Hello NHAI अभी अभी लातूर नांदेड़ हाइवे पर एक कुत्ते को कार वाले ने टक्कर मार दी है, वो गंभीर रूप से घायल है। 1033 पर जानकारी देने के बावजूद भी टॉल वाले नहीं आए। मालेगांव यात्रा टॉल
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किसी यूनिवर्सिटी में शिक्षामंत्री गए।
प्राइवेट यूनिवर्सिटी थी। वहां तमाम इंफ्रास्ट्रक्चर, कोर्सेज, टीचर्स से इंटरेक्शन हुआ। इस क्रम में लाइब्रेरी भी दिखाई गयी। बेहतरीन कलेक्शन, शानदार किताबे, सिस्टम, माहौल, डिजिटल इंतजाम। बच्चे, लाइब्रेरी में भरे पड़े हुए थे।
मंत्रीजी व्यवस्था देख बहुत प्रसन्न हुए। लेकिन एक चीज की कमी खटकी। उन्होंने साथ चल रहे अकादमिक प्रभारी को सलाह दी - इतनी बढ़िया लाइब्रेरी है। आप इसमे एक रेस्टोरेंट क्यो नही खोल देते।
बहुत चलेगा।
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उस अकादमिक बन्दे ने, एक दिन हंसते हंसते यह बात बताई। कहा- हमारी उम्मीद थी कि वे यूनिवर्सिटी, या लाइब्रेरी से खुश होकर कुछ ग्रांट देंगे। कोई वादा करेंगे, कोई नया इंफ्रास्ट्रक्चर, कोर्स या सिस्टम मिल जाएगा।
लेकिन मंत्रीजी की सोच, रेस्टोरेन्ट तक सीमित थी। पर जरा सोचिये। प्रशासन के किस पहलू में यह व्यापारिक मानसिकता नही घुसी हुई??
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कभी दौर था कि मिलावटखोरी अपराध होता था। मेरे शहर का एक पंप, ओकेजनली सील कर दिया जाता, क्योकि उसका मालिक अक्सर पेट्रोल में सॉल्वेंट मिलाकर बेचता।
लोग उस पम्प से बचते थे। अब तो सरकार खुद मिलावटी माल बेच रही है। हर पम्प पर बेच रही है। बच लो!! तब दिए गए माल की मात्रा की जांच होती। एक लीटर की जगह, आपने 950ML दिया तो कार्यवाही।
अब एक महीने के रिचार्ज का मतलब 28 दिन की वैलिडिटी, सीना ठोक कर मिल रही है। बिगाड़ लो।
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यह कहना गलत होगा कि मिलावट खोरी को सरकारी संरक्षण है। असल मे मिलावटखोरों की, मिलावट खोरो के द्वारा, मिलावट खोरो के लिए बनवाई सरकार है।
व्यापारिक मानसिकता की सरकार है। बेजा लाभ के अवसर तलाशने वालो की सरकार है। इसमे इसे कुछ गलत नही लगता।
मगर भुगत पब्लिक रही है। अपनी मूर्खता,
और शोर पर अंधे भरोसे की वजह से..
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एक और उदाहरण देता हूँ।
कभी सरकार, कोयला खदान, बेहद सस्ते में देती थी। मान लीजिए, प्रति टन, 250 रुपये प्रीमियम। पॉवर प्लांट, सस्ता कोयला खरीदते। और आपको बिजली 3 रुपये यूनिट मिलती।
इसे कोयला घोटाला कहा गया।
अब सारी खदानें, वापस ली गई।
फिर से ऑक्शन हुए। कोयला 3000 रु टन के प्रीमियम पर बेचा गया। पॉवर प्लांट ने महंगा कोयला खरीदा। अब वही आपको बिजली 12 रुपये यूनिट मिल रही है।
यह स्वच्छ, और ईमानदार बिजली है।
3 रुपये वाली भ्रस्ट बिजली थी।
मेरा सवाल 12 रुपये रेट पर नही, वह तो मुल्ले टाइट करने के लिए आप 20 रुपये यूनिट भी लेंगे। मेरा सवाल यह है कि प्रीमियम में 250 की जगह सरकार 3000 कमाने लगी। उसे 2750 रुपये हर टन पर अतिरिक्त मिले।
यह पैसे कहाँ गए??
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आह, विकास में। शायद उस रोड में, जिसकी असल कीमत 60 करोड़ प्रति किमी है, पर टेंडर 300 रु करोड़ प्रति किमी का है।
अरे भाई, अच्छी सुविधा,
फोर लेन के लिए पैसे देंगे पड़ेंगे न।
लेकिन अगर ये पैसा, कोयले की अतिरिक्त कमाई से आया,
तो हम टोल क्यो दे रहे है?? तो ध्यान से देखिए। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य-
हर चीज बिकवाली पर है।
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अंतिम उदारहण और झेल लीजिये।
देश मे कोई 106000 मेडिकल सीट हैं। नीट के एग्जाम में क्वालीफाईंग मार्क्स मुश्किल से 20% है। याने आप 20% सवाल हल करके "क्वालीफाई" कर जाते है। तो एक लाख सीट के लिए, 13 लाख लोग क्वालीफाई होते हैं।
इसका क्या अर्थ है??
अर्थ यह है,की कोई 50 हजार सीट सरकारी है। यहां 25 हजार जनरल, बाकी आरक्षण मान लीजिए। लेकिन बाकी की 60 हजार सीट, प्राइवेट कॉलेजों में हैं।
13 लाख लोग इन 60 हजार सीटों की बोली लगाएं, तो एवरेज प्राइज ऊंचा रहेगा। पर आप क्वालिफाइंग मार्क्स 60% कर दें, तो शायद 3 लाख लोग ही बोली लगा पाएंगे। एवरेज सीट प्राइज नीचे आएगा।
दैट्स ए लॉस..
याद रखिये, देश भर के सारे कॉलेज के लिए NTA के माध्यम से "वन नेशन-वन एग्जाम" कराना, आपके लिए सुविधा नही। बराबरी नही। न्याय नही।
व्यापार का हिस्सा है।
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और तब नोट कीजिये कि नजदीकी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज किसका है? उसका मालिक, व्यापारियो की इसी रिंग का मेम्बर निकलेगा। नेताजी स्वयं, अथवा उनका विश्वस्त..
व्यापार बुरा नही।
पर सरकार में रहकर व्यापार बुरा है।
धर्मेंद्र प्रधान, कोई अनोखा काम नही कर रहे थे। सारे मंत्री, केंद्र राज्य की सरकार यही कर रहे हैं। वहां पर अगला जिसे भी लाएंगे, यही करेगा। तब चाणक्य के नाम से आया हुआ व्हाट्सप आपको याद करना चाहिए।
जहां का राजा व्यापारी होता है
वहां की जनता भिखारी होती है।
आप एक तरफ अपने आंदोलन को "अराजनीतिक" बनाना चाहते है।
खुद को राजनीति से दूर रखना चाहते है। किसी की आवाज में आवाज मिलाना नही चाहते, कि पेंट न कर दिये जायें। समान स्वर में पक्ष विपक्ष को गरियाते है,
और नई पीढ़ी को "तटस्थ बुद्धिजीवी" का स्वांग रचने की धूर्तविद्या सिखाते हैं।
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औऱ फिर चाहते है कि वही राजनीतिक शख्सियतें आकर आपकी आवाज को वजन दें?? काहे भई?
एकतरफा चलता है क्या?
पोलटिकल पार्टी, पब्लिक के हाथ का टूल होती है। अगर आप मुद्दों पर अडिग है, तो फिर उस मुद्दे से मैच करने वाली पार्टी के साथ हो। दौर बदला, रीति नीति बदली, अब दूसरी कोई पार्टी उस सवाल पर आपके विचार से मैच कर रही है, तो पार्टी बदल दीजिये।
नागरिक का विचार अडिग रहना चाहिए।
पार्टी नही।
नागरिक की तटस्थता लोकतंत्र का जहर है। लेकिन यहाँ तो एक तरफ भक्त है, दूसरी तरफ कमबख्त हैं। भक्त रोज अपना स्टैंड बदलते है, मगर पार्टी नही।
दूसरी तरफ कमबख्त तटस्थ हैं, सुपरलेटिव डिग्री राजनीतिक बकलोल हैं। न उनके स्टैंड का पता, न राजनीतिक चॉइस का। सोनम भी उसी श्रेणी के हैं।
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आंदोलन, खुद एक पोलिटिकल एक्ट है। लेकिन जनता को बिना पॉलिटिक्स, बिना पॉलिटकल पार्टी को साथ लिए, पॉलिटकल एक्ट करना है..
तो करके भरजोर देख ले।
यह लड़ाई, लड़ने के पहले आपने किसी से कोई कोऑर्डिनेशन किया नही। जब अकेले लड़ने की आपकी चॉइस थी, तो बहुत बड़ा बड़प्पन था?? ठीक है।
तो अब मुंह काहे चियार रहे?? अकेले ही लड़िये। जितनी दूर तक जाये, जाने दीजिये। रील, लाइक्स, सोशल मीडिया पर दुर्गर्ष सपोर्ट तो मिल ही रहा है न।
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बहरहाल, सोनम की रिहाई के लिए कई पोस्ट की है। मेरी सहानुभूति है, उन्हें पसन्द करता हूँ। इसलिए उनकी चिंता भी है। उनके साथियों को उन्हें जूस वूस पिलाकर, झटपट बस में लादकर लद्दाख रवाना करना चाहिए।
जिंदगी रही साहब, तो फिर लड़ लेंगे।
कल बाड़मेर में कांग्रेस जिलाध्यक्ष श्री @LaxmanGodaraINC का पोस्टर ढका गया तो कांग्रेस के सच्चे सिपाहियों ने इसका विरोध किया। हमें पोस्टर ढकने से कोई दिक्कत नहीं है, सवाल यह है कि यह नफरत क्यों? क्या यह सामंती ताकतों की अंगुलियों का नृत्य था?
कल बाड़मेर में कांग्रेस जिलाध्यक्ष श्री @LaxmanGodaraINC का पोस्टर ढका गया तो कांग्रेस के सच्चे सिपाहियों ने इसका विरोध किया। हमें पोस्टर ढकने से कोई दिक्कत नहीं है, सवाल यह है कि यह नफरत क्यों? क्या यह सामंती ताकतों की अंगुलियों का नृत्य था?
India is an Old country but a young nation…I am young and I too have a dream, I dream of India Strong, Independent, Self-Reliant and in the front rank of the nations of the world, in the service of mankind.
~ Sh. Rajiv Gandhi
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