke ₹22,000 crores maaf nahi karte to India mein UPI agle 20 saal tak free chal jaata by government’s number of ₹8,000 crores subsidy.
Also NPCI - which runs UPI has ₹6,119 hard cash on its balance sheet and pre tax operating profit of ₹1,900 crores. NPCI apne cash pe and profits par zindagi bhar UPI free chala sakti hai. Government ka kuchh lena dena hi nahi hai. Government earned ₹1,000 crores tax from NPCI last year.