₹100 का नोट
मां ने बेटे को घर से निकलते समय ₹100 दिए।
बेटा बोला,
“मां, इतने कम?”
मां मुस्कुराई,
“काम चल जाएगा।”
20 साल बाद मां नहीं रही।
घर साफ करते समय बेटे को वही ₹100 का नोट मिला।
उसने नोट संभालकर रखा हुआ था।
पीछे मां ने लिखा था—
आखिरी सीट.....🚌
बस पूरी भरी हुई थी।
एक बच्चा अपनी सीट पर बैठा था।
एक बुजुर्ग बस में चढ़े।
बच्चे ने तुरंत सीट छोड़ दी।
बुजुर्ग ने कहा,
“तुम बैठो बेटा।”
बच्चा बोला—
“मम्मी कहती हैं, जिन लोगों ने हमसे ज्यादा जिंदगी देखी हो, उनके लिए जगह छोड़ देनी चाहिए।”
रिक्शावाला
एक आदमी रिक्शे से उतरा और जल्दी में ₹2,000 ज्यादा दे गया।
रिक्शावाले ने आवाज लगाई—
“साहब!”
आदमी मुड़ा।
“आपके पैसे ज्यादा हैं।”
आदमी बोला,
“रख लो।”
रिक्शावाला मुस्कुराया—
“साहब, अगर आज रख लिए तो कल अपने बच्चों को क्या सिखाऊंगा?”
आदमी कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
“तुम्हारी चीजें जरूरत हैं बेटा… मेरी चीजें इंतजार कर सकती हैं।”
उस रात बेटे ने पहली बार अपनी अलमारी देखी।
कई चीजें नई थीं।
पिता की चप्पल पुरानी।
उसे समझ आया—घर में सबसे ज्यादा त्याग अक्सर उसी का होता है, जो सबसे कम मांगता है।
पिता की चप्पल
बेटे ने नई चप्पल खरीदते हुए पिता से पूछा—
“आपके लिए भी ले दूँ?”
पिता बोले,
“मेरी अभी चल रही है।”
बेटे ने ध्यान नहीं दिया।
घर लौटकर उसने देखा—
पिता की चप्पल की पट्टी धागे से बंधी हुई थी।
बेटे ने पूछा,
“आपने बताया क्यों नहीं?”
पिता हंसकर बोले—
₹20 की चाय
चाय वाले ने उससे ₹20 लेने से मना कर दिया।
लड़का बोला,
“अंकल, उधार नहीं रखता।”
चाय वाला मुस्कुराया
“तुमने पिछली बार मेरी दुकान के बाहर गिरे ₹5,000 लौटाए थे।”
लड़का चुप हो गया।
चाय वाले ने कहा-
“ईमानदारी का हिसाब पैसे से नहीं होता बेटा।”
उस दिन दोनों ने चाय पी।
आज ATM ने मेरे ₹5000 रोक लिए।
मैं गुस्से में मशीन को देख रहा था।
पीछे एक बुजुर्ग चुपचाप खड़े थे।
उन्होंने कहा
“बेटा, मशीन को थोड़ा समय दे दो।”
मैं हंसकर बोला-
“अंकल, पैसे अटक गए हैं इसलिए परेशान हूं।”
उन्होंने कहा-
“पैसे ही तो अटके हैं बेटा… जिंदगी थोड़ी अटकी है।”
कुछ
📰 नॉलेज ग्राफिक्स
🇮🇳 केरल बना केरलम... समझें नाम बदलने की प्रक्रिया
हाल ही में केरल का आधिकारिक नाम ‘केरलम’ हुआ। नाम बदलने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत पूरी हुई। आखिर राज्य का नाम बदलने के लिए किन कानूनी और संवैधानिक चरणों से गुजरना पड़ता है? समझें पूरी प्रक्रिया...
③ राय बाध्यकारी नहीं
विधानसभा की राय संसद पर बाध्यकारी नहीं होती। संसद अलग फैसला कर सकती है।
④ संसद से मंजूरी
विधेयक का लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सभाओं से पारित होना जरूरी है।
⑤ राष्ट्रपति की मंजूरी
संसद से पारित विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है। मंजूरी के बाद यह कानून बनता है
📌 राज्य का नाम बदलने की कानूनी प्रक्रिया
① राष्ट्रपति की सिफारिश
नाम बदलने वाला विधेयक संसद में राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना पेश नहीं होता है।
② विधानसभा से राय
राष्ट्रपति विधेयक को राज्य विधानसभा की राय के लिए भेजते हैं, जो तय समय में अपनी राय देती है।
एक संत कई साल बाद अपने पुराने मित्र से मिलने उसके गांव पहुंचे?
वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि उनका मित्र और उसके दो भाई बहुत गरीबी में जीवन गुजार रहे थे।
घर के बाहर एक फल का पेड़ था।
वही पेड़ उनकी पूरी कमाई का सहारा था।
तीनों भाई रोज फल तोड़ते, बाजार में बेचते और जो पैसे मिलते उसी से घर का खर्च चलता था।
उस दिन भी उन्होंने फल बेचकर कुछ पैसे कमाए।
लेकिन कमाई इतनी कम हुई कि सिर्फ दो लोगों के खाने का इंतजाम हो पाया।
संत के सामने परेशानी न आए इसलिए दो भाइयों ने कहा,
"हमें भूख नहीं है, आप लोग खाना खा लीजिए।"
लेकिन संत समझ गए कि वे झूठ बोल रहे हैं।
उस रात संत बहुत देर तक सोचते रहे।
उन्हें अपने मित्र की हालत पर दया आ रही थी।
लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि उसकी मदद कैसे करें।
आधी रात को संत उठे।
घर के बाहर गए।
और कुल्हाड़ी से उस फल के पेड़ को काट दिया।
फिर बिना किसी को बताए गांव छोड़कर चले गए।
सुबह जब तीनों भाइयों ने पेड़ को कटा हुआ देखा।
तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उनकी रोज की कमाई खत्म हो चुकी थी।
पूरा गांव संत को बुरा-भला कहने लगा।
सबको लगा कि उन्होंने बहुत बड़ा अन्याय किया है।
समय बीतता गया।
कई साल बाद संत फिर उसी गांव से गुजर रहे थे।
उनके मन में डर था कि कहीं लोग उन्हें देखकर नाराज न हो जाएं।
फिर भी उन्होंने अपने मित्र से मिलने का फैसला किया।
लेकिन गांव पहुंचते ही वह हैरान रह गए।
जहां पहले टूटा-फूटा घर था।
वहां अब एक बड़ा और सुंदर मकान खड़ा था।
घर के बाहर गाड़ियां खड़ी थीं।
और परिवार खुशहाल जीवन जी रहा था।
तभी उनका मित्र दौड़ता हुआ आया और उनके चरण छू लिए।
संत ने आश्चर्य से पूछा,
"यह सब कैसे हुआ?"
मित्र मुस्कुराया और बोला,
"जब आपने पेड़ काटा था, तब हम आपसे बहुत नाराज थे।"
"हमें लगा था कि आपने हमारी जिंदगी बर्बाद कर दी।"
"लेकिन बाद में समझ आया कि वही पेड़ हमारी सबसे बड़ी रुकावट था।"
"हम रोज थोड़े से फल बेचकर गुजारा कर लेते थे।"
"इसलिए कभी कुछ नया करने की कोशिश ही नहीं की।"
"पेड़ कटने के बाद मजबूरी में मेहनत करनी पड़ी।"
"नई चीजें सीखीं, काम शुरू किया और धीरे-धीरे सफलता मिलती गई।"
संत मुस्कुराए।
क्योंकि उन्हें वही जवाब सुनना था।
कई बार हमारी जिंदगी में भी कोई ऐसा "पेड़" होता है।
जो हमें सुरक्षित तो महसूस कराता है लेकिन आगे बढ़ने से रोकता भी है।