इसी तरह मीडिया मालिकान को भी जेल की याद दिलाई जाती होगी। जिस मीडिया ने लगातार सवाल पूछने वालों को ग़द्दार कहा हो, वह खुद यह काम उसी सुपर मालिक के सामने कैसे कर सकता है? आप इस भ्रम में न रहें कि पत्रकारिता का पुनर्जन्म हो गया है। अब हो ही नहीं सकता है।आप जिसे अहंकार समझते हैं वो तो मंत्री का अधिकार है। वोट के नाम पर इस अधिकार की स्थापना इसी गोदी मीडिया ने की है। आप जिसे शालीनता का भ्रम समझते हैं वह पत्रकारिता का अंतिम संस्कार है। जेल के नाम से जब मालिक शालीन हो जाते होंगे तो बाक़ी क्यों न शालीन होंगे, जेल जाने से जेल जाने की संभावना ख़त्म नहीं हो जाती है। अच्छा हुआ यह सब भारत में हुआ, विदेश में होता तो भारत की बदनामी होती। अगर यही गोदी मीडिया एक सप्ताह ढंग से सवाल पूछ दे तो मंत्री हथकड़ी लेकर इंटरव्यू देने आएँगी और ईडी के लोग उनकी कार चला रहे होंगे। आप डर का सीधा प्रसारण देख रहे होते।देख ही रहे हैं।