चूरू विधायक श्री हरलाल जी सहारण को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। ईश्वर से आपके उत्तम स्वास्थ्य एवं सुदीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।
@harlal4churubjp
नर्मदा की गोद में मां का आखिरी आलिंगन
यह तसवीर देखकर मैं भीतर से सुबक पड़ा। क्योंकि यह तस्वीर केवल एक हादसे की तस्वीर नहीं है; यह मनुष्य की सभ्यता पर रखा हुआ वह नम, कांपता हुआ प्रश्न है, जिसका उत्तर कोई मुआवजा, कोई जांच-समिति और कोई सरकारी शोक-संदेश नहीं दे सकता।
जबलपुर के बरगी डैम में मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग का क्रूज अचानक तूफ़ान और तेज हवाओं के बीच पलट गया था। नौ लोगों की मौत हो चुकी है। कुछ बचाए गए और तलाश अब भी है। लेकिन इन संख्याओं के बीच जो सबसे बड़ा दर्द है, वह इस मां की बंद आंखों में साफ़ दिख रहा है।
एक मां, जिसने डूबती हुई नर्मदा में भी अपने बच्चे को खुद से अलग नहीं होने दिया। बेटा या बेटी कितनी भी दूर हो। माँ उसे कभी अलग नहीं होने देती। वह खाने की थाली सामने रखती है तो हजार कोस दूर बैठे बेटे या बेटी को याद करके ही पहला कौर मुंह की ओर बढ़ाती है। एक बार मैंने चूरू में बहुत ठंड के समय अरविंद चोटिया की माँ के फोन की बात सुनी थी। जयपुर में गरमी थी और चूरू में भयानक ठंड तो माँ ने चूरू से बेटे को ठंड से बचने की सलाह दी थी कि ओढ़ पहन के रखना। अभी मेरा बेटा अंडमान में था और दूसरा गुड़गांव में तो मैं जाने कब से देखता हूँ कि उनकी माँ अपने खाने की थाली से पहले उन्हें ज़रूर याद करती है। अब तो वह बेटी को भी याद करती है। आपके भी घर में ऐसा ही होगा। कई बार माँ चली जाती है तो वह बच्चों को कहते हैं कि आसमान से भी देखना नहीं भूलती।
आप देखिए इस तस्वीर को। पानी काला है। हवा की हिंसा अब शांत हो चुकी है। फूलों और कचरे के बीच जीवन की अंतिम थरथराहट जम गई है। मां के चेहरे पर मृत्यु का भय नहीं, एक अजीब-सी थकी हुई शांति है; जैसे उसने आखिरी क्षण तक अपने बेटे से कहा हो, “डरना मत, मैं हूं।” बच्चा मां की छाती से बहुत आत्मविश्वास से लगा हुआ है। जैसे उसे लगे कि अब वह एकदम सुरक्षित है। इसीलिए संवेदनशील सभ्यताएँ अपने देश को मातृभूमि और असभ्य मुल्क उसे पितृभूमि मानते हैं।
दुनिया की सारी सुरक्षा-व्यवस्थाएं, सारे प्रोटोकॉल, सारी लाइफ जैकेटें, सारे नियम उस छोटे-से शरीर के सामने विफल हैं। मां और उसके चार साल के बेटे के शव एक-दूसरे से लिपटे हैं। पिता और बेटी बच गए, मगर मां-बेटा लौटकर नहीं आए। यह तस्वीर हमें रुलाती ही नहीं, शर्मिंदा भी करती है। क्योंकि हर हादसा केवल मौसम से नहीं होता; कई हादसे लापरवाही, चेतावनी की अनदेखी, अधूरी तैयारी और पर्यटन को तमाशा समझ लेने से होते हैं।
अगर सचमुच लाइफ़ जैकेट देर से दी गईं, अगर चेतावनी अनसुनी हुई, अगर सुरक्षा प्रोटोकॉल काग़ज़ पर रह गए तो यह दुर्घटना नहीं, व्यवस्था की नैतिक डूब है।
नर्मदा ने कल की शाम एक मां और बेटे को नहीं छीना; उसने हमसे पूछा है : क्या हमारी यात्राएं सुरक्षित हैं? क्या हमारी सरकारें सजग हैं? क्या हमारी संवेदनाएं जीवित हैं? इस तस्वीर को देखते हुए आंखें इसलिए छलछला आती हैं कि मृत्यु में भी मां ने मातृत्व नहीं छोड़ा। वह चली गई; लेकिन अपने बच्चे को अंतिम क्षण तक सीने से लगाए रही। मानो कह रही हो, “मेरी सांस भले डूब जाए, मेरा प्यार नहीं डूबेगा!”
मैं इस माँ को प्रणाम करता हूँ।
सिंगल भी ले लो महाराज।
युवराज सिंह अभिषेक शर्मा को नेट प्रैक्टिस करवाते हुए। हर गेंद को चौके छक्के के लिए भेजना बचपन की आदत है।
#AbhishekSharma#INDvPAK
10 साल से उनकी झोपड़ी में कोई झांकने नहीं पहुंचा था, खबर का असर हुआ और सरकारी एंबुलेंस उनके घर तक पहुंच गई। उनका इलाज शुरू हो गया।
News Pinch के दोस्तों आपने कर दिखाया। बेड़ियां टूट गई।हमने अपनी रिपोर्ट में दिखाया था कि कैसे बालोतरा,राजस्थान में लोगों को बेड़ियों से बांध के रखा गया। ग़रीबी की वजह से परिवार उपचार नहीं करा पा रहा था।
ये आप दर्शकों के Pinch ताकत है,जिसने ज़िम्मेदारों को जगा दिया। मगर कुछ सवाल अभी बाकी हैं। बाकी लोगों का इलाज कब होगा? इसे शेयर कीजिए और अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल कीजिए
इसीलिए हम कहते हैं
ज़मीन पर टिकेंगे,फ़लक तक पूछेंगे
जब तलक नहीं बोलोगे,तब तलक पूछेंगे
जनरल क्लास से AC क्लास की दूसरी यूँ तो मात्र 500 मीटर की होती है,मगर बहुत साल लग जाते हैं इस सफ़र को पूरा करने में,कई दफे तो पीढ़ियाँ खप जाती हैं…
Magadh Express… चलअ बिहार देखे
ये हमारे चूरू के युवा हैं
गोगाजी के भक्त हैं। सांपों को हाथों में लिए हुए हैं। बेफिक्री ऐसी, जैसे खिलौने हाथ में हों। ऐसे नजारे आपको और कहीं देखने को शायद ही मिले।
यह आस्था है। पूर्ण आस्था।
इसमें तर्क नहीं चलते
कारगिल... हमारे दौर का युद्ध
कारगिल युद्ध को हमारी पीढ़ी ने होते हुए देखा था। सोशल मीडिया के आगमन से थोड़ा सा पहले हुए इस युद्ध की संयमित रिपोर्टिंग, युद्ध से उपजे गर्व और दर्द को हमने बेहद करीब से महसूस किया था। कारगिल से पहले हुए युद्धों में होने वाले शहीदों के शव घर नहीं आया करते थे लेकिन कारगिल युद्ध में हुए हर शहीद सैनिक का शव उसके घर तक पहुंचने की पुख्ता व्यवस्था की गई और इसी एक कदम ने देशवासियों को युद्ध की विभीषिका से बेहद करीब से रूबरू करवाया। मैं उन दिनों चूरू में रहा करता था और सबसे पहले शहादत देने वाले दो सैनिकों में से एक राजकुमार पूनिया जी हमारे चूरू जिले के राजगढ़ क्षेत्र के सपूत थे। इसके बाद युद्ध के दौरान ऐसा कोई दिन नहीं गया जब चूरू और हमारे पड़ोसी जिलों सीकर व झुंझुनूं में शहीदों की पार्थिव देह नहीं पहुंची हो। उस दौर में शहीदों की अंतिम यात्रा में जो जोश और गुस्सा उमड़ा करता था, वह देखने लायक था। अनेक यात्राओं को मैंने खुद करीब से देखा, कवर किया था। हमारे क्षेत्र में पीढ़ी दर पीढ़ी फ़ौज में जाने की परंपरा रही है। इन यात्राओं में अनेक पूर्व फौजी अपनी फौज की वर्दी और तमगे लगाकर शहीदों की अंतिम यात्रा में शामिल होते थे। शहीद को सैल्यूट करते और अपने दौर के किस्से भी सुनाते। लोग उनको घेर कर बैठ जाते और चौड़ी आंखों से उन किस्सों को सुनते। सबसे ज्यादा भावुक दृश्य हुआ करते थे जब सेना के अधिकारी वीरांगनाओं को शहादत की औपचारिक सूचना चिठ्ठी पढ़कर देते और परिवार को तिरंगा सौंपते। अनेक शहीदों के बहुत छोटे बच्चे जब मुखाग्नि देते तो कलेजा फट सा जाता था।
केंद्र में तब एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार थी और राजस्थान में कांग्रेस की अशोक गहलोत की सरकार थी। युद्ध के दौरान कोई राजनीतिक बयानबाजी हुई हो, याद नहीं आता। अंतिम विदाई के अनेक अवसरों पर मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को शामिल होते देखा था। ख़ैर!
जब देश की आन-बान पर बन आए तो युद्ध जरूरी हो जाते हैं। अन्यथा हमारे देश ने कभी किसी अन्य देश पर चलाकर कोई हमला तो किया ही नहीं। कारगिल युद्ध के लड़ाकों की कहानियां हमें सदैव प्रेरित करती रहेंगी।
कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से सादर नमन
#कारगिल_विजय_दिवस #कारगिलविजयदिवस #कारगिल
श्रवण का नीट में चयन खास है...
तस्वीर बाड़मेर के श्रवण के परिवार की है। नीट में श्रवण का चयन हुआ है। आने वाले समय में श्रवण डॉक्टर श्रवण के नाम से पहचाना जाएगा। हमेशा की तरह इस बार भी हजारों बच्चे डॉक्टर बनेंगे लेकिन श्रवण के यहां तक पहुंचने की कहानी अत्यंत प्रेरक है और हर किसी को हिम्मत देने वाली है। श्रवण के पिता ब्याह शादी में लोगों के घरों में जूठे बर्तन मांजने का काम करते हैं। खेती भी करते हैं। लेकिन इतने भर से परिवार को चलाना बड़ा मुश्किल काम होता है तो श्रवण भी मजदूरी के लिए चेजे/कमठे पर चला जाया करता था। आज पिता पुत्र का पसीना मोती बनकर उभरा है। आज फादर्स डे भी है। फिफ्टी विलेजर्स संस्था ने श्रवण की प्रतिभा की पहचान की और उसे आगे बढ़ाया।
श्रवण और उसके पूरे परिवार को बधाई। श्रवण उन सभी बच्चों के लिए प्रेरणा बनेंगे जो अभावों में जीते हुए आगे बढ़ाने से हिचकते हैं।
मेरे जन्मदिवस के शुभ अवसर पर आप सभी की ओर से प्राप्त शुभकामनाएं बधाई संदेश एवं आशीर्वाद से मैं अभिभूत हूं।
मैं आप सभी का दिल से आभार व्यक्त करता हूं और आशा करता हूं कि आपका स्नेह, सहयोग और आशीर्वाद हमेशा ऐसे ही बना रहेगा।
सादर धन्यवाद