भगवान स्वयं तो कभी-कभी प्रकट होते हैं और किसी किसी का, अहिल्या का, शबरी का, किसी किसी का उद्धार करते हैं लेकिन भगवन्नाम तो सदा गुरुओं के द्वारा प्रकट होता रहता है और कईयों का असंख्य लोगों का भला करता रहता है। तो भगवन्नाम भगवान से भी बड़ा माना गया है। 'राम न सकहिं नाम गुन गाई', भगवान भी भगवन्नाम की महिमा नहीं गा सकते, भगवन्नाम की महिमा इतनी सारी भगवान ने भर रखी है!
#AsharamjiBapu
जो सूक्ष्म मंत्र हैं, वैदिक मंत्र हैं, किसी व्यक्ति ने नहीं बनाए, ऋषियों ने भी नही बनाए..., ऋषियों ने गहरे ध्यान में मन्त्रों की ध्वनि पाई और मंत्रों के अर्थ समझें और मन्त्रों की शक्तियों का दर्शन किया....। जैसे गायत्री मंत्र का सामर्थ्य और दर्शन विश्वामित्र ऋषि को हुआ इसीलिए गायत्री मंत्र के ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं।
#AsharamjiBapuQuotes
कलयुग केवल हरि गुण गाहा ।
गावत नर पावहि भव थाहा ।।
अगर तुम ठान लो या हम ठान लें, यहाँ आधा घंटा, एक घंटा हरि नाम कीर्तन करें तो आनंद ही आनंद.....
#AsharamjiBapuQuotes
Sanatan Dharma के ऋषियों ने
#MantraShakti खोजी। संत श्री आशारामजी बापू ने इस मंत्र शक्ति की महिमा व विज्ञान को समाज तक पहुंचाया तथा मंत्र के खोजकर्ता, मंत्र का प्रभाव आदि सभी रहस्यों से अवगत करवाया जिससे लोगों को शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक आदि लाभ हुए।
दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत्।
सा दृष्टिः परमोदारा न नासाग्रावलोकनी ।।११६।।
("अपरोक्षानुभूति")
भगवद्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्यकृत अपरोक्षानुभूति का यह श्लोक साधना के भीतरी, तात्त्विक और अद्वैतमय स्वरूप को अत्यन्त मार्मिक ढंग से उद्घाटित करता है। यहाँ भगवद्पाद साधक को बाह्य योगाभ्यास की सीमाओं से उठाकर उस दिव्य ज्ञान-दृष्टि की ओर ले जाते हैं, जिसके द्वारा समस्त जगत् ब्रह्ममय प्रत्यक्ष होता है। यह श्लोक केवल दृष्टि की दिशा बदलने का उपदेश नहीं देता, अपितु दृष्टा की चेतना को रूपान्तरित करने का आह्वान करता है। यही कारण है कि वे कहते हैं - “दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा” अपनी दृष्टि को ज्ञानमयी बनाकर जगत् को ब्रह्ममय देखो। यही परम उदार दृष्टि है, केवल नासिका के अग्रभाग को देखने वाली दृष्टि नहीं।
यहाँ “दृष्टि” शब्द का अर्थ केवल नेत्रों की क्रिया नहीं है। शंकर-वेदान्त में दृष्टि का आशय उस अन्तर्बोध से है, उस तत्त्वविवेकपूर्ण चेतना से है, जिसके अनुसार साधक वस्तुओं का अवलोकन करता है। अज्ञानावस्था में यही दृष्टि नाम-रूप, भेद-विभेद, प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख, अपना-पराया, ऊँच-नीच के रूप में संसार को देखती है। परन्तु जब यही दृष्टि श्रवण, मनन, निदिध्यासन से शुद्ध होकर ज्ञानमयी हो जाती है, तब वही जगत् जो पहले भिन्न-भिन्न वस्तुओं का समूह प्रतीत होता था, अब एक ही ब्रह्मतत्त्व की विविध प्रतीतियों के रूप में अनुभव होने लगता है। तब जगत् नष्ट नहीं होता, दृष्टि रूपान्तरित हो जाती है।
“पश्येद् ब्रह्ममयं जगत्” यह पद इस श्लोक का हृदय है। जगत् को ब्रह्ममय देखना अर्थात् प्रत्येक वस्तु के अधिष्ठान में एक ही चैतन्य, एक ही सत्ता, एक ही अखण्ड तत्त्व का साक्षात्कार करना। जैसे सुवर्ण से बने कङ्कण, कुण्डल, हार, मुद्रिका इत्यादि अनेक नाम-रूप धारण कर लें, तथापि तत्त्वतः वे सब सुवर्ण ही हैं; जैसे मिट्टी से बने घट, पात्र, मृद्भाण्ड अनेक रूप धारण करें, पर उनका सत्य मिट्टी ही है; उसी प्रकार यह सम्पूर्ण दृश्य जगत् नाम-रूपात्मक विविधता में प्रकाशित होते हुए भी अपने अधिष्ठान में ब्रह्म ही है। ज्ञानमयी दृष्टि उसी अधिष्ठान को देखती है; अज्ञानमयी दृष्टि केवल नाम-रूपों में उलझी रहती है।
भगवद्पाद यहाँ बाह्य योगाभ्यास की एक विशिष्ट प्रवृत्ति का अत्यन्त सूक्ष्म निरूपण भी करते हैं। कई साधना-पद्धतियों में नासाग्रदृष्टि नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर रखना एक उपयुक्त अभ्यास माना गया है। यह चित्त-एकाग्रता के लिए सहायक हो सकता है; परन्तु यदि साधक इसे ही साधना का चरम फल समझ ले, तो वह बाह्य साधन को ही साध्य मान बैठता है। इसी भ्रान्ति को दूर करते हुए आचार्य कहते हैं - “सा दृष्टिः परमोदारा न नासाग्रावलोकनी” वह दृष्टि परम उदार है जो जगत् को ब्रह्ममय देखती है; नासिका के अग्रभाग पर स्थिर रहने वाली दृष्टि नहीं। यहाँ “परमोदारा” शब्द अत्यन्त सारगर्भित है। उदार वह है जो सीमितता से ऊपर उठे, जो संकीर्णता को त्यागे, जो अंश में न रुककर समग्र को देखे। ज्ञानदृष्टि इसलिए परम उदार है कि वह किसी एक बिन्दु, किसी एक आकृति, किसी एक शारीरिक स्थिति में सीमित नहीं रहती; वह समस्त विश्व को एकरस ब्रह्मस्वरूप में आलोकित देखती है।
शाङ्करभाष्य की शैली में विचार करें तो जगत् की ब्रह्ममयता कोई कल्पना नहीं, प्रत्युत अध्यारोपापवाद की प्रक्रिया से उद्घाटित सत्य है। अज्ञानवश हम ब्रह्मणि जगदध्यास करते हैं जैसे रज्जु में सर्प का अध्यास। ज्ञान होने पर सर्प का पृथक् नाश नहीं करना पड़ता; केवल रज्जु का यथार्थ ज्ञान हो जाने से सर्प-बुद्धि निवृत्त हो जाती है। इसी प्रकार ब्रह्म के ज्ञान से जगत् के नाम-रूपात्मक भेदों की परमार्थसत्ता निवृत्त हो जाती है, और वही जगत् ब्रह्ममय दृष्ट होता है। अतः ज्ञानमयी दृष्टि का अर्थ यह नहीं कि दृश्य जगत् को छोड़कर किसी अन्य लोक को देखा जाए; बल्कि यही कि दृश्य के भीतर अदृश्य अधिष्ठान का बोध हो।
इस श्लोक का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है कि यह साधना को संकुचित अभ्यास से मुक्त कर अस्तित्व की समग्रता तक विस्तार देता है। यदि साधना केवल नेत्रों को किसी बिन्दु पर टिकाने तक सीमित रह जाए, तो वह चेतना के व्यापक रूपान्तरण तक नहीं पहुँचती। पर जब दृष्टि ज्ञानमयी होती है, तब साधक जहाँ भी देखता है, वहाँ ब्रह्म ही देखता है; जिसे भी देखता है, उसमें आत्मतत्त्व ही अनुभव करता है; जो कुछ भी अनुभव करता है, उसे चैतन्य के आलोक में ही जानता है। यही सर्वं खल्विदं ब्रह्म की अनुभूति है। यही दृष्टि भेद को मिटाती है, राग-द्वेष को शमित करती है, अहंता-ममता को क्षीण करती है, और साधक को समत्व तथा करुणा से परिपूर्ण बना देती है।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
कथा-कीर्तन जा घर नही, संत नही मेहमान।
वा घर जमडा डेरा दीनहा, सांझ पडे शमशान।।"
जिस घर में सत्संग और सेवा का अभाव है, वहाँ आध्यात्मिक ऊर्जा मृत हो जाती है। घर को मंदिर बनाने के लिए भक्ति और सात्विक चर्चा को जीवन का हिस्सा बनाएं। 📿🙌
#DailyWisdom#Spirituality#PositiveVibes
Hari Om! May the divine light guide you on your journey. May your path be filled with love, wisdom, and creativity. Keep shining your light and spreading positivity!
बहुत लोग साधना के लिए निकल पड़ते है । परंतु सही रास्ता पता न होने के कारण प्रारंभ से ही भटक जाते हैं। ..... एक सार गर्भित संकलन | #THE_WAY
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ज्ञान मार्ग के जिज्ञासु के लिए अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है उनमे से एक सहज सुलभ सरलतम रीती से जो दर्शाया गया पुस्तिका है , वह है #जो_जागत_है_सो_पावत_है
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भगवान जब किसी पर महती (बड़ी) कृपा करते हैं, तब उसे संसारी भोग वासनाओं के कर्मों से विवेक जगाकर भक्ति और सेवा के कर्मों में लगाते हैं।
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आखिर क्यों सरकार सिस्टम न्यायालय सभी संत आसाराम बापू की जान लेने पर तुले है, स्वास्थ हेतु जमानत अधिकार है,एक हिंदू संत का इतना उत्पीड़न और कथित बड़े संतो,नेताओं सत्ता पक्ष,विपक्ष और मीडिया का इस अन्याय पर मौन कायराना है,इतिहास किसी को माफ नहीं करेगा.. @AmitShah@narendramodi
@asharamjibapu_ जो ईश्वर हर जगह है, हर पल है, परिपूर्ण है, सहज सुलभ है, सारा जगत की स्वामी है, हमारा हितैसी भी है, हमसे प्रेम भी असीम है, ऐसे सुहृद ईश्वर को पाने में , उससे मिलने में देरी किस बात की ? #बापूजी