मैं तुमसे सिर्फ़ कलम और किताब चाहता हूँ,
ज़मीं पे बहते लहू का हिसाब चाहता हूँ।
मैं अब गुलाब नहीं, इंक़लाब चाहता हूँ।
आज नेता प्रतिपक्ष आदरणीय श्री @RahulGandhi जी सत्ता की आँखों में आँख डालकर वही सवाल पूछ रहे हैं, जो आज देश का हर युवा पूछ रहा है।
👉छात्रों पर पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया?
👉बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज का आदेश किसने दिया?
देश इन सवालों के जवाब का इंतज़ार कर रहा है।
#ChhatronKiGoonj
Seeds are more than an agricultural input. They are the foundation of India's food sovereignty.
As the Draft Seeds Bill redraws the rules of seed governance - the questions of farmer autonomy, corporate concentration, and food sovereignty, deserve far greater attention.
I write ✍️ @DeccanHerald
सिद्धारमैया जी का यह प्रसंग कांग्रेस संस्कृति का एक क्लासिक उदाहरण है - एक ऐसी परंपरा जिसे केवल समर्पित कांग्रेसी ही समझते और निभाते हैं।
इसकी झलक 1963 में कुमारस्वामी कामराज जी और 1998 में परसराम मदेरणा जी के आचरण में भी दिखी थी। @DivyaMaderna@arvindchotia
ऑक्सफोर्ड में दिव्या मदेरणा ने बाड़मेर के सदियों पुराने 'पट्टू' से बना कोट पहनकर पश्चिमी राजस्थान की समृद्ध हस्तकला को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई। यह सिर्फ एक फैशन स्टेटमेंट नहीं, बल्कि विलुप्त हो रही कलाओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। @DivyaMaderna
पश्चिमी राजस्थान धोरों की धरती से निकलकर जब मुझे University of Oxford के वैश्विक मंच पर अपनी बात रखने का अवसर मिला, तो मैंने तय किया कि मैं अपने साथ केवल शब्द नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की पहचान, अपनी विरासत और पश्चिमी राजस्थान की आत्मा भी लेकर जाऊँगी।
ऑक्सफोर्ड में पहनी गई मेरी यह पट्टू से बनी जैकेट केवल एक परिधान नहीं थी, बल्कि राजस्थान के उन बुनकरों के संघर्ष, धैर्य और शिल्प का प्रतीक थी, जो आज भी शुद्ध ऊन पर गांधीजी के चरखे की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। पट्टू की हर बुनाई में महीनों की मेहनत, लोक संस्कृति की गरिमा और राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा बसती है।
कभी हजारों परिवारों के जीवन का आधार रही यह कला आज मशीनों के दौर में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। एक समय था जब पश्चिमी राजस्थान के गाँवों में हजारों परिवार इस शिल्प से जुड़े थे, लेकिन आज मुश्किल से कुछ दर्जन कारीगर ही इस विरासत को बचाए हुए हैं।
मेरे लिए यह जैकेट उन हाथों का सम्मान थी, जिन्हें अक्सर कोई अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं मिलता। दुनिया राजनीति को अक्सर केवल सत्ता और भाषणों से जोड़कर देखती है, लेकिन मेरे लिए राजनीति का असली अर्थ उन लोगों को पहचान दिलाना है, जिनकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है।
अगर इस पट्टू जैकेट के माध्यम से रेगिस्तान के किसी बुनकर को गौरव महसूस हुआ हो, अगर किसी कारीगर को यह लगा हो कि उसकी मेहनत धोरों से निकलकर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँची है, तो यही मेरे इस सफर की सबसे बड़ी सार्थकता है।
एक धागा, एक सपना और महीनों की मेहनत… यही है धोरों की धरती का ‘पट्टू’।
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#HandloomOfIndia @BlavatnikSchool@UniofOxford