शिक्षक समाज का मार्गदर्शक होता है, और जब शिक्षकों के अधिकारों और स्वाभिमान पर बात आती है, तो नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन यदि अतीत और वर्तमान के शिक्षक नेतृत्व की तुलना की जाए, तो एक बड़ा और चिंताजनक अंतर साफ दिखाई देता है।
सेवा, संघर्ष और नैतिक बल
एक समय था जब शिक्षक नेता कहलाने वाले लोग सही मायनों में पूरे समाज और शिक्षक समुदाय के संरक्षक होते थे।
उनका एकमात्र उद्देश्य साथी शिक्षकों की समस्याओं को उच्च अधिकारियों के समक्ष मजबूती से रखना और उनका समाधान कराना होता था।
उनमें न तो किसी अधिकारी का डर था और न ही किसी स्वार्थ की गुंजाइश। वे नैतिक बल, निडरता और काबिलियत के दम पर अपनी बात मनवाते थे।
वे शिक्षकों के उत्पीड़न के खिलाफ ढाल बनकर खड़े रहते थे
वर्चस्व, बिचौलियापन और डर का माहौल
आज की स्थिति बिल्कुल इसके विपरीत और निराशाजनक होती जा रही है।
आज कई जगह जो स्वयंभू शिक्षक नेता बने बैठे हैं, उनका उद्देश्य शिक्षकों का हित करना नहीं, बल्कि अपना व्यक्तिगत रसूख और दबदबा बनाना है।
समस्याओं का हल कराने के बजाय, उनका काम अधिकारियों से साठगांठ करना, शिक्षकों को डराना और उनकी शिकायतें अधिकारियों तक पहुँचाकर उन्हें परेशान करना रह गया है।
जो नेतृत्व कभी शिक्षकों की ढाल हुआ करता था, आज वही कई जगह शिक्षकों पर धौंस जमाने और अपना वर्चस्व कायम रखने का जरिया बन चुका है।
जब नेतृत्व का मकसद 'सेवा और संघर्ष' के बजाय 'दलाली और धौंस' बन जाए, तो संगठन अपनी मूल आत्मा खो देता है। आज आम शिक्षकों को जागरूक होने की सख्त जरूरत है, ताकि वे किसी भी प्रकार के अनुचित दबाव के आगे झुकने के बजाय नियमानुसार और एकजुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें।
यह देखना वाकई सराहनीय है। किसी भी विद्यालय या सार्वजनिक स्थान की रसोई में स्वच्छता, सम्मान और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का इस प्रकार ध्यान रखना एक बेहतरीन मिसाल पेश करता है।
जब कोई अधिकारी स्वयं नंगे पांव रसोई में जाकर व्यवस्था का निरीक्षण करता है, तो यह न केवल रसोई में काम करने वाले कर्मचारियों और रसोइयों के प्रति सम्मान दर्शाता है, बल्कि स्वच्छता और सात्विकता के उच्च मानकों को भी स्थापित करता है।
ऐसी सादगी और संवेदनशीलता शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक दृष्टिकोण और अनुशासन को और मजबूत बनाती है। BSA सर का यह आचरण निश्चित ही प्रेरणादायक और काबिले तारीफ है!
@dr_bsa
😀पापा की परी😀
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यह भी किसी की बेटी या पापा की परी हैं!
एक लम्बी लकड़ी की मदद से खतरनाक मगरमच्छ को कंट्रोल करके एक छोटे वाटर टैंक तक ले जाने की कोशिश कर रही है!
अब इसे बहादुरी कहा जाय या पागलपन ?
अंत में वह सरकार का एक संदेश भी देती है-
“ कभी भी फ्लोरिडा में मगरमच्छों को खाना मत खिलाओ।"
आपका परी के बारे में क्या कहना है
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#उत्तरप्रदेश के #बहराइच जिले बच्चों को शिकार बनाने वाला आदमखोर मगरमच्छ पकड़ा गया।
बौंडी थाना क्षेत्र में धान की रोपाई के बाद 12 वर्षीय एक बालक नदी में हाथ-पैर धोने गया था। इसी दौरान पानी में मौजूद एक #मगरमच्छ ने उस पर अचानक हमला कर दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बच्चे की चीख सुनते ही परिजन और ग्रामीण मौके पर दौड़े तथा उसे बचाने की भरसक कोशिश की, लेकिन मगरमच्छ उसे गहरे पानी में खींच ले गया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में मगरमच्छ बच्चे को कई बार पानी में उछालता हुआ दिखाई देता है।
जिसे देखकर वहां मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई। घंटों तक चले खोज अभियान के बाद करीब पांच घंटे पश्चात बच्चे का शव बरामद किया गया। बताया जा रहा है कि शव के कुछ अंग क्षतिग्रस्त थे। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को गहरे सदमे में डाल दिया है और नदी किनारे रहने वाले लोगों में भय का माहौल है। प्रशासन और वन विभाग मामले की जांच कर रहे हैं तथा लोगों से नदी और जलाशयों के आसपास जाने पर सावधानी बरतने को कहां हैं।
अत्यंत दुखद समाचार
😭😭😭😭😭😭
अत्यंतदुखद सूचना यह है कि सुनील सिंह पुत्र स्व. बुधराज सिंह निवासी ग्राम मुरौवा , पोस्ट - मुरौवा बाजार,मुंसारी, महसी बहराइच जो कि प्राथमिक विद्यालय माधवपुरवा करेहना,बहराइच में कक्षा 6 का छात्र था उसको आज शाम घाघरा (सरयू) नदी के किनारे मगरमच्छ ने अपना निवाला बना लिया 😭😭
वह अपनी तीन बहनों में अकेला था। उसके माता-पिता की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी।
सभी बच्चों का पालन - पोषण उसके बड़े पापा करते हैं। घटना के समय वह मौजूद थे परन्तु बहुत प्रयास के बाद भी अपने प्रिय भतीजे को बचा नही पाए 😭😭
मन बहुत व्यथित है ।
हे ईश्वर मेरे उस प्रिय छात्र की आत्मा को शांति प्रदान कीजिए और परिवार को इस असहनीय कष्ट को सहन करने की क्षमता प्रदान कीजिए
अत्यंत भयावह घटना
यह है कौशांबी के लुकिया प्राथमिक विद्यालय की प्रिंसिपल
क्लासरूम में बैठकर बच्चों को चाकू और चापड़ दिखा रही हैं और बता रही है अब मुझे कोई परेशान नहीं करेगा
कह रही है 12 से 13 साल से में मैंने बहुत कुछ देख लिया मगर अब नहीं देखूंगी
जिस विद्यालय में ऐसी शिक्षिकाएं होगी वहां के बच्चे क्या शिक्षा ग्रहण करेंगे.?
क्या उम्मीद की जा सकती है ऐसी शिक्षकों से.?