सरकार कहती है बजट की कमी नहीं है। आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं—आदिवासी कल्याण के लिए ₹47,429 करोड़ का प्रावधान, 1,544 शासकीय कन्या छात्रावास और छात्राओं के भोजन के लिए ₹1,740 प्रति छात्र प्रतिमाह। ऊपर से गेहूं-चावल सरकार अलग से देती है। फिर सवाल वही है—इतने इंतजाम के बाद भी छात्राओं की थाली में गुणवत्ता क्यों नहीं? कहीं खाने में कीड़े मिलने की शिकायत, कहीं दूषित पानी, कहीं खराब भोजन और कहीं अव्यवस्थाओं से परेशान छात्राएं कलेक्ट्रेट तक पहुंच रही हैं। जब बजट मौजूद है, अनाज अलग से मिल रहा है और निगरानी के लिए अधिकारियों की पूरी श्रृंखला है, तो गड़बड़ी आखिर कहां है? कबीर ने कहा था— बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय; जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। लेकिन यहां सवाल किसी एक वार्डन का नहीं, पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है। अगर सरकार पैसा दे रही है और छात्राओं को फिर भी सम्मानजनक भोजन नहीं मिल रहा, तो जांच सिर्फ कागजों की नहीं, थाली और रसोई तक पहुंचनी चाहिए। @WelfareTribal@JansamparkMP@INCIndia@SupriyaShrinate
मध्यप्रदेश प्राथमिक शिक्षक भर्ती-2025 में डीएलएड अंतिम वर्ष के अभ्यर्थियों का सवाल सीधा है—जब आवेदन के समय जारी एप्लीकेशन फॉर्म के क्लॉज 49 में साफ लिखा था कि अंतिम वर्ष में पढ़ रहे अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल हो सकते हैं और दस्तावेज सत्यापन के समय तक अंकसूची/उपाधि उपलब्ध होना अनिवार्य होगा, तो अब नियुक्ति के समय उन्हें अलग शर्त क्यों बताई जा रही है? 8 अगस्त 2026 को DPI भोपाल परिसर में प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि जब तक क्लॉज 49 के पालन का सर्कुलर जारी नहीं होता, वे आंदोलन जारी रखेंगे। दूसरी ओर लोक शिक्षण संचालनालय के कमिश्नर अभिषेक सिंह के स्पष्टीकरण में रूल बुक की कंडिका 12.7 का हवाला दिया गया है, जिसमें आवेदन की अंतिम तिथि तक निर्धारित शैक्षणिक/व्यावसायिक योग्यता होना अनिवार्य बताया गया है। यहीं पूरा विवाद है। अभ्यर्थी क्लॉज 49 के पालन की मांग कर रहे हैं और विभाग कंडिका 12.7 के पालन की बात कर रहा है। सवाल यह है कि आवेदन के समय अभ्यर्थियों को जो शर्त बताई गई थी, उसका अर्थ और अब लागू की जा रही पात्रता शर्त में सामंजस्य कैसे बनेगा? सरल भाषा में कहें तो अभ्यर्थी फ्रैक्चर पर प्लास्टर मांग रहे हैं और जवाब मिल रहा है—हमने तो बचपन में पोलियो की दवा पिला दी थी!
भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता का मतलब यही है कि अभ्यर्थी जिस नियम को देखकर परीक्षा में शामिल हुए, उसी नियम के आधार पर उनका भविष्य तय हो। सरकार को विवाद का स्पष्ट समाधान निकालकर योग्य अभ्यर्थियों के साथ न्याय करना चाहिए। @schooledump@udaypratapmp@JansamparkMP
सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से जबरन हटाना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध के संवैधानिक अधिकार पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
लोकतंत्र में असहमति का उत्तर संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही से दिया जाता है, दमन से नहीं। यदि कोई नागरिक शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपनी बात रख रहा है, तो उसकी आवाज़ सुनना लोकतांत्रिक व्यवस्था का दायित्व है।
परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर उठ रही चिंताओं का समाधान बल प्रयोग से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और सार्थक संवाद से होना चाहिए।
लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि सत्ता सवालों का सामना करे, न कि सवाल पूछने वालों को हटाने का प्रयास करे।
दुनिया चांद पर पहुंच गई, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार अब भी भर्ती प्रयोगशाला से बाहर नहीं निकल पा रही। पहले व्यापम, फिर PEB, अब ESB — नाम बदलते रहे, लेकिन युवाओं का दर्द वही रहा। अब हर भर्ती के लिए स्कोर कार्ड सिस्टम लाया जा रहा है, यानी नौकरी से पहले बार-बार पात्रता परीक्षा का नया चक्र। सरकार इसे पारदर्शिता बता रही है, जबकि प्रदेश पहले ही पेपर लीक, परीक्षा घोटाले, रिजल्ट विवाद और भर्ती देरी से बदनाम है। सवाल यह है कि जब सिस्टम पर भरोसा ही कमजोर है, तो युवाओं का भविष्य स्कोर कार्ड के भरोसे क्यों? भर्ती आसान कम, और लंबी-अनिश्चित ज्यादा दिखाई दे रही है। @JansamparkMP@INCIndia
मध्यप्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु नियुक्त 5254 पेसा मोबिलाइजर्स की सेवाएं समाप्त करना आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पंचायत राज संचालनालय के आदेश क्रमांक 8448 दिनांक 18/05/2026 के तहत आरजीएसए योजना समाप्त होने का हवाला देकर इन कर्मचारियों को सेवामुक्त किया गया है, जबकि वर्षों से यही मोबिलाइजर्स ग्राम सभाओं को सक्रिय करने, पेसा कानून और वनाधिकार अधिनियम के प्रति जागरूकता फैलाने तथा शासन और ग्रामीणों के बीच समन्वय स्थापित करने का कार्य कर रहे थे।
प्रदेश के 89 आदिवासी विकासखंडों के दूरस्थ गांवों में पेसा मोबिलाइजर्स ने ग्राम सभा बैठकों, गौण वनोपज प्रबंधन, पंचायत स्तरीय प्रशिक्षण, सर्वे और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अचानक सेवामुक्ति से हजारों परिवारों की आजीविका संकट में पड़ गई है और आदिवासी क्षेत्रों में पेसा कानून का जमीनी क्रियान्वयन भी प्रभावित होगा।
मैं मप्र सरकार से मांग करता हूं कि सेवामुक्ति आदेश तत्काल निरस्त कर पेसा मोबिलाइजर्स को बहाल करे, ताकि संविधान की पांचवीं अनुसूची की भावना और आदिवासी स्वशासन व्यवस्था मजबूत बनी रहे। @JansamparkMP@GovernorMP@INCMP@RahulGandhi
खंडवा जिले की पवित्र नगरी Omkareshwar के बाग नगर क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई एक बार फिर विवाद और तनाव का कारण बन गई। सिंहस्थ की तैयारियों के नाम पर प्रशासन लगातार बुलडोजर कार्रवाई कर रहा है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि विकास की कीमत आखिर कौन चुका रहा है? गरीब, आदिवासी और कमजोर तबके के लोग ही क्यों बार-बार निशाने पर आ रहे हैं?
कुछ दिन पहले जिस महिला का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह अपने घर को बचाने के लिए जेसीबी के सामने लेट गई थी, उसी क्षेत्र में आज फिर नगर परिषद, राजस्व विभाग और पुलिस की टीम भारी बल के साथ पहुंची। कार्रवाई के दौरान विरोध हुआ, अफरा-तफरी मची और एक महिला गंभीर रूप से घायल हो गई, जिसे अस्पताल भेजना पड़ा। यह घटना बताती है कि प्रशासनिक कार्रवाई में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण की कितनी कमी है।
सवाल केवल अतिक्रमण का नहीं है, बल्कि पुनर्वास, वैकल्पिक व्यवस्था और आदिवासी-गरीब परिवारों के अधिकारों का भी है। यदि वर्षों से बसे लोगों को हटाया जा रहा है, तो क्या उन्हें बसाने की जिम्मेदारी सरकार नहीं लेगी? विकास और धार्मिक आयोजन जरूरी हैं, लेकिन किसी गरीब की छत उजाड़कर नहीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बुलडोजर नहीं, संवाद और न्याय सबसे बड़ा रास्ता होना चाहिए।
@collectordhar@JansamparkMP@RahulGandhi@INCIndia
देश के करोड़ों आदिवासी समाज के लोगों के अस्तित्व, आस्था, संस्कृति और पहचान के सम्मान के लिए जरूरी है अलग धर्म कोड।
जनगणना में आदिवासी समाज को मिले आदिवासी/सरना धर्म कोड...
मध्यप्रदेश सरकार के विधि विभाग द्वारा सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट की तीनों खंडपीठों के लिए लगभग 150 पैनल वकीलों की नियुक्ति की गई, लेकिन बेहद चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इस सूची में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के वकीलों को लगभग पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।
जब संविधान अनुसूचित जाति को 16% और अनुसूचित जनजाति को 21% प्रतिनिधित्व एवं समान अवसर की भावना देता है, तो फिर न्याय व्यवस्था से जुड़े इतने महत्वपूर्ण पदों पर इन वर्गों की भागीदारी शून्य क्यों है? क्या यही भाजपा और आरएसएस की तथाकथित “सामाजिक समरसता” है?
यदि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की खंडपीठों के लिए बनाए गए 150 वकीलों के पैनल में एससी-एसटी वर्ग के योग्य अधिवक्ताओं को स्थान नहीं मिलेगा, तो भविष्य में इन वर्गों से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश कैसे बनेंगे?
यह केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है। मध्यप्रदेश के आदिवासी, दलित और वंचित समाज के युवाओं को इस भेदभाव को समझना होगा और अपने हक एवं अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठानी होगी।
भारत का संविधान सबको समान अवसर देने की बात करता है। यदि व्यवस्था में आपको बराबरी का अवसर नहीं मिल रहा, तो यह सामाजिक न्याय की भावना के साथ अन्याय है। आज अगर हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के अधिकार भी खतरे में पड़ जाएंगे।
— डॉ. हिरालाल अलावा
विधायक, मनावर
राष्ट्रीय संरक्षक, जयस
मध्यप्रदेश में हाई ब्लड प्रेशर अब सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि तेजी से फैलता हुआ साइलेंट किलर बन चुका है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश का हर चौथा व्यक्ति हाइपरटेंशन से पीड़ित है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि लगभग 40% लोगों को खुद यह पता ही नहीं कि वे इस गंभीर बीमारी की चपेट में हैं। मोबाइल और लैपटॉप का देर रात तक उपयोग, खराब नींद, तनाव और अनियमित जीवनशैली इस संकट को और बढ़ा रहे हैं।
एम्स भोपाल की स्टडी में मोटापे से ग्रस्त बच्चों में भी हाई बीपी के मामले सामने आए हैं, जो बेहद चिंताजनक संकेत है। विशेषज्ञों के अनुसार हाई बीपी हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेलियर, लकवा और डायबिटीज जैसी 15 गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है।
सरकार को गांव-गांव नियमित स्वास्थ्य जांच अभियान चलाना चाहिए और युवाओं में डिजिटल डिटॉक्स व स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता बढ़ानी चाहिए। क्योंकि यदि समय रहते इस साइलेंट किलर को नहीं रोका गया, तो यह आने वाले वर्षों में एक बड़ी जनस्वास्थ्य आपदा बन सकता है।
@JansamparkMP
मध्यप्रदेश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी को 29 में 29 सीटें सौंपकर भरोसे का ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया था। उम्मीद थी कि लोकसभा में प्रदेश की आवाज़ गूंजेगी, लेकिन हकीकत आंकड़ों में सिमटकर रह गई।
औसतन 4 घंटे 23 मिनट की आवाज़—यानी पूरे कार्यकाल में जनता का माइक जैसे म्यूट मोड पर रहा। कुछ सांसद 100% हाजिरी लगाकर भी ‘मौन व्रत’ निभाते दिखे। गणेश सिंह 24 मिनट बोलकर सबसे आगे हैं—पर सवाल यह है कि क्या 24 मिनट में करोड़ों लोगों की समस्याएं समा सकती हैं?
दिलचस्प विडंबना देखिए—जो सांसद एक शब्द नहीं बोले, वे उपस्थिति में अव्वल हैं। और जिनसे सवाल पूछने की उम्मीद थी, वे संसद में सवालों से ज्यादा खामोशी छोड़ आए। जनता ने विकास, रोजगार, किसान, शिक्षा के मुद्दे भेजे थे—वापस आया सन्नाटा।
29 सीटों का पूर्ण बहुमत अगर 4 घंटे की आवाज़ में बदल जाए, तो यह जनादेश नहीं, जनादेश की अनदेखी है। लोकतंत्र में खामोशी भी जवाब देती है—और यह जवाब बता रहा है कि सत्ता का शोर, जनता की आवाज़ को दबा रहा है।