शब्दों की सीमा छोटी है,
और मेरा प्रेम अनंत।
मैं कैसे कागज़ पर लिख दूं,
जिसका कभी न होना अंत?
प्रेम कोई भाषा नहीं,
यह तो धड़कन की लय है,
जिसकी कोई परिभाषा नहीं।
जो बंध जाए अक्षरों के दायरे में,
वह भला कैसा प्रेम?
तुम अनंत हो, मैं शून्य हूँ,
शब्दों से परे ही हमारा संसार है।
–नेहा
तुम्हारी एक स्मित की आकांक्षा में,
न जाने कितनी ही संध्याओं का,
मैंने श्रृंगार किया है।
मेरे इस अनुराग और प्रतीक्षा की साक्षी,
केवल ये चूड़ियां हैं।
–नेहा
अशक्त काया पर भी माँ का, वत्सल भाव है अपार,
हे जननी! तुम ही तो हो, त्याग का साक्षात् आधार।
निज लाल का संबल बनती, सहकर पीड़ा अपरंपार,
बैसाखियों के सहारे, सहती जीवन का कठिन प्रहार।
–नेहा