@BJP4India आप काफी योग्य व्यक्ति हैं अपने पार्टी के सभी सांसदों के काम का आडिट करवायें आपको अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा जब 543 कोई काम नहीं कर रहे तो 850 की क्या जरूरत केवल वीआईपी की संख्या बढ़ाने के लिए कुछ और लुटेरे नहीं चाहिए जनता को 😡
नाम - सुधीर चौधरी
पेशा - पत्रकार ( निष्पक्ष नहीं )
सालाना पैकेज - 15 करोड़
शुरुआत जी न्यूज़ में हुईं
फिर आजतक में काम किया
अब DD न्यूज़ में मौज काट रहे
इनकी पत्रकारिता का 100% आज बताते हैं.
हिन्दू मुस्लिम डिबेट - 55 %
कांग्रेस vs बीजेपी डिबेट - 22%
पाकिस्तान vs इंडिया डिबेट -13%
बेरोजगारी पर डिबेट - 1%
महिला सुरक्षा पर डिबेट - 2%
किसानों पर डिबेट - 3%
महंगाई पर डिबेट - 2%
जनता के मुद्दों पर डिबेट -2%
अब आप लोग ही बताओ, किस मुँह से इनको पत्रकार कहा जाये???
@RailwaySeva@RailMinIndia@AshwiniVaishnaw मै कल रात से मालवा 12920 से दिल्ली से इंदौर के लिए यात्रा कर रही हूं। इस ट्रेन को जानबूझकर लेट पर लेट किया जा रहा है। क्या इसमें बैठे लोगो को इमर्जेंसी नहीं हो सकती। किसी की परीक्षा है किसी का इंटरव्यू किसी की कोर्ट की डेट। संज्ञान ले
इसमें कुछ गलत तो नहीं है..!!
भारत में 125 करोड़ मोबाइल कनेक्शन और इनमें से 90 % यूजर्स प्रिपेड कनेक्शन यूज़ करते है...
रिचार्ज खत्म होते ही टेलीकॉम कंपनियां इनकमिंग कॉल और SMS रोक देती है यहां तक कि सिम भी बंद होने लगती है...!!
और कुछ दिनों बाद सिम बंद हो जाती है...
अब सोशल मीडिया के जरिए प्रीपेड उपभोक्ता कुछ माँगे रख रहे है...
पहला–इनकमिंग कॉल और SMS एक साल तक चालू रहे..!
दूसरी माँग–मोबाइल नंबर तीन साल तक बंद ना हो..!!
तीसरा–सस्ता ओनली इनकमिंग प्लान शुरू किया जाए.!!
आखिर कब तक गरीबों को लूटती रहेगी ये टेलीकॉम कंपनियां...
यह खबर लोकतंत्र के नाम पर चल रही एक शर्मनाक सच्चाई को उजागर करती है। जहां आम नागरिक महंगाई, बेरोज़गारी और पेंशन के लिए दर-दर भटक रहा है, वहीं पूर्व विधायकों की पेंशन में पांच साल में दो सौ प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़ोतरी कर दी गई। सवाल यह नहीं कि पेंशन मिलनी चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि प्राथमिकताएं आखिर किसके लिए तय की जा रही हैं?
जेल में बंद पूर्व मुख्यमंत्री को भी हर महीने लाखों रुपये पेंशन मिलना बताता है कि सत्ता से जुड़े लोगों के लिए नियम अलग हैं। जिन पर गंभीर आरोप हैं, जिनकी भूमिका सवालों के घेरे में है, उन्हें भी “पूर्व विधायक” का तमगा लगाकर जनता के पैसों से ऐश कराई जा रही है। क्या कानून और नैतिकता सिर्फ आम आदमी के लिए है?
पांच साल पहले जिन पूर्व विधायकों की न्यूनतम पेंशन बीस-पच्चीस हजार थी, वही अब पचास हजार से ऊपर पहुंच चुकी है। इसी देश में बुजुर्ग मजदूर, किसान और सरकारी कर्मचारी अपनी मामूली पेंशन बढ़वाने के लिए सालों कोर्ट और दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं। यह असमानता नहीं, खुली लूट है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 262 पूर्व विधायकों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इस बोझ पर कोई बहस नहीं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए “बजट की कमी” का रोना रोने वाली सरकारें अपने लिए कभी तंगी नहीं महसूस करतीं।
अगर यही लोकतंत्र है, तो जनता का भरोसा टूटना तय है। जब प्रतिनिधि जनता की सेवा के बाद भी जीवन भर विशेष सुविधाओं के हकदार बन जाते हैं, तो आम नागरिक खुद को ठगा हुआ ही महसूस करेगा। अब सवाल यह नहीं कि पेंशन कितनी है, सवाल यह है कि इस दोहरे मापदंड पर लगाम कब लगेगी?
@mamidala90 एक असिस्टेंट प्रोफेसर 6000 ग्रेड पे में नौकरी शुरू करता है और 12 से 15 साल में 10000 ग्रेड पे प्राप्त कर लेता है और एक गैर शैक्षणिक स्टाफ LDC 1900 ग्रेड पे पर नोकरी शुरू करके 10 साल बाद MACP में 2000 ग्रेड पे पर पदोन्नत होता है। अंग्रेज हुकूमत जैसा बर्ताव है ये। @ugc_india
ये अमृतकाल वाला नया भारत है!
गाड़ी खरीदो → टैक्स दो।
सड़क पर चलो → टोल टैक्स दो।
पॉल्यूशन सर्टिफिकेट बनवाओ → पैसे दो।
RTO टैक्स दो , रोड टैक्स दो , इंश्योरेंस दो, GST दो।
हर साल नियम नए , वसूली पूरी।
और बदले में क्या मिलता है?
गड्ढों से भरी सड़कें , न बैरिकेड , न चेतावनी, न जिम्मेदारी।
उसी गड्ढे में गिरो , घायल हो या मर जाओ तो कहा जाएगा दुर्भाग्यपूर्ण घटना।
ये अब अपवाद नहीं ,
आम भारतीय की रोजमर्रा की ज़िंदगी का रूटीन बन चुका है।
टैक्स वर्ल्ड-क्लास और सुविधाएँ मौत-क्लास।
भारत सरकार के द्वारा #8CPC की वेबसाइट चालू कर दी गई है। तमाम फीचर्स जैसे #TOR#ऑफिस_बियरर्स, CPC गजट, पिछली रिपोर्ट्स आदि शो हो रहे हैं। हम सब कर्मचारियों के लिए ये खुशी की बात है। जल्द बैठकें भी शुरू हो सकती हैं। हम लगातार इसके लिए आवाज उठाते रहे हैं। हमें भरोसा है, पे कमीशन भी जल्द ही मिशन 200 दिन में रिपोर्ट तैयार करने में अपनी मंशा को कर्मचारी हित में जल्द स्पष्ट कर देगा। कल से हम #जम्मू से इसके लिए कैंपेन शुरू कर रहे हैं और मध्य प्रदेश के सभी जिलों से इस बाबत माननीय प्रधानमंत्री जी को ज्ञापन भी भेजे जाएंगे। #ManjeetSinghPatel
#8CPC के लिए डायरेक्टर की पोस्टिंग अब हो रही है जबकि कमीशन के गठन की घोषणा किए हुए एक साल से अधिक हो गया। ऑफिस स्टाफ की भर्ती का विज्ञापन भी लगभग 6 महीने दिया गया था। जब स्विफ्ट और ईजी गवर्नेंस इस रफ्तार से चलेगी तो जाहिर है पे कमीशन को काम शुरू करने में ही कई महीने और लग सकते हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी को इस पर संज्ञान लेकर इस काम को द्रुत गति से बढ़ाने के आदेश देने चाहिए ताकि कर्मचारियों को जल्द से जल्द उनका हक मिले। #ManjeetSinghPatel
महंगाई आसमान छू रही है। सोने चांदी के भाव भी बेतहाशा बढ़ चुके हैं लेकिन सरकारी कर्मचारियों का #DA सरकारी आंकड़ों में 2% वृद्धि की तरफ इशारा कर रहा है। #8CPC एक साल पहले से ही लेट हो चुका है। अब राहत इस 2% महंगाई भत्ता बढ़ने से नहीं मिलेगी बल्कि अब करेंट #DA को बेसिक सेलरी में मर्ज करने से मिल सकती है। सरकार को इस तरफ प्राथमिकता से ध्यान देना चाहिए।
https://t.co/IyooFAU90o #ManjeetSinghPatel
यही वजह है कि मोनोपॉली खतरनाक होती है।
IndiGo ने सरकार को नियम मानने के बजाय हाथ मरोड़कर अपने हिसाब से फैसले करवाए और सरकार को अपने ही नियम वापस लेने पड़े।
ठीक यही खेल अब टेलिकॉम में हो रहा है।
आज Jio और Airtel मिलकर 75% मार्केट पकड़ चुके हैं।
डेटा रेट लगातार बढ़ रहे हैं , कोई रोकने वाला नहीं , कोई मुकाबला नहीं।
सच्चाई ये है कि जब Jio ने एक साल फ्री डेटा दिया , हमने बाकी कंपनियों को खुद ही मरने दिया।
आज हमारे पास विकल्प ही नहीं बचे सिर्फ Jio और Airtel.
और कल जब ये दो कंपनियाँ कुछ भी मनमानी करेंगी ,
तो सिर्फ सरकार को कोसना बेकार होगा।
क्योंकि दानव हमने खुद बनाए।
हमने ही मुकाबला खत्म किया।
और अब बाजार हमारे हाथ में नहीं उनके हाथ में है।
हमारा देश आज भी कागज़ और कार्ड प्रधान व्यवस्था में उलझा हुआ है।
आधा साल कागज़ बनाने, आधा साल कागज़ में संशोधन काम कम , फाइलें ज़्यादा।
एक नागरिक को पहचान और सुविधा के लिए दर्जनों कार्ड ढोने पड़ते हैं —>
आधार कार्ड , वोटर कार्ड , पैन कार्ड , राशन कार्ड , स्वास्थ्य बीमा कार्ड , क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड , जाति प्रमाण पत्र , निवास प्रमाण पत्र , बिजली का स्मार्ट कार्ड , जॉब कार्ड, इत्यादि।
इसके अलावा जन्म प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र , पासपोर्ट , ड्राइविंग लाइसेंस , बैंक KYC, और हर सरकारी योजना का अलग कार्ड।
यह व्यवस्था नागरिक को सशक्त नहीं करती, बल्कि उसे कागज़ों के जंगल में फँसा देती है।
जब तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी है, तो सवाल सीधा है—>>
आखिर “One Person, One Card” की व्यवस्था क्यों नहीं?
हर सेवा , हर पहचानएक ही कार्ड से।
क्या यह सरकारों की अक्षमता है या सिस्टम की जड़ता?