मंदिर डकैती में पकड़े गए 8 में से 6 कर्मचारी वाराणसी की एक फर्म के हैं।
इस सिक्योरिटी एजेंसी के डायरेक्टर गौरव सिंह हैं।
गौरव सिंह भाजपा विधायक त्रिभुवन राम के प्रतिनिधि हैं।
मीडिया के मुताबिक, त्रिभुवन राम को नरेंद्र मोदी का करीबी समझा जाता है।
इससे यह सिद्ध होता है कि राम मंदिर लुट जाने के लिए पंडित नेहरू जिम्मेदार हैं।
@BhanChourasiya कट्टर वैदिक ब्राह्मण @5hu8h__ जी ने चैलेंज स्वीकार कर लिया है, बताइए कहां मिलना है? घनघटा, मगहर, खलीलाबाद, मेहदावल, बखिरा, नंदौर, सेमरियावां, हैंसर बाज़ार?
@Baijnat84801962@pitamaha_b52862 गौतम बुद्ध भांटा मुरई वाले बछड़े का ताज़ा गोबर खाकर हरितिकी मिला गाय का पेशाब पीते थे ऐसा पवित्र बौद्ध धर्म ग्रन्थ त्रिपिटक में लिखा है
भगवत गीता बौद्ध ग्रंथ है और कृष्णा वास्तव में कुषाण सम्राट कनिष्क हैं भगवत गीता का लेखन सम्राट कनिष्क के राजनीतिक सलाहकार रहे बौद्ध भिक्षु माजेरा ने किया था
@Baijnat84801962 भगवत गीता अगर बौद्ध ग्रन्थ है तो फिर बुद्ध और मनु एक ही आदमी के दो नाम हैं क्योंकि बाबा साहब आंबेडकर भगवत गीता को मनुस्मृति 2 कहते हैं।
पिछले 12 साल में मुसलमान तो सिर्फ शुरुआती 5-6 साल ही पीड़ित रहा, जब तक गुजरातियों के सत्ता में पांव नहीं जमे थे.
अब तो मुसलमान आराम में है और भाजपा को वोट देने वाले हिंदुओं का रोज-रोज का रंडी रोना देखकर मजा ले रहा है.
हत्या के नामजद आरोपी पुलिस अधिकारी को पुरस्कृत कर दिया सम्राट सरकार ने ?
जवईनिया गाँव के गरीब विस्थापितों की लड़ाई लड़ने वाले , भोजपुर प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने की बात करने वाले युवक भरत तिवारी की फर्जी पुलिसिया मुठभेड़ में की गयी हत्या के मामले में नामजद आरोपी पुलिस अधिकारी को नयी जिम्मेदारी सौंपा जाना, पुरस्कृत किए जाने के समान है .. सम्राट सरकार के इस हैरान कर देने वाले फैसले से ही भरत तिवारी के परिजनों व् ग्रामीणों के द्वारा लगाया गया ये आरोप साबित होता दिखता है कि फर्जी मुठभेड़ को सत्ता शीर्ष , पुलिस उच्चाधिकारियों व् स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की सहमति प्राप्त थी ..
बिहार के मुख्यमंत्री , बिहार सरकार व् बिहार के डीजीपी से बिहार की जनता के साथ - साथ मेरा ये सीधा सवाल है कि :
मृतक के परिजनों के द्वारा दर्ज करायी गयी एफआईआर ( प्राथमिकी) में लगभग आधा दर्जन पुकिसकर्मियों को नामजद आरोपी बनाए जाने के बावजूद उनमें से अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई है ?
नामजद आरोपियों से अब तक कोई पूछताछ क्यों नहीं की गयी है ?
मामले की जाँच की गति इतनी धीमी क्यों है और जाँच की प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जा रही है ?
क्या आरोपी पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार नहीं किए जाने , धीमी व् ढुलमुल जाँच का मकसद फर्जी मुठभेड़ का आदेश देने वाले 'किसी बड़े नाम' को बचाना है ?
और
पूर्व में भी मेरे और मृतक के परिजनों के द्वारा उठाया गया अहम सवाल यथावत है कि " मृतक का मोबाइल फोन कहाँ है .. लगभग एक पखवारा बीत जाने के बाद भी पुलिस के द्वारा मोबाइल फोन अब तक परिजनों को क्यों नहीं सौंपा गया है ?" ..
एनकाउंटर सबको पसंद है, बस शर्त इतनी है कि आरोपी अपनी जाति का नहीं होना चाहिए। यही सबसे बड़ा दोहरापन है।
अगर एनकाउंटर गलत है, तो हर हाल में गलत है—चाहे आरोपी किसी भी जाति, धर्म या समुदाय का हो। उसे सज़ा देने का अधिकार कोर्ट, कानून और न्यायपालिका का है।
और अगर एनकाउंटर सही मानते हैं, तो फिर यह सिद्धांत भी सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए। जाति देखकर न्याय का पैमाना बदलना संविधान नहीं, भीड़तंत्र है।
यूपी-बिहार के यादव समाज ने लंबे समय से फ़र्ज़ी एनकाउंटरों का विरोध किया है। समाजवादी विचारधारा कानून के राज, संविधान और न्यायपालिका में विश्वास करती है, न कि बिना न्यायिक प्रक्रिया के हत्या में।
इसलिए हमारा विरोध किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि संविधान और न्याय की रक्षा के लिए है।