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अब आर-पार की लड़ाई तय है।
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आज पत्रकारिता के "महानायक" जोसेफ़ पुलित्ज़र का भी जन्मदिन है :
पत्रकारिता में पुलित्ज़र पुरस्कार पूरी दुनिया में सबसे बड़ा है; लेकिन ये पढ़ लेंगे तो लगेगा कि ये कौनसा कलंक माथे पर लग गया ...
आज पत्रकारिता के मसीहा माने वाले जोसेफ़ पुलित्ज़र (10 अप्रैल, 1847 – 29 अक्टूबर, 1911) का भी जन्मदिन है। सच में तो वे एक नेता और बिज़नेसमैन थे। हंगेरियन-अमेरिकन, जो 'सेंट लुइस पोस्ट-डिस्पैच' तथा 'न्यूयॉर्क वर्ल्ड' समाचार पत्रों के प्रकाशक। वे अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी में एक प्रमुख राष्ट्रीय हस्ती बन गए थे और न्यूयॉर्क में बहुत सक्रिय थे। आजकल से नहीं, पिछली एक सदी से भी अधिक समय से पत्रकारिता में उनके नाम से दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जाता है; लेकिन वे कोई अच्छे और मर्यादा वाले व्यक्ति नहीं थे। वे बहुत कुछ मामलों में तो ट्रंप जैसे नेता से भी दो क़दम आगे थे।
जोसेफ़ पुलित्ज़र की बहुत सारी समस्याएँ हैं। पुलित्ज़र एक ही समय में जन-पक्षधर, भ्रष्टाचार-विरोधी और आधुनिक जन-पत्रकारिता के निर्माता भी थे और सनसनी, प्रसार-युद्ध और पीत पत्रकारिता के बड़े प्रतीक भी। यह द्वंद्व उन्हें दिलचस्प भी बनाता है; लेकिन साथ ही संदिग्ध भी।
दुनिया में पीत पत्रकारिता करने वाले सबसे बदनाम लोगों में भी वे एक थे। पुलित्जर के "न्यूयॉर्क वर्ल्ड" और हर्स्ट के "न्यूयॉर्क जर्नल" के बीच 1890 के दशक में जो प्रसार-युद्ध चला, उसी को “येलो जर्नलिज़्म” की केंद्रीय मिसाल माना जाता है। इस शैली में सनसनी, भारी-भरकम घटिया शीर्षक, अपराध, स्कैंडल, चित्र, भावनात्मक उत्तेजना और कभी-कभी अपुष्ट या झूठी बातें भी शामिल थीं। अमेरिकी विदेश विभाग के इतिहासकार भी मानते हैं कि दोनों समाचार पत्रों ने क्यूबा की घटनाओं को कई बार बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और कुछ उत्तेजक कथाएँ तो एकदम झूठी साबित हुई थीं।
पुलित्जर ने अपने अख़बारों ("न्यूयॉर्क वर्ल्ड" और "सेंट लुइस पोस्ट-डिस्पैच") में सनसनीखेज़ ख़बरें, स्कैंडल, हत्याएं, सेक्स और भय फैलाने वाली रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया। यह शैली "येलो जर्नलिज्म" के नाम से जानी गई, जिसमें तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जाता था, अतिरंजना की जाती थी या कभी-कभी पूरी तरह से गढ़ी हुई ख़बरें छापी जाती थीं। सिर्फ़ पाठकों की संख्या बढ़ाने और प्रतिद्वंद्वी विलियम रैंडोल्फ हियरस्ट के न्यूयॉर्क जर्नल से आगे निकलने के लिए। 1895-1898 के बीच दोनों अख़बारों की सर्कुलेशन वॉर ने स्पेनिश-अमेरिकन युद्ध को भड़काने में बड़ी भूमिका निभाई। उस समय अमेरिका स्पेन के ख़िलाफ़ पुलित्ज़र के फैलाए झूठों के कारण ही युद्ध में कूदा। यह पत्रकारिता के सबसे शर्मनाक़ कारनामों में से एक है।
लेकिन जब पुलित्ज़र को घर में ही बहुत शर्मसार होना पड़ा तो वे भ्रष्टाचार विरोध की ओर लौटे और अपनी छवि सुधारने लगे।
पुलित्ज़र इतना गंदा आदमी था कि वह अपने अख़बार के पत्रकारों के प्रति बहुत क्रूर, निष्ठुर और हृदयहीन था। वह छोटी-छोटी बातों पर गाली-गलौज करने लगता था। उसकी गालियाँ भी बहुत गंदी होती थीं कि एक बार एक साथ कई संपादक और रिपोर्टर बेहतर सैलरी के बजाय कम सैलेरी में बेहतर व्यवहार के लिए हियरस्ट के पास चले गए थे। वे इतना क्रूर थे कि कई बार तो स्टाफ़ के लोगों को लंच के लिए या वॉशरूम तक नहीं जाने देते थे। वे इतने हिंसक थे कि एक बार विवाद होने पर उन्होंने एक कैप्टेन एडवर्ड ऑगस्टाइन को गोली मार दी थी। वे अपनी इन आदतों के चलते अंधे हो गए थे और अवसाद के भी शिकार हुए।
पुलित्ज़र की पत्रकारिता और कामकाज का तरीका बताता है कि वे "पत्रकारिता के चैंपियन" से ज्यादा "गंदी, झूठी, जन विरोधी और स्वार्थों से वशीभूत सनसनीखेज पत्रकारिता के जनक" थे। उनके यहाँ तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जाता था और कभी-कभी तो पूरी तरह गढ़ी हुई खबरें छापी जाती थीं। वे एक तरह से झूठ और गंदी पत्रकारिता की फै़क्टरी थे। हालांकि बाद में उन्होंने कुछ सुधार किए; लेकिन येलो जर्नलिज़्म और उनके व्यक्तिगत व्यवहार को आज भी उनकी सबसे बड़ी कमियों में गिना जाता है। घोटाले उजागर करने, सामाजिक बुराइयों पर मुहिम चलाने और जन-उन्मुख रिपोर्टिंग करने लगे। लेकिन यह शर्म से उबरने की ही मुहिम थी।
पुलित्ज़र जीते जी तो बहुत ही बदनाम रहे; लेकिन जैसा कि हुआ ही करता है, जिस शख़्स के जीवन में बदनामी और सन्नाटों की गर्द तह बह तह जमती चली जाती है और जिसे कोई इज़्ज़त से नहीं देखता, वह पैसा छोड़ जाए और अच्छी वसीयत लिख दे तो क्या नहीं हो सकता! पुलित्ज़र ने यही किया। गंदे कामों से भरपूर धन कमाया और वसीयत के धन से अपनी छवि मरने के बाद ऐसी बना ली कि वे पत्रकारिता के मयार बन गए। पुलित्ज़र मरे तो 1911 में; लेकिन उन्होंने 1904 की वसीयत में कोलंबिया विश्वविद्यालय के लिए धन छोड़ा ताकि पत्रकारिता विद्यालय बने, छात्रवृत्तियाँ दी जाएँ और उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कार स्थापित हों।
और कोलंबिया स्कूल ऑव जर्नलिज़्म 1912 में खुला और पहले पुलित्ज़र पुरस्कार 1917 में दिए गए। यानी यह पुरस्कार बाद की किसी सांस्कृतिक श्रद्धांजलि से नहीं, उनके अपने दान और संस्थागत डिज़ाइन से निकला। और इस पुरस्कार ने न केवल पुलित्ज़र, अपितु अमेरिकी पत्रकारिता को भी केवल पीत पत्रकारिता के प्रतीक के रूप में नहीं, आधुनिक मास-सर्कुलेशन न्यूज़पेपर, इन्वेस्टिगेटिव क्रूसेडिंग, पब्लिक सर्विस जर्नलिज़्म और जर्नलिज़्म एजुकेशन के निर्माता के रूप में भी स्थापित किया।
और इस तरह एक गंदे पूंजीपति के पैसे ने समय के साथ इतिहासकारों की नज़र में उनकी पीत-पत्रकारिता वाली गिरावट को उनके सार्वजनिक-हितकारी योगदानों से छोटा ही नहीं किया, उसे लगभग भुला सा दिया गया और आज पुलित्ज़र भारतीय पत्रकारों सहित पूरी दुनिया के लिए एक मयार बन गए हैं, जबकि हमारे पास मौलवी मोहम्मद बाकिर (1780-1857) जैसा पत्रकार था, जिन्हें अंगरेज़ों ने तोप से उड़ा दिया था। वे भारत के पहले शहीद पत्रकार थे। उन जैसी सज़ा किसी पत्रकार को नहीं मिली। उन जैसा सेनानी और कलम का धनी पत्रकार कोई नहीं हुआ।
मोहम्मद बाकिर (1780-1857) ने दिल्ली से "देहली उर्दू अखबार" निकाला, जो 1857 की क्रांति से पहले का प्रमुख उर्दू समाचार-पत्र था। इसमें उन्होंने अंगरेज़ों के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बेबाक लेख लिखे, जनता को जागरूक किया और विद्रोह की भावना भड़काई। 1857 की क्रांति के दौरान अंगरेज़ों ने दिल्ली पर दोबारा कब्जा किया तो उन्होंने अख़बार में निडर होकर लेख लिखे। 14 सितंबर 1857 को उन्हें गिरफ़्तार किया गया। 16 सितंबर 1857 को दिल्ली गेट यानी खूनी दरवाजा के सामने बिना किसी मुकदमे के कैप्टन विलियम हडसन के आदेश पर तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया गया। उस समय उनकी उम्र 77 साल थी। तो कहाँ पुलित्ज़र और कहाँ मौलवी मोहम्मद बाकिर! बस पुलित्ज़र के नाम में जो ज़र लफ़्ज़ है, सारा कमाल तो उसका है। मुझे लगता है कि पत्रकारों को मौलवी मुहम्मद बाकिर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू करना चाहिए और वह राशि और ग्रैविटी के अनुसार पुलित्ज़र से बड़ा होना चाहिए।
शिकागो ट्रिब्यून के कर्नल मैककॉर्मिक ने पुलित्जर पुरस्कार को “म्युचुअल ऐडमायरेशन सोसाइटी” कहकर लंबे समय तक तुच्छ माना था और 1961 तक प्रतिस्पर्धा से दूर रखा। जोसेफ पुलित्ज़र न तो मौलवी मोहम्मद बाकिर जैसे महानायक पत्रकार थे और न ही उन जैसे शहीद। वे घनघोर न सही, लेकिन एक ऐसे खलनायक थे, जो अमेरिकन समाज के बाज़ारू सनसनी वाले पैरामीटर्स में फिट थे। वे भ्रष्टाचार से लड़े, लेकिन इसलिए नहीं कि ये उनके मूल्यों में था। ये बदनामी से बचने की कोशिश थी। उन्होंने आज की तरह प्रसार के लिए उत्तेजना भी बेची और बदकारी से मुंह काला होने लगा तो प्रेस की स्वतंत्रता के लिए जोखिम उठाना शुरू किया। पीत पत्रकारिता ने उनकी कुख्याति को चर्चित किया तो वे साहस और सार्वजनिक सेवा की तरफ मुड़े।
यह कैसी विडंबना है कि देश की आज़ादी के लिए और पत्रकारिता के सर्वोच्च आदर्शों के लिए तोप से उड़ा दिए जाने वाला पत्रकार कभी याद भी नहीं किया जाता और पीत पत्रकारिता का पहला सबसे बड़ा सरगना के नाम पर पुरस्कार ढलता है दुनिया का सबसे बड़ा। कभी-कभी सचमुच लगता है, मानो इतिहास ऐसे लोगों के नाम पर भी सदाचार के पदक ढाल देता है, जिनके अपने हाथ, पांव और दिलोदिमाग़ तक बिलकुल निष्कलंक नहीं थे। फ़र्क़ बस इतना है कि पुलित्जर के मामले में अमेरिकी पत्रकारिता ने उनके पापों को छिपा दिया और उन्हें पब्लिक सर्विस, एंटी करप्शन रिपोर्टिंग और जर्नलिस्टिक एजुकेशन के मसीहा की आधिकारिक स्मृति बना दिया। (पहले तीन चित्र पुलित्ज़र के और अंतिम मौलवी मुहम्मद बाकिर का)
@PulitzerPrizes@pulitzercenter@pulitzerarts #IndianJournalism #MoulviMuhammadBaqir
@NCIBHQ जितने भी थार वाले है:-
1. ज्यादातर गुंडे - मवाली
2. काले शीशे
3. पीछे के नंबर प्लेट गायब
4. मोडिफाइड/गैरकानूनी- लाइट और हॉर्न
4. ज़्यादातर ड्राइवर की लम्बी दाढ़ी (गुंडे टाइप)
अगर पुलिस हर दिन सिर्फ थार और स्कॉर्पियो की चेकिंग करे तो कम से कम सड़क से क्राइम खत्म हो जाएगा।
#शर्मनाक 😡
शायद इसीलिए हमारे देश में थार के ड्राइविंग सीट पर बैठने वाले अधिकतर व्यक्ति जिम्मेदार ड्राइवर कम नशेड़ी ज्यादा माने जाते हैं। जितनी तगड़ी गाड़ी उतना ही तगड़ा नशा।
मणिपुर में फिर से हिंसा भड़क उठी जिसमें बड़ी संख्या में जान माल का नुकसान हुआ. केंद्र की सरकार सख्त और जरूरी कदम उठाके मणिपुर में शांति बहाल करे.साथ ही जिस कारण से यह जातीय नफरत फैली है उसका हल निकाल कर कुकी और मैतीय समुदाय में आपसी भाईचारा स्थापित करें.@narendramodi
हम केजरीवाल के सिपाही हैं। निडरता पहली पहचान है हमारी।
कोई मोदी से डर जाए तो लड़ेगा क्या देश के लिए?
संसद में थोड़ा सा समय मिलता है बोलने का पार्टी को, उसमें या तो देश बचाने का संघर्ष कर सकते हैं या एयरपोर्ट कैंटीन में समोसे सस्ते करवाने का।
गुजरात में हमारे सैंकड़ों कार्यकर्ता बीजेपी की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिए, क्या सांसद साहब सदन में कुछ बोले?
पश्चिम बंगाल में वोट का अधिकार छीना जा रहा है। सदन में प्रस्ताव आया CEC के खिलाफ तो भाई साहब ने साइन करने से मना कर दिया।
पार्टी ने सदन से वाकआउट किया तो मोदी जी की हाज़िरी लगाने के लिए बैठे रहते हैं।
पिछले कुछ सालों से तुम डर गए हो राघव। मोदी के खिलाफ बोलने से घबराते हो। देश के असली मुद्दों पर बोलने से घबराते हो।
जो डर गया वो…..