@TheTribhuvan कहीं ये कांग्रेस वाले जानबूझकर तो चुनाव नहीं हार जाते हैं, अगर जीत गए तो मुख्यमंत्री कैसे चुनेंगे..?
इनके लिए चुनाव जीतने से बड़ा रासा विधायक दल का नेता चुनना है..😀😀
@TheTribhuvan सरकार से ये आशा करना कि कोई सरकारी स्तर पर आयोजन करेगी बेवकूफी होगी,
अगर नेहरू के बारे में बेबुनियाद आरोप लगाने और अफवाह फैलानी बन्द कर दी जाए तो भी उस महान विभूति के लिए श्रद्धांजलि होगी..!!
तअल्लुक़ात की क़ीमत चुकाता रहता हूँ
मैं उनके झूठ पे भी मुस्कुराता रहता हूँ,
मगर ग़रीब की बातों को कौन सुनता है
मैं बादशाह था सबको बताता रहता हूँ,
तमाम कोशिशें करता हूँ सौहार्द्य बढ़ाने की
मैं दुश्मनों को भी घर पे बुलाता रहता हूँ..!!
पूर्व उपराष्ट्रपति श्री भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे। पूरा राजस्थान जानता है कि उनके जीवनकाल में भाजपा ने उन्हें कभी पूरा सम्मान नहीं दिया। जब वे उपराष्ट्रपति बने तो उनके सम्मान में हमारी कांग्रेस सरकार ने मुख्यमंत्री आवास में उनके सम्मान में भव्य समारोह रखा था परन्तु भाजपा ने कोई कार्यक्रम तक नहीं रखा।
कांग्रेस ने उनके निधन के बाद भी उन्हें पूरा सम्मान दिया। श्री शेखावत के निधन के दिन ही उनके परिजनों से चर्चा कर हमारी कांग्रेस सरकार ने विद्याधर नगर स्टेडियम में अविलंब उनके दाह संस्कार हेतु जमीन आवंटित की और वहीं उनका स्मारक बनाया। पूरे प्रदेशवासियों में तब भी चर्चा थी और आज भी बनी हुई है कि यदि भाजपा सरकार भी होती तो उनके अंतिम संस्कार की अनुमति विद्याधर नगर में नहीं देती और न ही उनका स्मारक बनने देती।
आज मेरे क्षेत्र जोधपुर में श्री भैरों सिंह शेखावत की मूर्ति के उद्घाटन का राजकीय कार्यक्रम था जो जोधपुर विकास प्राधिकरण द्वारा आयोजित किया गया। आज श्री भैरों सिंह शेखावत की आत्मा को भी कष्ट हुआ होगा कि बिना अशोक गहलोत को बुलाए यह कार्यक्रम किया गया। भाजपा ने इस कार्यक्रम में राजनीति कर इस कार्यक्रम की गरिमा को कम किया है।
मुझे ऐसा लगता है कि यह बात रक्षा मंत्री श्री @rajnathsingh की जानकारी में आता तो ऐसा नहीं होता।
किसान की फसल नहीं, भरोसा भी तौला जा रहा है
राजस्थान के भादरा–सिद्धमुख अंचल में किसानों की मांग कोई एहसान नहीं, न्याय की न्यूनतम पुकार है। खाद-बीज से लेकर मंडी, समर्थन मूल्य, तुलाई और भुगतान तक किसान पहले ही व्यवस्था की सबसे लंबी कतार में खड़ा आदमी है। वह मौसम से लड़ता है, महंगे डीज़ल से लड़ता है, खाद की किल्लत से लड़ता है, बीज की मिलावट से लड़ता है, कीट और सूखे से लड़ता है; लेकिन सबसे दुखद यह है कि जब उसकी फसल आखिरकार खरीद केंद्र तक पहुँचती है, तब उसे कांटे पर भी लड़ना पड़ता है।
सिद्धमुख क्षेत्र में चना तुलाई के नाम पर जो गड़बड़ी सामने आई है, वह केवल तकनीकी गलती नहीं मानी जा सकती। यदि किसान अपने घर से वजन करके बोरी लाता है और मंडी में वही बोरी 2 से 3 किलो प्रति 50 किलो कम निकलती है तो यह मामूली अंतर नहीं, सीधा आर्थिक प्रहार है। 50 किलो की बोरी पर 2-3 किलो की कटौती का अर्थ है कि हर किसान की मेहनत से अदृश्य हाथ माल काट रहा था। हजारों बोरियों पर यह खेल चले तो यह नुकसान लाखों-करोड़ों तक जा सकता है। यह केवल तौल-कांटे की गड़बड़ी नहीं, किसान के खून-पसीने की चोरी है।
MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य किसान की सुरक्षा-कवच व्यवस्था है। इसका उद्देश्य किसान को बाजार की लूट से बचाना है। लेकिन यदि समर्थन मूल्य केंद्र ही शंका, हेराफेरी और मिलीभगत के अड्डे बन जाएँ, तो यह व्यवस्था किसान के लिए सहारा नहीं, जाल बन जाती है। किसान ओने-पोने दाम पर बेचने को मजबूर हो, फिर सरकारी खरीद में तुलाई पर कटे और फिर भुगतान के लिए भटके, यह किसी भी कृषि-प्रधान समाज के लिए शर्मनाक स्थिति है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर प्रश्न है: तौल कांटे की जाँच कौन कर रहा था? खरीद केंद्र पर निगरानी किसकी थी? अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार और संबंधित एजेंसियाँ क्या कर रही थीं? यदि किसानों ने बाहर से कांटा लाकर गड़बड़ी पकड़ी, तो इसका अर्थ है कि सरकारी निगरानी या तो सो रही थी या मिली हुई थी। दोनों स्थितियाँ अस्वीकार्य हैं।कृष्णा पूनियां और वर्तमान विधायक मनोज कुमार का किसानों के साथ धरने पर बैठना इस बात का संकेत है कि मामला स्थानीय आक्रोश से आगे जाकर किसान-गरिमा का मुद्दा बन चुका है। भीषण गर्मी में किसान और जनप्रतिनिधि धरने पर बैठे हैं, तो सरकार को इसे राजनीतिक शोर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। यह खेत से मंडी तक फैले अविश्वास की आग है।सरकार को तुरंत ये कदम उठाने चाहिए:
संबंधित खरीद केंद्र के सभी तौल कांटों की स्वतंत्र तकनीकी जाँच हो।
पूरे सीजन की तुलाई का ऑडिट कराया जाए।
दोषी पाए जाने पर अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार और एजेंसी पर FIR दर्ज हो।
जिन किसानों को वजन में नुकसान हुआ है, उनकी भरपाई ब्याज सहित की जाए।
हर खरीद केंद्र पर डिजिटल, प्रमाणित और सार्वजनिक डिस्प्ले वाला तौल सिस्टम लगे।
किसान प्रतिनिधियों की मौजूदगी में तुलाई अनिवार्य की जाए।
हर बोरी का वजन पर्ची, वीडियो रिकॉर्ड और ऑनलाइन डेटा से लिंक हो।
किसान केवल अपनी फसल का दाम नहीं मांग रहा; वह अपने श्रम का सम्मान मांग रहा है। सरकारें अक्सर अन्नदाता शब्द बोलती हैं, लेकिन असली परीक्षा मंडी के कांटे पर होती है। यदि कांटा ही बेईमान हो जाए, तो भाषणों की पूरी फसल बेकार है।राजस्थान सरकार को समझना चाहिए कि किसान की चुप्पी सहमति नहीं होती। किसान जब तक खेत में झुका रहता है, तब तक वह देश को अन्न देता है; लेकिन जब वही किसान मंडी, तहसील और सड़क पर खड़ा हो जाता है, तो वह व्यवस्था से हिसाब मांगता है। सिद्धमुख की तुलाई-गड़बड़ी केवल एक केंद्र का मामला नहीं है; यह पूरे खरीद तंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा है।अब सरकार को साबित करना होगा कि वह किसान के साथ है या कांटे के खेल में लगे दलालों, ठेकेदारों और भ्रष्ट कर्मचारियों के साथ। किसान की बोरी से निकला हर किलो केवल अनाज नहीं, उसके परिवार की रोटी, बच्चों की फीस, कर्ज की किस्त और अगले सीजन की उम्मीद है। उस पर डाका डालना केवल भ्रष्टाचार नहीं, अन्नदाता के विश्वास की हत्या है।
@KrishnaPooniaIN@manojnyangali
@TheTribhuvan हर कोई यह मानता है गहलोत ने आत्मघाती फैसला लिया था मुख्यमंत्री की कुर्सी चुनके।
लोग खिचड़ी पकाते हैं, गहलोत ने राबड़ी बनाई हैं..!! खिचड़ी निवाई, जबकि राबड़ी दूसरे दिन ठंडी खाई जाती है..!!
@TheTribhuvan जी इन दिल्ली के कलमकारों को कहिए राबड़ी ठंडी होने दे घण्णी चौखी लागेगी..!!
@TheTribhuvan कहीं ये कांग्रेस वाले जानबूझकर तो चुनाव नहीं हार जाते हैं, अगर जीत गए तो मुख्यमंत्री कैसे चुनेंगे..?
इनके लिए चुनाव जीतने से बड़ा रासा विधायक दल का नेता चुनना है..😀😀