तड़पता हूँ मैं लैल ओ नहार
लम्हा भर वो भी तड़पती होगी
दुआओं में वो भी ख़ुदा से
कोई फ़रियाद तो करती होगी
मेरे जितना ना करे ना सही
पर याद तो वो भी करती होगी
बहुत मशरूफ ही सही
वो अपनी उस दुनियाँ में फिर भी
तन्हाईयो के कुछ पल वो भी
मेरे लिए बर्बाद तो करती होगी..!!
~@Nawabehind ✍️🏻
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को हराने के लिए हुमायूँ कबीर बीजेपी से 1000 करोड़ की डील कर रहे है
हुमायूँ कबीर का असदूदीन ओबैसी से गठबंधन है दोनों 118 सीटों पर गठबंधन है अब दोनों की पोल खुल चुकी है
खैर 1000 करोड़ में ओबैसी को कितना मिलेगा ?
ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा
सुख़न कदा मेरी तर्ज़ ए सुख़न को तरसेगा,
नए पियाले सही तेरे दौर में साक़ी
ये दौर मेरी शराब ए कुहन को तरसेगा,
मुझे तो ख़ैर वतन छोड़ कर अमाँ न मिली
वतन भी मुझ से ग़रीब उल वतन को तरसेगा...
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मुमकिन नहीं मता ए सुख़न मुझ से छीन ले
गो बाग़बाँ ये कुंज ए चमन मुझ से छीन ले,
गर एहतिराम ए रस्म ए वफ़ा है तो ऐ ख़ुदा
ये एहतिराम ए रस्म ए कोहन मुझ से छीन ले,
मंज़र दिल ओ निगाह के जब हो गए उदास
ये बे फ़ज़ा इलाक़ा ए तन मुझ से छीन ले...
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फूल ख़ुश्बू से जुदा है अब के
यारो ये कैसी हवा है अब के ?
दोस्त बिछड़े हैं कई बार मगर
ये नया दाग़ खुला है अब के,
पत्तियाँ रोती हैं सर पीटती हैं
क़त्ल ए गुल आम हुआ है अब के,
शफ़क़ी हो गई दीवार ए ख़याल
किस क़दर ख़ून बहा है अब के...
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पत्थर का वो शहर भी क्या था
शहर के नीचे शहर बसा था,
पेड़ भी पत्थर फूल भी पत्थर
पत्ता पत्ता पत्थर का था,
चाँद भी पत्थर झील भी पत्थर
पानी भी पत्थर लगता था,
लोग भी सारे पत्थर के थे
रंग भी उन का पत्थर सा था...
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सुनाता है कोई भोली कहानी
महकते मीठे दरियाओं का पानी,
यहाँ जंगल थे आबादी से पहले
सुना है मैं ने लोगों की ज़बानी,
यहाँ एक शहर था शहर ए निगाराँ
न छोड़ी वक़्त ने इस की निशानी,
मैं वो दिल हूँ दबिस्तान ए अलम का
जिसे रोएगी बरसों शादमानी...
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सब पुराने ख़याल बदलो यार
वक़्त बदला है साल बदलो यार,
मात हर बार थोड़ी खाऊँगा
वक़्त के साथ चाल बदलो यार,
एक थप्पड़ अभी लगेगा और
इस लिए अपना गाल बदलो यार...
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कोशिशें कर लो मैं बादल नहीं होने वाला
बरसों बे वज्ह यूँ पागल नहीं होने वाला,
शर्त ये है कि हमारे ही तरह हो जाओ
यार सोना हूँ मैं पीतल नहीं होने वाला...
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साज़ ए हस्ती की सदा ग़ौर से सुन
क्यूँ है ये शोर बपा ग़ौर से सुन,
दिन के हंगामों को बे कार न जान
शब के पर्दों में है क्या ग़ौर से सुन,
चढ़ते सूरज की अदा को पहचान
डूबते दिन की निदा ग़ौर से सुन,
क्यूँ ठहर जाते हैं दरिया सर ए शाम...
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ख़्वाब में रात हम ने क्या देखा
आँख खुलते ही चाँद सा देखा,
कियारियाँ धूल से अटी पाईं
आशियाना जला हुआ देखा,
फ़ाख़्ता सर निगूँ बबूलों में
फूल को फूल से जुदा देखा,
उस ने मंज़िल पे ला के छोड़ दिया
उम्र भर जिस का रास्ता देखा...
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बने बनाए हुए रास्तों पे जा निकले
ये हमसफ़र मेरे कितने गुरेज़ पा निकले,
चले थे और किसी रास्ते की धुन में मगर
हम इत्तिफ़ाक़ से तेरी गली में आ निकले,
ग़म ए फ़िराक़ में कुछ देर रो ही लेने दो
बुख़ार कुछ तो दिल ए बे क़रार का निकले...
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नसीब ए इश्क़ दिल ए बे क़रार भी तो नहीं
बहुत दिनों से तेरा इंतिज़ार भी तो नहीं,
तलाफ़ी ए सितम ए रोज़गार कौन करे ?
तू हम सुख़न भी नहीं राज़ दार भी तो नहीं,
ज़माना पुर्सिश ए ग़म भी करे तो क्या हासिल
कि तेरा ग़म ग़म ए लैल ओ निहार भी तो नहीं...
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तेरी निगाह के जादू बिखरते जाते हैं
जो ज़ख़्म दिल को मिले थे वो भरते जाते हैं,
तेरे बग़ैर वो दिन भी गुज़र गए आख़िर
तेरे बग़ैर ये दिन भी गुज़रते जाते हैं,
लिए चलो मुझे दरिया ए शौक़ की मौजो
कि हमसफ़र तो मेरे पार उतरते जाते हैं...
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दफ़अ’तन दिल में किसी याद ने ली अंगड़ाई
इस ख़राबे में ये दीवार कहाँ से आई ?
आज खुलने ही को था दर्द ए मोहब्बत का भरम
वो तो कहिए कि अचानक ही तेरी याद आई,
बस यूँ ही दिल को तवक़्क़ो सी है तुझ से वर्ना
जानता हूँ कि मुक़द्दर है मेरा तन्हाई...
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