अगर आप अपनी और अपने बच्चों की चिंता नहीं कीजिएगा,तो आप बाढ़ में डूबिएगा… और नेता दिया जलाकर अपना बर्थडे मनाएगा...
इसलिए अपने बच्चों के लिए वोट कीजिए,
अपने रोजगार के लिए वोट कीजिए,
अपने भविष्य के लिए वोट कीजिए।
जय बिहार ✊🙏
ये वीडियो क्लिप बेहद वायरल है, सोशल मीडिया पे कई शेयर कर रहे हैं।
मामला समझिए,
BJP राष्ट्रीय अध्यक्ष @NitinNabin मंच पे भाषण दे रहे हैं और जो थोड़ी बहुत जनता जुटाई थी स्थानीय भाजपा मंडली ने, वो भी उठ कर भाषण के बीच में निकल गई।
और करिए UGC, SCST, JaiBhim, Reservation को 73% और LaadliBahan, 300 मुसलमानी स्कीम।
निकलते वक्त जनता बोलकर गई,
"ले लेना JaiBhim और Pasmanda से वोट"
Absolute inhuman behaviour by a RPF constable who dragged a woman by her hair at Hafizpet Railway station in Hyderabad, yesterday.
Going by the video, the woman was standing near a shop when the RPF constable suddenly launches into an attack, trashing her, slapping her and then drag’s her by her hair.
A man, most likely her husband was seen pleading with the constable while rest everyone are just standing and watching the tamasha unfold.
Apparently, there was a verbal altercation between the woman and the constable over something very silly and the man decided to teach her a lesson by showing his power.
कोसी क्षेत्र में जब नदी बढ़ना शुरू करती थी, तब बाढ़ का स्वागत होता था। महिलाएँ नदियों की प्रशंसा में मंगल गान गाती थीं। नदी अगर फिर भी बढ़ती रहती, तो उसकी पूजा शुरू होती थी कि, "माँ! अब जाओ।" और कोसी अगर फिर भी न माने, तो उसे सिंदूर दिखाकर डराया जाता कि, "...अब चली जाओ, नहीं तो तुम्हारी शादी कर देंगे।" कोसी, जो कि एक चंचल और कुमारी नदी है, ब्याह के डर से भाग जाती। पारंपरिक मान्यता है कि जिन नदियों की धारा स्थिर होती है, उन्हें विवाहिता स्त्री की तरह धीर-गंभीर माना जाता है। जो नदियाँ अपनी धारा बदलती रहती हैं, उन्हें कुमारी कन्या की तरह चंचल रूप में देखा जाता है। कोसी की धारा स्थिर नहीं है, अतः उसे कुमारी माना जाता है।
नदियों के साथ लोगों का बराबरी का रिश्ता था। यही कारण था कि अधिकांश नदियों को लोगों ने माता के रूप में देखा। महर्षि विश्वामित्र कोसी को अपनी बड़ी बहन कहते थे। ब्रह्मपुत्र को स्थानीय लोग बाबा कहते हैं। गंगा, राजा शांतनु की पत्नी तथा प्रत्येक भारतीय की माँ के रूप में प्रख्यात हैं। नर्मदा, मान्धाता की पुत्रवधू और पुरुकुत्स की पत्नी हैं। नदियों में आसक्ति रखने वाले प्रख्यात समाजसेवी काका कालेलकर अपने गाँव के बगल में बहने वाली मारकंडी नदी को अपने बचपन की सहेली मानते थे।
असम में जब ब्रह्मपुत्र और दिबांग में एक साथ बाढ़ आती है और उनका पानी एकाकार होने लगता है, तब लोगों की मान्यता है कि दोनों का विवाह संपन्न होता है। इसके पहले कि लोग बाढ़ से अपनी रक्षा करें, नवविवाहितों को भेंट-उपहार देना नहीं भूलते। उत्तर प्रदेश में घाघरा तथा तरैना के बारे में भी इसी तरह की किंवदंती मशहूर है।
बाहर कहीं से आए फिरंगियों को यह भारतीय व्यवस्था हजम नहीं हुई। उनका ध्यान रेवेन्यू यानी "दुगुना लगान" वसूलने पर था। तो उन्होंने तटबंधों के बीच नदियों को बाँधकर कृषि से अधिक से अधिक लगान वसूलने की कोशिश की और जल्दी ही उन्हें इसकी निरर्थकता समझ में आ गई। फिरंगियों ने दामोदर पर तटबंध बनाने के बाद ईडन कैनाल भी बना डाली। रेल लाइन तो अपने आप में एक बाँध थी ही। उधर से गुजरने वाली ग्रैंड ट्रंक रोड को भी ऊँचा और मजबूत किया गया। ये सारी संरचनाएँ एक-दूसरे के समानांतर (पैरेलल) थीं। वे जमीन के ढाल को सीधा काटती थीं और पानी की राह में रुकावट बनकर रह गई थीं। एक अंग्रेज इंजीनियर, विलियम विलकॉक्स ने इन बाँधों जैसी संरचनाओं के बारे में लिखा था, "इन पाँच राक्षसी दीवारों ने दामोदर को कैद कर लिया और (बर्धमान से) हुगली के बीच के मस्त और खुशहाल इलाके को मलेरिया और गरीबी के गड्ढे में ढकेल दिया।"
दामोदर पर तटबंध बन जाने की आड़ में बाहर के प्राकृतिक तालाब और पोखरे बेमौत मरने लगे; क्योंकि वे पानी में उगने वाले खरपतवार से भर गए, जमीन की उर्वरता समाप्त होने लगी और सूखा तथा अकाल अपना बदनुमा चेहरा दिखाने लगे। रेल लाइन के 1860 में पूरा होने के सिर्फ एक साल के अंदर बर्धमान में 1861 में मलेरिया फैला। आखिरकार दामोदर पर बने दाहिने तटबंध को 1859 में 32 किलोमीटर की लंबाई में सरकार द्वारा तोड़ा गया। इस तरह जमीन की उर्वरा शक्ति वापस लौटी और 1863 तक हालात पर काबू पा लिया गया।
(इन्टरनेट से साभार लिया गया वीडियो झंझारपुर में कमला-बलान का है)
Bihar Flood Crisis :
The Reality of BJP’s Relief Efforts
जनता को पैसों से ही जनता की त्रासदी में राहत कार्य चलाकर अपना चेहरा मत चमकाइए !
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भाजपा के कोष में जो 30 हजार करोड़ है, उसमें से भी कुछ देना चाहिए।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह सिर्फ चुनाव लड़ने और वादे करने बिहार आते हैं, और जब बिहार किसी त्रासदी को झेल रहा होता है, तो इन दोनों से बिहार को लेकर एक ट्वीट तक नहीं होता !