किताबें कितनी अच्छी होती है
दूर जो मैं रहूँ तो
पिछले कुछ पन्नो कि याद दिलाती है
किताबें कितनी अच्छी होती हैं
अकेला जो मैं रहूँ तो
पास बुला, बहला कर कहानियाँ सुनाती है
किताबें कितनी अच्छी होती हैं
थक जो मैं जाऊँ तो
ख़ुद सारी रात सिरहाने जागती रहती है ...
#WorldBookDay
1979 में तलत महमूद साहब को लंदन के रॉयल एल्बर्ट हॉल में बुलाया गया। उनकी लोकप्रियता ही थी कि कार्यक्रम से 2 हफ्ते पहले ही सभी टिकट बिक गए। तलत उस दौर में लता जी के बाद दूसरे ऐसे भारतीय गायक थे जिन्होंने इस प्रतिष्ठित हॉल में गाया
#Raaggiri@YRDeshmukh@hvgoenka@KapilSharmaK9
मुझे सब छोड़ कर 2-4 दिन सिर्फ खुद के लिए जीना है यार..! सुबह /शाम का खाना , ऑफिस, घर ,परिवार , अच्छा बुरा, सही गलत ...सब से परे, जो चाहूं वो करना है । एक बार life में at least एक बार !!
At the age of 7 already being a Super Rajni fan,,I told my parents ..See one day I will go and meet Rajni sir in his house…
After 21 years,that day has come when The Thalaivar invited me..☺️🙏🏽
इस दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें रोना नहीं आता। ये बात सुनने में अजीब लग सकती है, क्योंकि रोना तो मनुष्य की सबसे सहज अभिव्यक्ति मानी जाती है। पर सच यही है कि कुछ लोग रोना चाहते हैं, भीतर से टूटते हैं, भर जाते हैं, लेकिन आँसू आँखों तक आकर भी ठहर जाते हैं, और तब अनायास ही उनके चेहरे पर एक हल्की-सी हँसी उभर आती है। ऐसी हँसी जिसमें कोई खुशी नहीं होती, बस एक मजबूरी होती है।
ये वे लोग होते हैं जिन्होंने बहुत पहले सीख लिया होता है कि आँसू कमजोरी समझे जाते हैं। बचपन से उन्हें सिखाया गया होता है कि मजबूत बनो, रोना नहीं चाहिए, लोग क्या कहेंगे। धीरे-धीरे ये सीख उनके स्वभाव में उतर जाती है। फिर एक दिन ऐसा आता है जब मन पूरी ताकत से रोना चाहता है, पर शरीर साथ नहीं देता। गला भर आता है, सीना भारी हो जाता है, पर आँखें सूखी रहती हैं। उस सूखेपन में ही हँसी जन्म ले लेती है, एक ढाल की तरह।
ऐसे लोग अक्सर मजाकिया समझ लिए जाते हैं। उनकी हँसी लोगों को सहज लगती है, हल्की लगती है, कभी-कभी आकर्षक भी। कोई नहीं पूछता कि ये हँसी किस दर्द को छुपा रही है। कोई नहीं जानना चाहता कि हर बार हँसते हुए उनके भीतर कुछ और टूट रहा है। वे खुद भी कई बार समझ नहीं पाते कि वे हँस क्यों रहे हैं, जब दिल रोने की ज़िद पर अड़ा होता है।
सच कहूं तो रो न पाने का दुख रोने से कम पीड़ादायक नहीं होता। रो लेने के बाद मन हल्का हो जाता है, लेकिन जो रो नहीं पाते, उनका बोझ भीतर ही भीतर जमता जाता है। वह बोझ शब्दों में नहीं उतरता, आँसुओं में नहीं बहता, बस चुपचाप मन के किसी कोने में बैठ जाता है। समय के साथ वही बोझ थकान बन जाता है, उदासी बन जाता है, और कभी-कभी एक अजीब-सी संवेदनहीनता में बदल जाता है।
ऐसे लोग अक्सर रातों में ज्यादा जागते हैं। जब सब सो जाते हैं, तब उन्हें अपने भीतर की आवाज़ साफ सुनाई देती है। वे जानते हैं कि उन्हें रोना चाहिए, शायद बहुत जोर से रोना चाहिए, पर आँखें फिर भी साथ नहीं देतीं। तब वे गहरी साँस लेते हैं, खुद को समझाते हैं, और अगली सुबह फिर वही हँसी ओढ़कर दुनिया के सामने खड़े हो जाते हैं।
हँसी यहाँ खुशी का नहीं, बचाव का तरीका होती है। ये एक दीवार होती है जो सवालों को रोक लेती है। कोई पूछे “सब ठीक है?” तो जवाब में वही मुस्कान काफी होती है। क्योंकि अगर सच बोल दिया तो शायद आँसू आ जाएँ, और अगर आँसू नहीं आए तो लोग समझ ही नहीं पाएँगे।
इस दुनिया में रोना न आना कोई उपलब्धि नहीं है, ये एक चुप बीमारी की तरह है। इसका इलाज सिर्फ ये नहीं कि कोई कह दे “रो लो”, क्योंकि रोना उनके बस में नहीं होता। उन्हें बस इतना चाहिए कि कोई उनकी हँसी के पीछे झाँक कर देख ले, बिना दबाव डाले, बिना सलाह दिए, बस उनकी चुप्पी को समझ ले।
कभी-कभी सबसे मजबूत वही होते हैं जो रो नहीं पाते, और सबसे ज्यादा थके हुए भी वही होते हैं। उनकी हँसी के पीछे जमा दर्द अगर कभी बह निकले, तो शायद वे भी जान पाएँ कि आँसू कमजोरी नहीं होते। लेकिन तब तक, वे हँसते रहेंगे उस उम्मीद में कि शायद किसी दिन, किसी एक पल में आँखें भी दिल का साथ दे दें। 🩶
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101