जिस तरह कभी मिडिल क्लास में नरेंद्र मोदी को लेकर उत्साह और उम्मीद का माहौल था, कुछ वैसा ही माहौल आज प्रशांत किशोर को लेकर दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया से दूर रहने वाले लोग भी आज अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर प्रशांत किशोर की तस्वीरें लगा रहे हैं।
कोई एक जर्नलिस्ट जिन्हें प्रशांत की जीत जेनुइनली ख़ुशी देगी वो संतोष सिंह हैं।
जब बाक़ी पत्रकार प्रशांत किशोर को दूसरा पुष्पम प्रिया घोषित करके अपने पत्रकारिता की समझ दिखा रहे थे तब संतोष सिंह जेन्युइनली प्रशांत के विजन को समझ रहे थे और सीरियसली उसे रिपोर्ट कर रहे थे।
प्रशांत के पॉलिटिक्स के इंपैक्ट को लांग टर्म में समझा रहे थे।
अब इस जीत के बाद इनके आर्टिकल का इंतेजार रहेगा।
लोगों ने सिर्फ नाम में पांडे लगाकर खत्म करना चाहा, जनता ने वहां से चुना जहां ब्राह्मण वोट से कोई फर्क नहीं पड़ता ।
हर इंटरव्यू में प्रशांत से जाति का कठिन प्रश्न होता था,आज जनादेश ने स्पष्ट कर दिया कि पांडे होना राजनीतिक अश्पृश्य होना नहीं है।
भले ही इस सीट से बिहार में सत्ता के समीकरण पर कोई प्रभाव न पड़े, लेकिन ये भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का गृह विधानसभा क्षेत्र है।
यहाँ से BJP हार रही है। एक तो उम्मीदवार बदलना पड़ा। ऊपर से 40% लोग भी वोट देने नहीं निकले। उसपर से नीरज सिन्हा के बूथ पर ही भाजपा हार गई। अतः, इसे एक बड़ा उलटफेर माना जा सकता है।
बिहार में 4 महीने में 2 कार्यपालक अधिकारियों की हत्या हो चुकी है। निर्दोष भरत तिवारी को मार डाला गया। नीट विरोधी आंदोलन में भी जमकर हिंसा हुई। बिहार को सँभालना आसान नहीं है। सम्राट चौधरी इसमें विफल हो रहे हैं। नीतीश कुमार अस्वस्थ होकर भी इनसे अच्छे से ही राज्य चला रहे थे।
फिर भी, मैं ये दावे नहीं कर सकता कि 'जन सुराज' बिहार में भाजपा-राजद या लोजपा के स्तर की भी ताक़त बन गई है। अभी लंबा रास्ता तय करना है।