कोई ईमानदार कब होगा?
जब व्यक्ति को सत्य या स्वयं के वास्तविक प्रकृति का बोध होगा।
क्या बच्चे ईमानदार होते हैं?
सत्य का बोध कब होता है?
मेरा तो कहना है सभी सद्गुण जैसे सरलता, सहजता, सत्यनिष्ठा, तार्किकता, ईमानदारी और न्यायप्रियता ये सभी स्वयं से ही संबंधित होते हैं।
इनकी सार्थकता तभी होती है जब इनकी सिद्धि स्वयं के साथ या स्वयं से होती है।
यह समझ किन अनुभवों या चिंतन से आई?
आ जाते हैं अनुभव में, चिंतन मनन में।
मेरा इनपर कोई व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। हो ही नहीं सकता है।
जिस समाज में शिक्षा का स्वरूप नौकरी और अंततः व्यक्तिगत आराम जैसे उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के लिए हो, उस समाज में परोपकारिता जैसे आदर्श गौण हो जाते हैं।