मदर टेरेसा के पाखण्ड को उसके जीवित रहते साध्वी ऋतम्भरा ने अप्रैल 1995 में इंदौर की सभा में एक्सपोज़ कर दिया और उसे जादू के नाम पर धर्मान्तरण करने वाली घोषित कर दिया। उस समय चर्च की भारतीय शाखा खानग्रेस का शासन मप्र में था, जिसे अपनी मदर टेरेसा का अपमान सहन नहीं हुआ और साध्वी ऋतम्भरा समेत 169 हिन्दुओं को जेल में ठूंस दिया था।
साध्वी ऋतम्भरा जी ने अपने जीवन में एक प्रतिज्ञा की कि मैं अनाथ बच्चों की सेवा करके मदर टेरेसा नाम के बुलबुले को फोड़ दूंगी। अनाथ बच्चों का धर्मान्तरण रोकना मेरे जीवन का लक्ष्य होगा, मैं वात्सल्य ग्राम की स्थापना करूंगी।
मदर टेरेसा अनाथों की आड़ में ज़बरन धर्मपरिवर्तन, गर्भपात, महिलाधिकारों का हनन, तानाशाही, अपराधियों का समर्थन कर उनसे पैसा लेना जैसे कृत्य करती थी। जियानलुइगी नुज़ी नाम की पत्रकार ने तो खुलासा किया था कि वेटिकन के एक बैंक में मदर टेरेसा ने चैरिटी के नाम पर अरबों डॉलर इकट्ठे कर रखे थे।
परन्तु अरबों डॉलर होने पर भी ग़रीबों का इलाज न कराकर उन्हें पीड़ा सहन करने को कहती थी, पर जब खुद बीमार पड़ी सबसे उच्च अस्पताल में इलाज कराया। दुनिया भर से दान वसूलने के बावजूद टेरेसा के संस्थानों की हालत दयनीय थी। धर्मान्तरणकारी मदर टेरेसा को पश्चिम ने 1979 में नोबल से पुरस्कृत किया, और 1980 में उसे भारतरत्न दे दिया गया।
मदर टेरेसा के इस पाखण्ड को उसके जीवित रहते साध्वी ऋतम्भरा ने अप्रैल 1995 में इंदौर की सभा में एक्सपोज़ कर दिया और उसे जादू के नाम पर धर्मान्तरण करने वाली घोषित कर दिया। उस समय चर्च की भारतीय शाखा खान्ग्रेस का शासन मप्र में था, जिसे अपनी मदर टेरेसा का अपमान सहन नहीं हुआ और साध्वी ऋतम्भरा समेत 169 हिन्दुओं को जेल में ठूंस दिया।
इसी मदर टेरेसा के इतने कुकृत्य होने के उपरान्त भी पोप ने उसे सन्त घोषित कर दिया और भारत में स्कूलों में जबरन उसे वात्सल्य की मूर्ति के रूप में पढ़ाया जाता रहा। मदर टेरेसा की छत्रछाया में भारत की हिन्दू विरोधी वामपंथी शक्तियां भी फलती फूलती रहीं इसलिए वर्तमान के सभी वामपंथी अपने आपको मदर टेरेसा का कर्जदार मानते हैं।
तब साध्वी ऋतम्भरा ने प्रतिज्ञा की कि पन्ना धाय के देश में एक कपटी स्त्री वात्सल्य की मूर्ति के रूप में स्थापित की जाए यह एक बहुत बड़ा षड्यन्त्र है और उन्होंने हिन्दुत्व की रेखा इस क्षेत्र में बड़ी करने की ठान ली, जिसमें सपा, कांग्रेस आदि सब रोड़े अटकाते रहे। पर उन्होंने अपने आपको इस एक असहाय बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा के कार्य में पूर्णतः झोंक दिया। उसी का परिणाम निकला वात्सल्य ग्राम।
ये कैसा हिन्दू समाज है जो साध्वी ऋतम्भरा को न्यून करने की कोशिश कर रहा है, जिस साध्वी के प्रयास से मदर टेरेसा का प्रोजेक्ट न्यून हो गया, अनाथों के क्षेत्र में मिशनरियों के कथित अहसान से हिन्दू समाज को मुक्ति मिली।
पर हिन्दू समाज इतना कृतघ्न है कि उनके एक सामान्य से बयान, जिसमें वे हिन्दू समाज के ही संघर्ष को, अपमान को याद कर रही हैं, उसके आधार पर उनके जाति, लिंग, चरित्र का ऐसा वीभत्स चीरहरण करने लगा। हर प्रकार से कैसे भी साध्वी ऋतम्भरा जिस एक छोटी पर हिन्दुत्व के प्रति समर्पित बालिका को उसके गुरु स्वामी परमानंद गिरिजी ने ऐसे दिव्य संकल्पों को पूरा कर देने वाली बना दिया, उस भगवती का चीरहरण निकृष्ट नराधमों ने किया।
यहां हिन्दू समाज का चरित्र भी दिख जाता है कि कैसे वेटिकन मदर टेरेसा जैसी कपटी को भी अपने लाभ के लिए सन्त घोषित कर देता है और कैसे कुछ हिन्दू एक परमवात्सल्यमयी माता का भी चरित्रहनन करते हैं। क्या यह भगवती के उपासकों का देश है?
वही खोखला अहं, वही ईर्ष्या, सम्मिलित होकर कार्य करने की शक्ति का अभाव, गुलाम जाति का स्वभाव है, परन्तु हमें इसे उखाड़ फेंकने की चेष्टा करनी चाहिए। यही terrible jealousy हमारे समाज की प्रधान characteristic है।
कौन हैं मां साध्वी ऋतम्भरा ? अनुसूया, विश्ववारा, सती ब्रह्मवादिनियों को तो मैंने नहीं देखा, पर यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे समय में मां साध्वी ऋतम्भरा विराजमान हैं।
उनकी वाणी के एक एक शब्द से करुणा टपकती है। शब्द प्रतिशब्द ऐसा लगता है कि अभी वे भावोद्रेक से रो पड़ेंगी। हृदय के भावतल में ही वे सदा आसीन रहती हैं। एक एक शब्द वे हृदय से बोलती हैं, करुणा से ओतप्रोत होकर बोलती हैं। कैसा भी रागद्वेष हानिलाभ यशोपयश का भाव उन्हें छू भी नहीं गया है।
विवेकानंद का वो भावनाओं से भरा हृदय यदि किसी स्त्री में होता, तो वे शायद ऋतम्भरा ही होतीं, जिसे अपने समाज के अनाथों और असहायों की चिंता थी, तीव्र धार्मिक स्वाभिमान के साथ, शेर के समान। ऋत से तो वे लबालब भरी हुई ही हैं, करुणा से भी आप्लावित हो रही हैं। पुराने समय में जो माँ आनंदमयी जैसी माताओं का वर्णन मिलता है, वह मैं मां ऋतम्भरा में ही देखता हूँ। ऐसी साध्वी की वाणी निष्फल भी नहीं जाती।
मेरे नानाजी ने बताया था कि राममन्दिर के लिए एक एक रुपया झोली फैलाकर इकट्ठा किया करती थीं साध्वी ऋतम्भरा जी गली गली धूप में घूम घूमकर, यह कहकर कि इतने हिन्दू एक एक रुपया दे दें तो भव्य मन्दिर निर्माण को इतने करोड़ रुपए हो जाएंगे...
आज जैसे आसान समय में नहीं बल्कि उस समय जब हिंदुत्व एक अपराध समझा जाता था, और "परिंदा भी पर नहीं मार सकता" कहकर धमकाने वाले शासन करते थे...
तभी मां ऋतम्भरा के आगे तो पूरा इतिहास डोल गया होगा, बोलीं, कितना अपमान सहकर यहां पहुंचे हैं। कभी महसूस नहीं कर पाओगे, कि कितने कष्ट के बाद उनके मुंह से ये बोल फूटा होगा, अनुभव नहीं किया ना वह इतिहास।
"स्त्रियाःसमस्तास्तव देविभेदाः।" कहा है, कठिन है बहुत। पर कोई कोई विभूति होती है जिसमें जगन्माता के दर्शन हो जाते हैं, मुझे मां साध्वी ऋतम्भरा में दर्शन होते हैं। उनके मुखमण्डल पर सिर्फ भोलापन ही दिखता है, सभी के लिए वात्सल्य ही दिखता है।
उनके गुरुदेव स्वामी श्री परमानंद गिरिजी महाराज बहुत बड़े वेदान्ती ब्रह्मवादी महात्मा हैं। वेदान्त के ऐसे ज्ञाता भी दुर्लभ ही हैं। उनका अद्वैत जीवंत अद्वैत है, क्षुद्र हृदय वालों जैसा नहीं कि सिद्धांत में कुछ और व्यवहार में उससे उलट।
@MuditUpdates
#sadhviritambhara
@INCIndia तू तो चाहता ही है कि कैसे भी देश बर्बाद हो जाए, परेशानियों के भंवर में फंस जाए। यह दिन रात भारत के बर्बाद होने की कामना करता है जिस पर ये अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक सके।
जैन मत में ॐ का मूल पंच परमेष्ठी को माना है। अरिहंत, अशरीर(सिद्ध), आचार्य, उपाध्याय और मुनि, इन पांचों के प्रथम अक्षर अ अ आ उ म इन पांच को मिलाकर ॐ बनता है, इसे पंच परमेष्ठी का बीज कहा है। यही पंच परमेष्ठी णमोकार मन्त्र में पूजित है।
अरिहंता असरीरा आयरिया उवज्झाय मुणिणो ।
पंचक्खरनिप्पणी ओंकारी पंच परमिट्टी ॥
धर्म का मूल बीज है ॐ।
धर्मी संसारियों का मूल धर्म
सनातन धर्म के सार्वभौम महाव्रतों, जिन्हें ऋषियों ने धर्मशास्त्रों में धर्म के दस लक्षण कहा है। प्रकारांतर से जैनों ने दशलक्षण, और बौद्धों ने दशशील कहा है, वे
धृति, क्षमा, दम,
अचौर्य, शौच,
जितेन्द्रियता, बुद्धि
विद्या, सत्य, अक्रोध
ये ये धर्म उन उन संप्रदायों के महात्माओं, संन्यासी, साधु, सन्तों, मुनियों, भिक्षुओं के नित्य धर्म हैं, परन्तु अन्य समस्त मनुष्यों के लिए वे इष्ट धर्म हैं, जो अभ्यास से ही ग्रहण होते हैं।
ऐसी अवस्था में अहिंसा, सत्य आदि साधुपुरुषों के नित्य महाधर्मों के द्वेषी असुरों के प्रति ये महाधर्म संसारियों के लिए मान्य नहीं हैं।
क्योंकि ऐसा न होने पर तो साधु ही नष्ट हो जाएंगे और उन सार्वभौमिक नित्यधर्मों की स्थिति साधुओं में भी स्थित न हो सकेगी, संसारी कामियों की बात ही क्या।
अतः सन्तों के नित्यधर्मों की सुरक्षा ये धर्मी संसारियों का मूलधर्म है।
इस दशलक्षणात्मक धर्म के विरोधियों के लिए किसी भी परिस्थिति में ये दशलक्षणात्मक धर्म मान्य नहीं हैं।
धर्मी संसारियों का मूल धर्म
सनातन धर्म के सार्वभौम महाव्रतों, जिन्हें ऋषियों ने धर्मशास्त्रों में धर्म के दस लक्षण कहा है। प्रकारांतर से जैनों ने दशलक्षण, और बौद्धों ने दशशील कहा है, वे
धृति, क्षमा, दम,
अचौर्य, शौच,
जितेन्द्रियता, बुद्धि
विद्या, सत्य, अक्रोध
ये ये धर्म उन उन संप्रदायों के महात्माओं, संन्यासी, साधु, सन्तों, मुनियों, भिक्षुओं के नित्य धर्म हैं, परन्तु अन्य समस्त मनुष्यों के लिए वे इष्ट धर्म हैं, जो अभ्यास से ही ग्रहण होते हैं।
ऐसी अवस्था में अहिंसा, सत्य आदि साधुपुरुषों के नित्य महाधर्मों के द्वेषी असुरों के प्रति ये महाधर्म संसारियों के लिए मान्य नहीं हैं।
क्योंकि ऐसा न होने पर तो साधु ही नष्ट हो जाएंगे और उन सार्वभौमिक नित्यधर्मों की स्थिति साधुओं में भी स्थित न हो सकेगी, संसारी कामियों की बात ही क्या।
अतः सन्तों के नित्यधर्मों की सुरक्षा ये धर्मी संसारियों का मूलधर्म है।
इस दशलक्षणात्मक धर्म के विरोधियों के लिए किसी भी परिस्थिति में ये दशलक्षणात्मक धर्म मान्य नहीं हैं।
भट्टा - परसौल कांड के वक्त वह खुद केन्द्रीय सत्ता में था और उसकी सरकारें उप्र सरकार से ज्यादा ही भ्रष्टाचारी थी। तब सोशल मीडिया का दौर नहीं था लेकिन पूरा देश त्राहि-त्राहि कर रहा था।
-नोटबंदी जनता का मुद्दा नहीं था। उसके तुरंत बाद यूपी चुनाव हुआ और भाजपा जीती। मार्केट मे जाली नोट्स आने बंद हुए। उसके पहले जाली नोट इतने कॉमन थे कि 500 का नोट एक दुकानदार दस बार उलट-पुलट किए बगैर नहीं लेता था।
-किसान बिल से पंजाब के आढ़तियों के अलावा किसको हानि होने वाला था? बाद मे उस आंदोलन को जाटों से सरकार के टकराव और फिर खालिस्तानियों के लालकिला पर झण्डा गाड़ने वाला निकला। कांग्रेस ने इस आंदोलन मे पंजाब खोया।
-ये हाथरस गया एक गाँव के प्रेम प्रसंग के किस्से मे उसे ठाकुर vs दलित बनाने के लिए। यह राष्ट्रीय स्तर के नेता की हरकत थी। जबकि केस भी अलग था।
-उसके बाद उसे पहली विपक्ष कि लड़ाई 2019 में लड़ना था तो चौकदार चोर है और राफेल सौदों पर लड़ा। जिसके पाँच वर्ष पूर्व के स्वयं के सरकार में एक भी रक्षा सौदे नहीं हुए थे। सेना का ही ऑडिट था कि लड़ने के लिए गोले-बारूद नहीं है।
-गुजरात मे सॉफ्ट हिन्दुत्वा से मोदी का तोड़ निकालते-निकालते 2024 के चुनाव मे लालू स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स करने लगा, वीपी सिंह जैसा बोफोर्स का पेपर लेकर घूमता था , ये संविधान लेकर घूमने लगा। यह तो ईश्वर कि कृपा थी कि भाजपा उत्तर प्रदेश में विरोध से जूझ रही थी , 400 पार के नशे में थी और अखिलेश ने बढ़िया तैयारी करके रखी थी कि भाजपा को रोक दिया वरना इसके नेता विपक्ष रहते भाजपा तीन बार पूर्ण बहुमत से सत्ता मे आती।
फिर उससे बड़ा जनवादी नेता विपक्ष होने का सबूत आपके पास कुछ दूसरा नहीं रहता।
स्वामी जी के 1895 में न्यूयार्क प्रवास के दौरान एक ऐसे आशुलिपिक की आवश्यकता थी, जो उनके भाषण ठीक और तेजी से लिख सके। इसमें कई लोग लगाये गये; पर कसौटी पर केवल गुडविन ही खरा उतरा, जो 99 प्रतिशत शुद्धता के साथ 200 शब्द प्रति मिनट लिखता था।
वह इससे पहले कई वरिष्ठ और प्रसिद्ध लोगों के साथ काम कर चुका था। अतः उसे उचित पारिश्रमिक पर नियुक्त कर लिया गया; पर स्वामी जी के भाषण सुनते-सुनते गुडविन का मन बदल गया। उसने पारिश्रमिक लेने से स्पष्ट मना कर दिया और अपनी सेवाएँ निःशुल्क देेने लगा।
उसने अपने एक मित्र को लिखा, ‘‘मुझे अब पैसा मिले या नहीं, पर मैं उनके प्रेमजाल में फँस चुका हूँ। मैं पूरी दुनिया घूमा हूँ। अनेक महान लोगों से मिला हूँ; पर स्वामी विवेकानन्द जैसा महापुरुष मुझे कहीं नहीं मिला।’’
एक निष्ठावान शिष्य की तरह गुडविन स्वामी जी की निजी आवश्यकताओं का भी ध्यान रखते थे। वे उनके भाषणों को आशुलिपि में लिखकर शेष समय में उन्हें टाइप करते थे। इसके बाद उन्हें देश-विदेश के समाचार पत्रों में भी भेजते थे। स्वामी जी प्रायः हर दिन दो-तीन भाषण देते थे। अतः गुडविन को अन्य किसी काम के लिए समय ही नहीं मिलता था।
1895-96 में स्वामी जी ने कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग पर जो भाषण दिये, उसके आधार पर उनके सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ बने हैं। स्वामी जी ने स्वयं ही कहा था कि ये ग्रन्थ उनके जाने के बाद उनके कार्यों का आधार बनेंगे। इन दिनों गुडविन छाया के समान उनके साथ रहते थे।
स्वामी जी भाषण देते समय किसी ओर लोक में खो जाते थे। कई बार तो उन्हें स्वयं ही याद नहीं आता था कि उन्होंने व्याख्यान या श्रोताओं के साथ हुए प्रश्नोत्तर में क्या कहा था ? ऐसे में गुडविन उन्हें उनके भाषणों का सार दिखाते थे। स्वामी जी ने उसकी प्रशंसा करते हुए एक बार कहा कि गुडविन ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। उसके बिना मैं कठिनाई में फँस जाता।
अप्रैल 1896 में स्वामी जी के लंदन प्रवास के समय भी गुडविन उनके साथ थे। जनवरी 1897 में वे स्वामी जी के साथ कोलकाता आ गये। बेलूर मठ में गुडविन वहाँ सब मठवासियों की तरह धरती पर सोते तथा दाल-भात खाते थे। अद्वैत में वे पूरी तरह रम गए। वे दार्जिलिंग, अल्मोड़ा, जम्मू तथा लाहौर भी गये। लाहौर में उन्होंने स्वामी जी का अंतिम भाषण लिखा। फिर वे मद्रास आकर रामकृष्ण मिशन के काम में लग गये।
पर मद्रास की गरम जलवायु से उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। अतः वे ऊटी आ गये। वहीं 2 जून, 1898 को केवल 28 वर्ष की अल्पायु में उनका देहांत हो गया।
स्वामी जी उस समय अल्मोड़ा में थे। समाचार मिलने पर उनके मुँह से निकला, ‘‘मेरा दाहिना हाथ चला गया।’’ ऊटी में ही स्वामी विवेकानन्द के इस प्रिय शिष्य का स्मारक बनाया गया है।
स्वामी जी के अथाह ज्ञान से हमें परिचित कराने में बहुत बड़ा योगदान गुडविन का भी है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन।
An important day for Foreign Policy watchers
Myanmar President Min Aung Hlaing starts his 5 day India tour from Bodh Gaya, Bihar.
India will be Hlaing's first foreign visit since he took oath as President in April 2026.
This signals a major shift in India-Myanmar relations, as choosing India over China as his first destination, Hlaing has signalled his willingness to upgrade relations with India to next level.
Myanmar is a crucial player in India's Act East Policy, engagement with ASEAN, security of India's North East and countering China's rise in the region.
Had a productive meeting with President U Min Aung Hlaing of Myanmar. We in India are honoured that he has chosen India for his first foreign visit as President. Equally gladdening is the fact that he began the visit from Bodh Gaya, with the blessings of Lord Buddha. We reviewed the full range of India-Myanmar relations. Myanmar is vital to India’s policies of ‘Neighbourhood First’, ‘Act East’ and Indo-Pacific.
Few and far between but one of the rare examples of good Desi statecraft. Bipartisan, sustained, hardnosed, and extremely "ruthless" at times. Also not maximalist, seeking to contain PRC influence and mitigate threats to India's NE to the extent possible