अपनी सिक्योरिटी गार्ड की ड्यूटी खत्म करके घर लौटे बिरजू ने देखा उसकी मां बाहर दरवाजे पर खड़ी हुई उसकी राह देख रही थी
अंदर आकर हाथ मुंह धोकर दोनों ने भोजन किया तो मां ने उसे प्रसाद देते हुए कहा आज गली के मोड़ वाली सुमन भी वैष्णो देवी मंदिर दर्शन कर आई बस एक में ही हूं जो
श्री शुकदेव जी महाराज परीक्षित को संबोधित करते हुए कहते हैं— परीक्षित ! राम तत्व तक पहुँचने के लिए शत्रुघ्न जी महाराज लखनलाल जी और भरत भैया ये तीन सोपान हैं, इन तीनों को पार करने के बाद ही आनंद कंद भगवान श्री राम हमारे हृदय में प्रकट होंगे। रम कृड़ायाम धातु से राम शब्द बनता है। जो रमण करे, विहार करे वह श्री राम है। जो योगियों के हृदय में रमण करे या योगी जि��� राम तत्व में रमण करे वही राम हैं। रमन्ते योगिन: यास्मिन य; स; राम;। इतना उद्योग करने के बाद भगवान श्री राम जी हमारे हृदय को अवधपुरी बनाकर निवास करने लगेंगे।
रामजी कौन हैं? इनका स्वरूप कैसा है?
गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में;
जो आनंद सिंधु सुख राशि सीकर ते त्रैलोक सुपासी।
सो सुख धाम राम अस नामा अखिल लोक दायक विश्रामा ॥
भगवान श्री राम आनंद के सागर और सुख की राशि हैं, जिस (आनंदसिंधु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं उनका नाम 'राम' है, जो सुख का भवन और संपूर्ण लोकों को शांति देने वाला है।
है जग मे जिसक नाम अमर उस रघुबर का गुण गाता हूँ ।
रावण का हनन किया जिसने उस राम की कथा सुनाता हूँ।
दशरथ के घर जो जन्म लिया तोड़ा शिव धनुष स्व्यंवर मे
जब राज तिलक का दिन आया बनवास मिला अपने घर मे।
तब एक रो��� पंचवटी मे एक सोने का हिरण आया
जब राम चले उसके पीछे रावण सीता का हरण किया ॥
तब हनुमान पहुंचे लंका और किया भेट सीताजी से
देकर मुद्रिका रामजी की हर लिया शोक उनके मन से ॥
वहाँ मेघनाद ने जा पकड़ा और पूंछ मे आग लगा डाली
उस अग्नि से बजरंगबली सब लंका रख बना डाली ॥
हुई शुरू लड़ाई लंका मे रावण इस तरफ उधर रघुबर
हारा रावण जीते रघुवर हुई अमर कथा रामायण की॥
तुम राम बनो रावण न बनो बस इतना ही समझाता हूँ।
जय जय जय श्री सीता राम 🙏
श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं--
तस्या नु चरितं राजन ऋषिभि: तत्वदर्शिभि: ।
श्रुतं हि वर्णितं भूरि त्वया सीता पतेर्मुहु : ॥
परीक्षित ! सीतापति श्रीराम के चरित्र के बारे में तो तत्वदर्शी ऋषियों ने बहुत कुछ वर्णन किया ��ै और तुमने अनेक बार उसे सुना भी है। भगवान के समान प्रतापी और कोई नहीं है। उन्होंने देवताओं की प्रार्थना से ही यह लीला-विग्रह धरण किया था। रघुवंश शिरोमणि भगवान श्री राम के लिए यह कोई बड़े गौरव की बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों से रावण आदि राक्षसों को मार डाला या समुद्र पर पुल बांध दिया। उन्हें शत्रुओं को मारने के लिए वानर-भालुओं की मदद की भी जरूरत नहीं थी।
वे तो इनको श्रेय देना चाहते थे। सबको साथ लेकर चलना चाहते थे। सबका साथ और सबका विकास चाहते थे। यह सब उनकी लीला थी।
यस्यामलं नृपसदस्सु यशोधुनापि गायंत्यघघ्नमृषयो दिगिभेंद्र पट्टम।
तं नाकपाल वसुपालकिरीटजुष्ट पादांबुजं रघुपतिम शरणम प्रपद्ये ॥
भगवान श्रीराम का निर्मल यश समस्त पापों को नष्ट कर देने वाला है। वह इतना फैल गया है कि दिग्गजों का श्यामल शरीर भी उसकी उज्ज्वलता से चमक उठता है। आज भी बड़े-बड़े ऋषि महर्षि उनके निर्मल चरित्र का गुण-गान करते रहते हैं।
श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं, हे परीक्षित ! भगवान श्री रामजी आत्माराम जितेन्द्रिय पुरुषों के शिरोमणि थे। वे धर्म की मर्यादा का पालन करते हुए बहुत वर्षों तक प्रजा का पालन करते रहे।
पुरुषो राम चरितं श्रवणरूपधारयन।
आनृशंस्यपरो राजन कर्मबंधे:विमुच्यते ॥
जो व्यक्ति अपने कानों से भगवान श्री राम का चरित्र ध्यानपूर्वक सुनता है, उसे सरलता, कोमलता और माधुर्य आदि गुणों की प्राप्ति होती है। केवल इतना ही नहीं बल्कि वह समस्त कर्म बंधनों से मुक्त होकर बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।
आइए ! विनम्र भाव से आनंद कंद भगवान श्री राम की वंदना करें।
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परत���ं रामस्य दासोSस्म्यहम् ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥
जय जय जय श्री सीता राम 🙏
जय जय जय श्री सनातन धर्म। 🚩🚩🚩🚩
सुंदरकांड पढ़ते हुए 25वें दोहे पर थोड़ा रुक गया । तुलसीदास ने सुन्दर कांड में जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है |
"हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।"
अर्थात :- जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो --वे उनचासों पवन चलने लगे।हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश मार्ग से जाने लगे।
मैंने सोचा कि इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? यह तुलसी दास जी ने भी नहीं लिखा। फिर मैंने सुंदरकांड पूरा करने के बाद समय निकालकर 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी खोजी । तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।
यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वाय�� और समवायु, लेकिन ऐसा नहीं है।
जल के भीतर जो वायु है उसका शास्त्रों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।
ये 7 प्रकार हैं- 1. प्रवह, 2. आवह, 3. उद्वह, 4. संवह, 5. विवह, 6. परिवह और 7. परावह।
1. प्रवह :- पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणित हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।
2. आवह :- आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।
3. उद्वह :- वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।
4. संवह :- वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
5. विवह :- पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।
6.परिवह :- वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तश्र���्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।
7. परावह :- वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।
इन सातों वायु के सात-सात गण (संचालित करने वाले) हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं-
ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा। इस तरह 7x7=49, कुल 49 मर��त हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।
कितना अद्भुत ज्ञान!! हम अक्सर रामायण, भगवद् गीता पढ़ तो लेते हैं परंतु उनमें लिखी छोटी-छोटी बातों का गहन अध्ययन करने पर अनेक गूढ़ एवं ज्ञानवर्धक बातें ज्ञात होती हैं।
बजरंगबली महाराज की जय!! जय श्री सीताराम!!
सनातन धर्म ज्ञान🚩🚩🚩
गुप्तनवरात्रि शुभारंभ पर माँ के दिव्य अलौकिक दर्���न
गुप्त नवरात्रि की प्रमुख देवियां—-
मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी