सितम भी सहना दुआ भी करना, ओ बेकसी का गया जमाना।
अगर है जुर्रत गिराओ बिजली, बना रहे हैं हम आशियाना,
किसी भी हालत में बागवानों, तुम्हारा एहसान हम न लेंगे
जो अपनी गैरत पर आँच आयी, तो फूँक देंगे हम आशियाना॥
राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन अगर किसी जनप्रतिनिधि की सुरक्षा को ही राजनीति का हथियार बना दिया जाए तो यह बेहद चिंताजनक है।
शिव विधायक श्री @RavindraBhati__ जी की सुरक्षा कम करना ओर अब pso को भी हटाना केवल एक व्यक्ति का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र में विपक्ष ओर हक की आवाज़ को दबाने जैसा संदेश देता है।
क्या राजस्थान सरकार और प्रशासन अब निष्पक्षता छोड़ राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं?
अगर किसी नेता की सुरक्षा उसकी विचारधारा या सरकार की आलोचना पर तय होने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
भजनलाल सरकार को राजनीतिक विरोध और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा व्यवस्था को अलग-अलग रखना चाहिए। मैं राज्य सरकार से मांग करता हूँ कि विधायक श्री रविन्द्र सिंह भाटी की सुरक्षा की निष्पक्ष समीक्षा कर उन्हें उचित सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
@BhajanlalBjp@RajCMO
जनता के हक और मजदूरों की आवाज़ के लिए भाटी ने जिस तरह खुद पर पेट्रोल छिड़ककर दुख जताया उसने पूरे बाड़मेर को झकझोर दिया 💔🥹 पहले मजदूर नहीं मरेगा उससे पहले मैं मर जाऊँग ऐसे शब्द केवल वही नेता बोल सकता है
जो जनता का दर्द अपने दिल में रखता हो
#मजदूर_आन्दोलन_जनसभा@RavindraBhati__
ये तस्वीर आम नहीं है सरकार के केबिनेट मंत्री के साथ ये निर्दलीय विधायक... राज्यसभा की खुशबू आ रही है। लेकिन युनुस खान और रविंद्र सिंह भाटी नहीं नजर आ रहे हैं ये खास बात है।
उत्तरप्रदेश कि प्रयागराज से एक दिल को सुकून देने वाला पल सामने आया है जहां एक गरीब माता पिता का बच्चे का सपना पूरा हुआ है।
इस बच्चे का इंडियन NAVY मै नौकरी लगा है इस खुशी मै बच्चे ने अपना मां बाप को टोपी पहनाया।
इनकी पूरी गांव ही इनको स्वागत करने वेट कर रहा था लेकिन...See more
रविंद्र सिंह भाटी ने तारीफें ही झेली हैं...
वे राजनीति में एक ताजा हवा के झोंके की तरह आए और पूरी तरह छा गए। सोशल मीडिया का जितना बड़ा लाभ रविंद्र सिंह भाटी ने उठाया, राजस्थान में शायद ही कोई दूसरा उठा पाया होगा। छात्र राजनीति से निकलकर सीधे विधानसभा में भी पहुंच गए और लोकसभा में पहुंचने से चूक गए। लेकिन प्रसिद्धि बढ़ती गई और लोगों का प्यार मिलता गया।
एक विशेष वर्ग को छोड़ दें तो उन्हें अधिकांश लोगों का प्यार ही ज्यादा मिला है। उनके ज्यादा नेगेटिव पक्ष थे भी नहीं और अगर थे भी तो इग्नोर किए गए। सकारात्मक पहलुओं को ज्यादा शिद्दत से उठाया गया। हर किसी ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया। कुल मिलाकर अभी तक रविंद्र सिंह ने "फूल्या-फूल्या ई चुग्या है"। कई बार ज्यादा या अतिरिक्त लाड-प्यार बच्चों को बिगाड़ भी देता है। हालांकि ऐसा नहीं कह सकते कि रविंद्र सिंह बिगड़ गए लेकिन आलोचनाओं से उनका वास्ता कम ही पड़ा।
छोटू सिंह रावणा वाला ताजा घटनाक्रम काफी कसैला और विषैला हो गया है। रविंद्र सिंह चाहते तो इस स्थिति से बचा जा सकता था। सोशल मीडिया पर हमारे जैसे लोग, जिनका कोई वजूद तक नहीं है, भी बेहिसाब आलोचनाएं और उल्टी सीधी संज्ञाएं प्रतिदिन झेलते हैं। लेकिन इससे आज तक व्यक्तिगत या सार्वजनिक जीवन में कोई फर्क तो पड़ते हुए मैंने नहीं देखा। मन हुआ तो किसी को प्यार से जवाब दे दिया और नहीं तो इग्नोर कर दिया।
आप नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी जैसे बड़े नेताओं की टाइमलाइन चेक कर लीजिए। उनकी पोस्ट पर आने वाले कमेंट कितने भद्दे और वाहियात होते हैं, देखने वालों तक को खिन्नता हो जाती है। लेकिन इसका मतलब यह थोड़ी है कि वे अपने काम धंधे छोड़कर किसी को धमकी देने निकल पड़ें। सवाल ही पैदा नहीं होता। आपके काफी समर्थक हैं जो आपके खिलाफ आने वाली किसी भी बात का काउंटर करने के लिए सदैव तैनात रहते हैं। ये धमकी वगैरह के काम उन्हें पर छोड़कर रखें तो ज्यादा उचित है। वे अपनी जिम्मेदारी संभाले रहेंगे। (मेरी इस पोस्ट पर भी आते ही होंगे)
एक तरीका है जो हमने आदरणीय ओम थानवी साहब से सीखा है। अगर कोई यूजर, जो इरादतन और लगातार गलत कमेंट कर रहा हो तो सिर्फ एक कमांड से उसे ब्लॉक कर दीजिए। अगली बार तो वह कमेंट करने आ ही नहीं सकता। ब्लॉक करना आपका व्यक्तिगत अधिकार है। खैर।
बहरहाल, सक्रिय राजनीति में रविंद्र सिंह भाटी करीब करीब ढाई साल बिता चुके हैं। सदैव तारीफ ही तारीफ नहीं मिलेंगी। यह भी तय है। लोग उल्टे-सीधे कमेंट भी कर देंगे और मौका मिलने पर सीधे मुंह पर बोलने से भी नहीं चूकेंगे। उन्हें पता है कि आप वोटों की राजनीति में हैं। सुनना ही पड़ेगा और सुनना ही पड़ता है।
इसलिए समय आ गया है कि अपने आप को पूरी तरह बदलाव के लिए तैयार करें। आलोचना सुनना, पढ़ना, पचाना और इग्नोर करना सीखिए। यह सही है कि अभी खून गरम है, गुस्सा जल्दी आता है लेकिन औरों को जीतने से पहले खुद को जीतना भी बहुत जरूरी है और खुद को जीतने की शुरुआत गुस्से पर जीत से होती है।
सदा न संग सहेलियां, सदा न राजा देस
सदा न जुग मै जीवणा, सदा न काळा केस...
@arvindchotia@RavindraBhati__
दोनों तस्वीरों पर गोर करके देखो..!!
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