पिछले कुछ समय से तमाम सुधीजन ‘भाषा विशेषज्ञ’ बने हुए हैं। कभी किसी प्रोटेस्ट में शामिल होने वाले बच्चों की भाषा तो कभी नेता प्रतिपक्ष की प्रेस कांफ्रेंस की भाषा। सबसे पहले सवाल उठाया गया CJP प्रोटेस्ट में शामिल छात्र-छात्राओं की भाषा को लेकर। किसी मीडिया वाले ने कहा कि छात्रों की भाषा मर्यादा के अनुकूल नहीं है, किसी भाषा विशेषज्ञ ने कहा कि छात्रों को संयम बरतना चाहिए, किसी ने देश की भावी पीढ़ी को अश्लील बता दिया तो किसी ने तो आंदोलन की मंशा पर ही सवाल उठा दिया।
आज ये लोग नेता प्रतिपक्ष की भाषा और शैली पर सवाल उठा रहे हैं।
मैं इन सब बातों में नहीं जाना चाहता कि किसने क्या कहा और क्या नहीं कहा, लेकिन मैं बदलते दौर की भाषा पर बात करना चाहता हूँ।
याद कीजिए वो दिन जब लोकसभा में BJP से तत्कालीन सांसद रमेश विधुड़ी ने चिल्लाकर कहा था- क**** भ** और ना जाने क्या अनाप शनाप या साफ़ शब्दों में कहा जाए तो संसद में खड़े होकर गाली दी थी एक मुस्लिम सदस्य को। तब किसी ने भाषा पर सवाल नहीं उठाया। तब गृहमंत्री और प्रधानमंत्री ने उस भाषा पर कुछ नहीं कहा और ना ही प्रधानमंत्री जी की तरफ़ से कोई रील इंस्टाग्राम पर डाली गई।
उस वक़्त जिनके मुँह में दही जम गया था वो आज भाषा विशेषज्ञ बने घूम रहे हैं। जब तब कोई बदलती भाषा पर नहीं बोला तो आज भी उनको बोलने का अधिकार नहीं है।
आज जिस भाषा की बात हो रही है वो सड़क की है लेकिन रमेश विधुड़ी ने संसद में बोला था।
आज सत्ता के चरण चुंबक बने इन बुद्धिजीवियों को सोचना चाहिए। नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से ही सीखती है।
“जब संसद की भाषा पतित होगी तो सड़कें कैसे सभ्य बनीं रहेंगी?”
@kharge@_nehruvian@IYC@nsui@NSUIRajasthan@NSUIMP@INCIndia@CongressSevadal@aajtak@News18India@Republic_Bharat@RahulGandhi@priyankagandhi@BabelePiyush@AjayLalluINC@AdvRajendraPal@AishPaliwal
#Partition1947 #IndependenceDay @mausamii2u@_SandeepDikshit@Ashok_Kashmir@UrmileshJ@AadeshRawal@TheNewspinch
राहुल गाँधी की लड़ाई कई बार सत्ता प्राप्ति से कहीं ज्यादा संविधान बहाली की लड़ाई लगती है. इसीलिए उनका उद्देश्य सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं है बल्कि लोकतंत्र की मरम्मत करना है.
#nehrustudycircle https://t.co/Tr45HfuSKM
@shakeelNBT जी की बात सही है। प्रशासन का ऐसा रवैया अचानक नहीं हुआ है। इनको आदेश दिए जाते हैं। सरकार जैसा चाहेगी पुलिस प्रशासन वैसा ही व्यवहार करेगा।
#nehrustudycircle
पुलिस यह सब अपने आप नहीं कर रही।
उससे कहा गया है।
पहले जब आंदोलन होते थे तो पुलिस से कहा जाता था जरा देख के।
संभल के।
इंदिरा गांधी एक सफदरजंग में रहती थी उनके घर के पास तक आंदोलनकारी पहुंच जाते थे।
जेएनयू के छात्र पहुंचे कहने लगे हम आपको यूनिवर्सिटी के कुलपति पद से बर्खास्त करने आए हैं।
इंदिरा गांधी ने अंदर बुला लिया।
लड़कों ने जिनका नेतृत्व जेएनयू के छात्र संघ के अध्यक्ष सीताराम येचुरी कर रहे थे उनके खिलाफ आरोप पत्र पढ़ा।
पहला फोटो।
और अब इस तरह मारा जा रहा है।
दूसरा फोटो।
पत्रकारों के साथ दिल्ली में ऐसा कभी नहीं हुआ।
मगर प्रधानमंत्री मोदी अमित शाह गुजरात में ऐसा पत्रकारों के साथ पहले कर चुके थे।
उसी को यहां दोहराया जा रहा है।
तीसरा फोटो महिला पत्रकार को उठा कर ले जाते हुए।
भारत के पहले चुनाव आयोग ने बिना एक भी दस्तावेज़ माँगे 17 करोड़ लोगों को मतदाता सूची में शामिल किया था। आज का चुनाव आयोग कागज़ात माँगता है और लोगों के नाम काट देता है।
@gurdeepsappal#nehrustudycircle
अमित शाह जी- ध्यान से देख लीजिए, ये हिंदुस्तान है 👇
यहां न कोई हिंदू है, न मुस्लिम। न पुरुष है, न महिला। न कोई जाति है। यहां सिर्फ एक आवाज है, एक प्रोटेस्ट है- ये हिंदुस्तान है।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह, आप दोनों इस आवाज के सामने खड़े मत होइए, क्योंकि इसके सामने कोई खड़ा नहीं हो सकता।
मैं सभी युवाओं और छात्रों से कह रहा हूं कि आप वीडियो एविडेंस रखिए।
जब ये मामला ख़त्म हो जाएगा, तब हम इन सबूतों का इस्तेमाल करेंगे और ऊपर से लेकर नीचे तक सबको सजा दिलाएंगे। कोई बचेगा नहीं।
: नेता विपक्ष श्री @RahulGandhi
ये कांग्रेस की शेरनी है, किसी से डरेगी नहीं।
कल दिल्ली में NSUI के साथी 'वोट चोरी' के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, इस दौरान पुलिस ने @Ritubarala जी को डिटेन कर लिया।
इसके बाद बस में चंचल यादव नाम की महिला कॉन्स्टेबल ने रितु को बुरी तरह मारा। फिर थाने ले जाकर पैरों पर डंडों से मारा गया।
दिल्ली पुलिस ये याद रखे - हम यह बर्बरता भूलेंगे नहीं। रितु का कहना है - आपको जितना मारना है मार लो, हम डरेंगे नहीं, अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे और जीतेंगे।
ये वीडियो आज सोशल मीडिया पर लगातार दिखाई दे रहा है। वीडियो में जो जिसे नीचे गिराया हुआ है वह NSUI की प्रमुख कार्यकर्ता और जयपुर के सबसे बड़े गर्ल्स कॉलेज ‘विश्वविद्यालय महारानी महाविद्यालय’ की अध्यक्ष रहीं रितु बराला हैं। रितु बराला ने राजस्थान विश्वविद्यालय से भी NSUI के टिकट पर चुनाव लड़ा है।
इतनी बड़ी नेत्री के साथ इस प्रकार का व्यवहार बहुत ही निंदनीय और शर्मनाक है। क्या दिल्ली पुलिस भूल गई है कि उनकी ड्यूटी की एक गरिमा होती है!
या उनको लगता है कि उनका गुंडाराज यूँ ही चलता रहेगा? स्टूडेंट्स के प्रोटेस्ट में स्टूडेंट डिटेन भी होते हैं, थाने में भी रखें जाते हैं लेकिन ऐसा दुर्व्यवहार आज तक नहीं देखा गया।
रितु बराला ने हमेशा छात्रहितों के लिए काम किया है और आगे भी करती रहेंगी।
कांग्रेस पार्टी के सीनियर नेताओं को इस मुद्दे में दखल देना चाहिए और रितु बराला को ज़रूरी क़ानूनी सहायता मुहैया करवानी चाहिए।
तानाशाह को आख़िरी संदेश-
दम है कितना दमन में तेरे
देख लिया है देखेंगे 💪🏻💪🏻💪🏻
@nsui@NSUIRajasthan@NSUIDelhi@VinodJakharIN@RahulGandhi@priyankagandhi@INCIndia@IYC@srinivasiyc@kanhaiyakumar@UdayBhanuIYC@ChitwanGodara@ManishSharmaIYC@kharge@ravish_journo@ajitanjum@Pawankhera@kcvenugopalmp@pbhushan1@GovindDotasra@viyonajaat@TikaRamJullyINC@dr_chayanika@DrRamSinghSamot
#nehrustudycircle
जब पंडित नेहरू ने देशव्यापी प्रदर्शन का आह्वान किया
-------------------------------------------------
दिल्ली की सड़कों पर कांग्रेस का प्रदर्शन केवल किसी एक राजनीतिक मांग का सवाल नहीं है। 12 अक्टूबर 2026 को लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी और कांग्रेस श्री अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के मार्च में हिस्सा लिया। कांग्रेस की मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर जवाबदेही तय करने की मांग शामिल रही।
कांग्रेस के इतिहास में विरोध प्रदर्शन महज सड़कों पर उतरने की कार्रवाई नहीं रही हैं। पार्टी के नेताओं ने कई मौकों पर गिरफ्तारी, दमन और नागरिक स्वतंत्रताओं पर पाबंदियों के खिलाफ जनता को लामबंद किया। इस सिलसिले की एक अहम मिसाल 1936 में मिलती है, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की गिरफ्तारी के विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन का आह्वान किया था।
22 अप्रैल 1936 को जारी अपने बयान में पंडित नेहरू ने प्रस्ताव रखा कि 10 मई को देशभर में सार्वजनिक सभाएं की जाएं और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की गिरफ्तारी के विरोध में प्रस्ताव पारित किए जाएं। उन्होंने इस गिरफ्तारी को भारत में नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन की व्यापक होती प्रवृत्ति का एक गंभीर उदाहरण बताया। पंडित नेहरू का जोर सिर्फ एक नेता की रिहाई पर नहीं था, वह इस सवाल को जनता के अधिकारों से जोड़ रहे थे।
9 मई 1936 को तेज बहादुर सप्रू को लिखे पत्र में पंडित नेहरू ने इस विचार को और स्पष्ट किया। उन्होंने समझाया कि नागरिक स्वतंत्रताओं का सवाल अक्सर तब सामने आता है, जब जनता या उसका कोई हिस्सा सरकार से असहमत होता है। अगर लोग सरकार की नीतियों के सामने बिना विरोध किए झुक जाएँ, तो नागरिक स्वतंत्रताओं को दबाने का सवाल ही नहीं उठेगा। लेकिन लोकतंत्र की असली कसौटी यही है कि जनता को असहमति जताने और सरकार से सवाल पूछने का अधिकार हासिल हो।
इसी पत्र में पंडित नेहरू ने लिखा था, “लोकतंत्र तभी ठीक ढंग से काम कर सकता है, जब जनमत लगातार सरकार पर निगरानी रखे और उसे निरंकुश बनने से रोके।”
करीब नौ दशक बाद, कांग्रेस का मौजूदा प्रदर्शन एक अलग राजनीतिक और संवैधानिक परिस्थिति में हो रहा है। आज कांग्रेस चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठा रही है।
इसी संदर्भ में अगर देखें तो पंडित नेहरू के 1936 के आह्वान की अहमियत यही थी कि उन्होंने गिरफ्तारी के विरोध को केवल किसी व्यक्ति या संगठन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे नागरिक स्वतंत्रताओं के बड़े सवाल से जोड़ा।
कांग्रेस के इतिहास में यह प्रसंग याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक राजनीति का अर्थ सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि सत्ता और संस्थाओं से जवाब मांगना भी है।
@INCHistory
#nehrustudycircle
आज जब देश को कट्टरपंथ से बचाने के लिए सेक्युलर पार्टियां RSS और BJP से लड़ाई लड़ रही हैं, उस समय ओवैसी जैसे नेता मुस्लिम लीग की भाषा बोलेंगे तो जाहिर सी बात है कि BJP और RSS और मजबूत होंगी। BJP को हराने के लिए BJP जैसा बनना सेक्युलर पार्टियों की हार मानी जाएगी।
कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में जब हिंदू और मुस्लिम धर्म के लोग अंग्रेजों से मिलकर लड़ाई लड़ रहे थे, उस समय हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग धर्म की लड़ाई लड़ने लगे, जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत कई हिस्सों में बंट गया था।
@Abhinandan_AY
#nehrustudycircle
राहुल गाँधी की लड़ाई कई बार सत्ता प्राप्ति से कहीं ज्यादा संविधान बहाली की लड़ाई लगती है. इसीलिए उनका उद्देश्य सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं है बल्कि लोकतंत्र की मरम्मत करना है.
#nehrustudycircle https://t.co/Tr45HfuSKM
सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।
जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अँग-अँग में लगे साँप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली ।
जनता ? हाँ, लम्बी-बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है ?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है ?"
मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुँही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में ।
लेकिन होता भूडोल, बवण्डर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।
हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है ।
अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अन्धकार
बीता; गवाक्ष अम्बर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं ।
सब से विराट जनतन्त्र जगत का आ पहुँचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो ।
आरती लिए तू किसे ढूँढ़ता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में ?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में ।
फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से शृँगार सजाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।
#nehrustudycircle
#marchfordemocracy #ChaloDilli #supremecourt
जिन लोगों को लगता है कि राहुल गांधी का सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ मार्च का फ़ैसला ग़लत है या जिनको लगता है कि CJI से मिलना ठीक नहीं है उन लोगों को अभी तक राहुल गांधी का व्यक्तित्व समझ ही नहीं आया। लोगों को लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट जाने से कांग्रेस का क्या फायदा होगा?
असल में यह लड़ाई वोट हासिल करने की नहीं है बल्कि देश की संस्थाओं को पुनः स्थापित करने की लड़ाई है। आज देश का भरोसा संवैधानिक संस्थाओं से उठता जा रहा है ऐसे में राहुल गांधी उन संस्थानों का अस्तित्व बचाने के लिए भी लड़ रहे हैं क्योंकि यदि संविधान और संवैधानिक संस्थाओं का अस्तित्व बना रहा तो देश भी बना रहेगा।
जय हिन्द 🇮🇳
#nehrustudycircle
#marchfordemocracy
जब उद्देश्य एक है तो मंच सबका साझा क्यों नहीं होना चाहिए?
CJP और Left पार्टीज़ ने जब प्रोटेस्ट का कॉल दिया तब कांग्रेस की यूथ और छात्र इकाई IYC और NSUI के कार्यकर्ताओं ने लगातार इन प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और सेवादल के लोगों ने तो भोजन और पानी की व्यवस्था भी संभाली।
लेकिन अब जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने कल इतने बड़े प्रदर्शन का कॉल दिया है तब CJP का इस तरह से ख़ुद को बाहर रखना उनकी औछी राजनीतिक सोच का परिचय देता है। यह लड़ाई मेरी या उसकी नहीं है
यह लड़ाई हम सबकी है।
#nehrustudycircle #ChaloDilli @Cockroachisback@abhijeet_dipke@SauravDassss@AshutoshRanka
🚨 Important:
All Cockroaches currently in Delhi should stay back. Next call on its way! 😎
For Cockroaches outside Delhi, the trains are running again 😉
पुलिस ने कहा,
चार लोगों का एक साथ खड़ा होना अपराध है!
उसी वक्त मैंने देखा,
चार सौ पुलिसवाले एक साथ खड़े थे।
चार नागरिक साथ खड़े हों तो अपराध,
चार सौ वर्दीधारी साथ खड़े हों तो कानून का पहरा!
बस, इसी चार और चार सौ के बीच कहीं कैद है,
हमारा लोकतंत्र, बेड़ियों में जकड़ा हमारा संविधान और दम तोड़ती हुई इंसानियत।
@JNU_Ganpat
#nehrustudycircle
#ChaloDilli
पुलिस ने कहा,
चार लोगों का एक साथ खड़ा होना अपराध है!
उसी वक्त मैंने देखा,
चार सौ पुलिसवाले एक साथ खड़े थे।
चार नागरिक साथ खड़े हों तो अपराध,
चार सौ वर्दीधारी साथ खड़े हों तो कानून का पहरा!
बस, इसी चार और चार सौ के बीच कहीं कैद है,
हमारा लोकतंत्र, बेड़ियों में जकड़ा हमारा संविधान और दम तोड़ती हुई इंसानियत।
अशोक जी की ‘गांधी वध क्यों’, ‘ कश्मीर और कश्मीरी पंडित’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें पढ़ चुके हैं। आपकी एक पुस्तक ‘सावरकर: काला पानी और उसके बाद’ भी मार्केट में उपलब्ध है।
इसी कड़ी में यह पुस्तक, जो शहीद भगत सिंह कि जीवन पर आधारित है, प्रकाशित हो चुकी है।
अशोक जी वर्तमान दौर में एक महत्वपूर्ण लेखक हैं जो लगातार नेहरू, गांधी, भगत सिंह और अंबेडकर की विचारधारा का झंडा बुलंद किए हुए हैं।
अशोक सर को बधाई
@Ashok_Kashmir
कई लोगों ने पूछा कि ‘हिंसा-अहिंसा और भगत सिंह’ में क्या है?
मुझे कहना हो तो मैं कहूँगा यह एक वैचारिक जीवनी है जिसमें उनके बारे में प्रचलित बहुत से झूठों और अर्धसत्यों की जाँच भी की गई है और इसके लिए डेढ़-दो सौ के क़रीब किताबों, शोध पत्रों और आर्काइव दस्तावेज़ों का इस्तेमाल किया गया है।
विषय सूची दे रहा हूँ।
मरे हुए लोकतंत्र के डरे हुए तानाशाह की घबराई हुई पुलिस के ये हाल देखिए!
अपने अधिकारों की आवाज़ उठाती जनता को सड़कों पर बेरहमी से घसीटा जा रहा है। सवाल पूछने वालों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार हो रहा है, मानो लोकतंत्र में विरोध करना ही सबसे बड़ा अपराध बन गया हो।
याद रखिए, जनता से डरने वाली सत्ता पुलिस के बल पर खामोशी तो थोप सकती है, लेकिन सवालों को हमेशा के लिए दफ़न नहीं कर सकती।
#Delhi #JantarMantar
भारत की बदहाली पर सवाल सिर्फ सत्ता से नहीं, Bureaucracy से भी होना चाहिए!
किसी भी देश की बर्बादी हमेशा सड़कों पर दिखाई नहीं देती; कभी-कभी वह उन बंद कमरों में तय होती है, जहाँ जनता की समस्याओं पर फाइलें चलती हैं, लेकिन समाधान नहीं होता । जहाँ संविधान से अधिक महत्व आदेशों को, accountability से अधिक चापलूसी को और जनसेवा से अधिक अपने पद और प्रभाव को दिया जाने लगता है।
मेरे विचार में, भारत की व्यवस्थागत विफलताओं पर चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक हम Bureaucracy की जवाबदेही, उसकी कार्यशैली और उसके भीतर मौजूद सत्ता-संस्कृति पर गंभीर सवाल नहीं उठाते।
आखिर कब तक जनता दफ्तरों के चक्कर काटती रहेगी? कब तक आम नागरिक को अपने ही अधिकारों के लिए अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाना पड़ेगा? कब तक पद की ताकत को जनता की सेवा के बजाय अपनी दादागिरी का माध्यम बनाया जाता रहेगा?
Democracy में जनता मालिक होती है, Bureaucracy उसकी सेवक, लेकिन जब सेवक खुद को मालिक समझने लगे, तब लोकतंत्र की आत्मा खत्म हो जाती है।
समस्या केवल कुछ अधिकारियों की नहीं, बल्कि उस bureaucratic culture की भी है, जहाँ जवाबदेही कमजोर पड़ती है, राजनीतिक चापलूसी को संरक्षण मिलता है और ईमानदार सवालों को व्यवस्था के लिए चुनौती समझा जाता है।
एक अधिकारी का पद उसे विशेषाधिकार नहीं, बल्कि अतिरिक्त जिम्मेदारी देता है। संविधान किसी भी कुर्सी से बड़ा है और जनता का अधिकार किसी अधिकारी के अहंकार से छोटा नहीं हो सकता।
इसलिए अब सवाल पूछने होंगे। #Students, #Youth, #Activists, #Civil_Society और #Intellectuals को सत्ता के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था से भी सवाल करने होंगे। हमें ऐसी bureaucracy चाहिए जो किसी व्यक्ति या राजनीतिक सत्ता के प्रति नहीं, बल्कि Constitution, Rule of Law और Public Interest के प्रति जवाबदेह हो।
हमें अधिकारियों के खिलाफ नहीं, बल्कि गैर-जवाबदेही, मनमानी और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ खड़ा होना है। सुधार का रास्ता संस्थाओं को कमजोर करना नहीं, उन्हें पारदर्शी, संवेदनशील और accountable बनाना है।
याद रखिए, लोकतंत्र केवल सरकार बदलने से मजबूत नहीं होता; लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब व्यवस्था के हर उस व्यक्ति से सवाल किया जा सके, जिसके हाथ में जनता की जिंदगी और उसके अधिकारों से जुड़ी शक्ति है।
भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ कुर्सी पर बैठा व्यक्ति खुद को शासक नहीं, जनता का सेवक समझे। जहाँ फाइलों से अधिक इंसान की अहमियत हो और आदेशों से अधिक संविधान की।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि देश कौन चला रहा है, सवाल यह भी है कि देश चलाने वाली व्यवस्था किसके प्रति जवाबदेह है?
#BureaucraticReform #Accountability #IndianDemocracy #Constitution #PublicService