विश्व आदिवासी दिवस पर देश के सभी आदिवासी भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं।
आदिवासी इस देश के पहले मालिक हैं - उनकी ऐतिहासिक संस्कृति भारत की अम��ल्य धरोहर है।
जल, जंगल और ज़मीन पर उनके अधिकार के साथ आदिवासी अस्मिता और सम्मान की लड़ाई में हम हमेशा उनके साथ खड़े हैं।
हिंदू राष्ट्र की मांग करने वाला बाबा बागेश्वर हो,
खालिस्तान की मांग करने वाले खालिस्तानी हों या,
मुस्लिम राष्ट्र की मांग करने वाला साजिद रशीदी,
ये सारे जातिवादी, कट्टरपंथी एवं देशद्रोही एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। इन सभी संविधान विरोधियों से सावधान रहें।
दिल्ली में प्रदूषण की ख़िलाफ़ यात्रा नहीं
SSC वाले छात्रों के लिए यात्रा नहीं
महँगाई के खिलाफ कोई यात्रा नहीं
बढ़ती फीस के ख़िलाफ़ कोई यात्रा नहीं
गिरती अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़ कोई यात्रा नहीं
यह व्यक्ति भाजपा क��� एजेंट हैं 2027 से
पहले BJP के लिए माहौल बना रहा हैं।
भाजपा को 2027 में हार दिख रही हैं
इसलिए ऐसे लोगों को चिरकुटाई करने के लिए खाली छोड़ दिया गया है।
भारत एक संवैधानिक राष्ट्र है वहीं रहेगा
किसी गाव दम नहीं इससे कोई धार्मिक राष्ट्र
बना दे।
हारे हुए लोग कहाँ जायेंगे ? ?
हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ?
उन पराजित योद्धाओं के लिए ,
तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए।
प्रेम में टूटे हुए लोग,
सारी जिंदगी को कहीं दांव लगाकर हारे हुए लोग
थके-हारे ��ोग, गुमनाम लोग
वो बूढ़े पिता जो अब अकेले रह गए हैं
वो कल्पनाओं में खोया रहने वाला बच्चा
जो परीक्षा में फेल हो गया है
वो लड़की जो तेज कदमों से घर की तरफ लौट रही है
वो बूढ़ा गुब्बारे वाला जो कांपते हाथों से पैसे गिनता है
एक असफल लेखक
मैच हार गया खिलाड़ी
इंटरव्यू से वापस लौटा युवा
और ऐसे तमाम लोग
जिन्हें पता था कि वे सफल हो सकते हैं
मगर उन्होंने असफलताओं से भरा रास्ता चुना,
वो लोग जिन्होंने
���मेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया
वो लोग जिन्होंने
गलत लोगों पर भरोसा किया
वो जिन्होंने
चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई
गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए
वे कहां जाएंगे ?
क्या कोई ऐसी दुनिया होगी
जहां दो हारे हुए इंसान
एक-दूसरे की हथेलियां थामे
कई पलों तक खामोश रह सकते हों
अपनी चुप्पी में तकलीफ बांटते हुए।
जिन्होंने इकारस की तरह
सूरज की तरफ उड़ान भरी
और उनके पंख पिघल गए
हारे हुए लोगों के लिए कोई जगह नहीं है
न किसी घर में, न समाज में, न किसी देश में।
क्या जो विजेता थे
वो इनसे बेहतर हैं? बेहतर थे?
नहीं, वही हारा जिसने जिंदगी की अनिश्चितता पर यकीन किया
वही जिसने अनजान रास्तों पर चलने का जोखिम उठाया
जिसने गलती करनी चाही , जो मक्कार ���ुप्पियों के पीछे छिपा नहीं।
जो बोल सकता था मगर बोला नहीं
उसने वो चुना जिसे चुनने का कोई तर्क नहीं था
सिवाय उसकी आत्मा के
जो हारा आखिर वो भी एक नायक था।
एक पराजित नायक के दर्द को
कौन समझना चाहेगा?
जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम।
~ दिनेश श्र��नेत