अंजना जी, TRP की मंडी' में बैठकर 'शिक्षा के मंदिर' पर उंगली उठाना बहुत आसान है।
जिन बच्चों की गाढ़ी कमाई लूटने का आप आरोप लगा रही हैं, उन्हीं बच्चों के हक़ के लिए जब शिक्षक सड़कों पर लाठियां खाते हैं, तब आपका 'निष्पक्ष' कैमरा AC स्टूडियो से बाहर क्यों नहीं निकलता?
जब ट्विटर पर हमारे बच्चे महीनों तक ट्रेंड चलाते हैं, तब आपके प्राइम टाइम में क्या चल रहा होता है, ये पूरा देश जानता है।
अगर सच में आपको इन बच्चों की फिक्र है, तो इनकी असली आवाज़ बनिए। अपने शो में बेबाकी से दिखाइए कि SSC GD से लेकर UP SI के एग्जाम्स में धांधली और अव्यवस्था के नाम पर सिस्टम इनके साथ क्या खेल कर रहा है। जिस दिन आप इन मिडिल क्लास छात्रों का असली दर्द देश के सामने रखेंगी, यकीन मानिए मैडम, उस रात आपको बहुत सुकून की नींद आएगी और ऊपर वाला भी आपके इस काम को देखकर खुश होगा। गालियां देने से बेहतर है, इनका सच दिखाइए।
सिर्फ कोचिंग माफिया पे नकेल कसने की बात कर रही है, देश के करोडो लोगों को झूठ और नफ़रत बांटने वाले चैनल पे भी नकेल कस जाए तो कोचिंग माफिया वाली बात भी लोगों को जायज लगने लगे.. जिन्हे आप मासूम बच्चा कह रही है, वो आपसे ज्यादा समझदार है.. ऐसे ही मुखर हो कर पेपर लीक माफिया और शिक्षा मंत्री पे भी बातें करें तो आपलोगो की क्रेडिबिलिटी भी बनी रहेगी
>आपने उन मासूम बच्चों के कितनी बार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा?
>कितनी बार आपने सरकार से सवाल किया?
>कितनी बार NTA को रद्द करने की मांग की?
>कितनी बार आप में सड़क में आंदोलन करने वालों का सपोर्ट किया?
जो आप का काम है वो करो,
>मेलोडी का टेस्ट बताओ
>झालमुडी में मिर्ची बताओ
>पूछो, आम काट कर खाते हो या चूसकर
>आप थकते क्यों नहीं ये पूछो
>आपको जनता इतना प्यार क्यों देती है ये पूछो
जिसने वर्षों तक पत्रकारिता को TRP, प्रोपेगेंडा और सत्ता के पक्ष-विपक्ष की लड़ाई में बदल दिया हो, उसे शिक्षकों को 'धंधेबाज' कहने से पहले आत्ममंथन करना चाहिए।
शिक्षा में गलत लोग भी हैं।
लेकिन पत्रकारिता में भी हैं।
राजनीति में भी हैं।
व्यापार में भी हैं।
तो क्या कुछ गलत लोगों के कारण पूरे शिक्षक समाज को "दो कौड़ी का" कह दिया जाएगा?
anjana शिक्षक का सम्मान कमाने में वर्षों लगते हैं।
भर्तियाँ अटक रही थीं,
लाखों युवाओं की उम्र निकल रही थी,
तब आपके स्टूडियो की आवाज़ कहाँ थी?
शिक्षकों ने पैसे लेकर शिक्षा दी है।
लेकिन पैसे लेकर किसी राजनीतिक दल का प्रवक्ता बन जाना,
व्यवस्था की हर गलती पर पर्दा डालना,
और जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाना...
यह सिर्फ पत्रकारिता का पतन नहीं,
बल्कि अपने पेशे के साथ गद्दारी है।
शिक्षक फीस लेकर ज्ञान देता है,
मेहनत करवाता है,
बच्चे का भविष्य बनाता है
शिक्षकों ने पैसे लेकर पढ़ाया है,
देश के लाखों युवाओं को रोजगार तक पहुँचाया है।
लेकिन गलत को सही और सही को गलत साबित करने की कीमत लेकर काम करना,
समाज और लोकतंत्र दोनों के साथ विश्वासघात किसने किया ?