Hear some of PM Modi's posts have been restricted or shadow banned by DS run SM platforms. The DS international assets are also out in the open. Their preparation for putting India into anarchy seems heavy. Common sense says they won't give up easily.
They may definitely try again to get people back to streets by Aug 15th.
I think that was their original plan. Before India poured cold water on it. They had planned to overrun some of India's institutions on Aug 15th using their criminal and radical elements. To make it an international spectacle and brand it as Gen-Z revolution seeking removal of PM Modi.
We see social media again being used to instigate people by spewing hate and fake news against the GoI and its various ministries using their assets. They are instigating the youth again saying Govt isn't doing what it promised etc. If they try again, Indians have to ensure they fail forever.
Be careful about believing any kind of fake reports they plant using their assets in foreign govts and international media to hit the GoI or PM directly. I got a good hunch that's their plan. Because as long as PM Modi enjoys public's great support, they can never win in India.
The DS's next step will be to target and try taint the PM directly now that their first target has resigned. Even if it's not done now, they will do it one day eventually by 2028.
कौन आवाज उठाएगा?
बिहार में एक महिला नेता की गाड़ी से 2 लड़की को ठोक दिया गया। मरने छोड़कर वो भाग गए! दोनों लड़की की मौत हो गयी!
चूँकि दिल्ली से बहुत दूर है यह,कोई नहीं इस मुद्दे को उठाएगा!
@giveme_hellyeah@RaviSharmaTalks Acceptance is the key.... First of all Indian people need to accept thr is a problem with thr state 99% Indian becomes aggressive whenever someone told thm above facts... Rest of country hate India kuch to reason hoga.... Itna glorious past hai... But all that count to none now!
@HLovecharg77424@RaviSharmaTalks Indian themselves are responsible for this, ek dum ghatiya cheap mindset, limited soch, happy being corrupt goons at home. Even your songs are so dirty where every male member of the house is looking for an opportunity to fuck e.g ch** volume 1..
@AumOmnipresent@RaviSharmaTalks India, Where people have character to loot a bridge, materials and roads; who will come to invest?
First build people with worthy character before expecting progress..
बहुत जल्द ही बिहार के गड़े मुर्दे खोदकर मानसिक और वैचारिक स्तर पर दिवालिया हो चुके बॉलीवुड एक और बिहार की पुरानी अपराध की कहानी बेचने वाले हैं जो की फरहान अख्तर की कंपनी एक्सेल करने वाली है और उसको अभिषके चौबे निर्देशित करेंगे ।
जिस तरह से बॉलीवुड ने बिहार की एकतरफा आपराधिक छवि बनाई है उससे आम बिहारी युवा बाहर निकल नहीं पाया है । दर्जन भर फ़िल्में और लगातार ऐसे वेब सीरीज आपको दिख जाएंगे । नीरज पांडे जैसे लोगों ने तो सीधा कह दिया की आइये ना हमरे बिहार में, कट्टा ठोक दें कपार में, लेकिन कहीं किसी ने चूं भी नहीं किया, तो जब आप सोचते हैं तो की बिहारियों को बुरी नज़र से क्यों देखा जाता है तो उसका एक बड़ा कारण ये भी है की बिहार की आपराधिक कहानियां बेचीं जाती हैं और उसके खरीदार बहुत हैं वो इसलिए क्यूंकि आप दूसरे प्रदेश के ऊपर ".....कट्टा थोक दें कपार में. ." जैसे गाने बनाएंगे तो वहाँ के लोग आंदोलन खड़ा कर देंगे, जैसे की मिर्जापुर के निर्माताओं पर मिर्जापुर के विधायक ने छवि धूमिल करने का केस कर दिया ।
आइये तो जानते हैं की कैसे बॉलीवुड ने 50 सालों में बिहार की एकतरफा छवि बेची है
पिछले कई दशकों से बॉलीवुड ने बिहार को अक्सर एक ही तरह से दिखाया है। फिल्मों और वेब सीरीज़ में बिहार का मतलब बना दिया गया:
अपराध
अपहरण
भ्रष्टाचार
गरीबी
दबंगई
राजनीतिक हिंसा
और मज़ाकिया लहजा
इसका मतलब यह नहीं कि बिहार में समस्याएँ नहीं हैं। हर समाज में समस्याएँ होती हैं। लेकिन असली समस्या है “सिर्फ वही चीज़ बार-बार दिखाना।”
बिहार सिर्फ अपराध की जगह नहीं है। यह वही भूमि है जहाँ:
नालंदा जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालय रहे,
बड़ी साहित्यिक परंपरा रही,
लोक संगीत और लोक कला विकसित हुई,
थिएटर और संस्कृति मजबूत रही,
लाखों मेहनतकश लोगों ने देश बनाया।
लेकिन फिल्मों में बिहार को ज्यादातर बंदूक, गाली और डर के रूप में दिखाया गया।
शुरुआती फिल्मों में बिहार
1970 और 1980 के दशक की फिल्मों में बिहार को अक्सर:
जमींदारी,
डकैत,
पिछड़े गाँव,
और कानूनहीन इलाकों
के रूप में दिखाया गया।
धीरे-धीरे “बिहारी” शब्द का मतलब बना दिया गया:
रूखा बोलने वाला,
कम पढ़ा-लिखा,
और पिछड़ा व्यक्ति।
जबकि बंगाल, पंजाब या कश्मीर को फिल्मों में सुंदर, रोमांटिक और सांस्कृतिक तरीके से दिखाया गया।
1990 और 2000 के बाद बिहार = अपराध
1990 के बाद बॉलीवुड में बिहार को अपराध की जमीन की तरह दिखाया जाने लगा।
कई फिल्मों में बार-बार ये चीजें दिखाई गईं:
अपहरण उद्योग
माफिया राजनीति
गैंगवार
जातीय हिंसा
भ्रष्टाचार
जैसी फिल्मों ने इस छवि को मजबूत किया:
Shool
Gangaajal
Apaharan
ये फिल्में अच्छी बनी थीं, लेकिन लगातार ऐसे चित्रण से पूरे देश में यह धारणा बनने लगी कि: “बिहार मतलब अपराध और अव्यवस्था।”
धीरे-धीरे यह बॉलीवुड का आसान फार्मूला बन गया:
थोड़ा देहाती लहजा,
नेता,
बंदूक,
धूल भरी सड़क,
और गुंडे जोड़ दो, दर्शक तुरंत समझ जाता था — “ये बिहार है।”
भोजपुरी और मगही लहजे का मज़ाक आप लोगों ने "पंचायत" को बहुत एन्जॉय किया लेकिन जहाँ से मैं देखता हूँ पंचायत बहुत नुकसान करती है क्यूंकि बलिया की कहानी में दिखाने की कोशिश है की बलिया की अपनी भाषा मर चुकी है और पूरा बलिया का वो गांव एक अजीबोगरीब हास्यास्पद हिंदी बोलता है । लोगों को रस तो मिल जाता है लेकिन वो रस कहाँ से निचोड़ा गया है वो बताता नहीं है कोई ।
तो कहने का मतलब है की सबसे ज्यादा नुकसान बिहार की भाषा और बोलचाल को हुआ।
भोजपुरी और मगही लहजे को फिल्मों में अक्सर:
मज़ाक के लिए,
गंवार दिखाने के लिए,
या अपराधी दिखाने के लिए
इस्तेमाल किया गया।
कई फिल्मों में “बिहारी हिंदी” को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया।
उदाहरण:
Half Girlfriend
Super 30
धीरे-धीरे लोगों के दिमाग में यह बात बैठने लगी:
साफ हिंदी = समझदार
भोजपुरी/मगही लहजा = कमतर या मज़ाकिया ये बात ठीक है की बॉलीवुड हिंदी बनाएगा, कोई दिक्कत नहीं है आप बनाइये लेकिन ये प्रकाश झा नीरज पांडे जैसे लोग इतने निर्लज कैसे हो गए की इन्होने कभी अपनी मातृभाषा पर ध्यान नहीं दिया ।
इसका असर बिहार के प्रवासी लोगों पर पड़ा, जिन्हें दूसरे शहरों में अक्सर हीन नजर से देखा गया।
“क्रिमिनल बिहारी” की छवि
बॉलीवुड में सबसे ज्यादा दिखाई जाने वाली छवि बनी: “गुस्सैल, गाली देने वाला, बंदूक लेकर घूमने वाला बिहारी आदमी।”
Gangs of Wasseypur जैसी फिल्में कलात्मक रूप से मजबूत थीं, लेकिन उनके बाद कई फिल्मों और सीरीज़ ने सिर्फ बाहरी चीजें कॉपी कीं:
गाली,
हिंसा,
कोयला माफिया,
देहाती आक्रामकता।
समाज की गहराई कम दिखाई गई, स्टाइल ज्यादा।
बाद में वेब सीरीज़ ने इस ट्रेंड को और बढ़ाया:
Rangbaaz
Khakee: The Bihar Chapter
Maharani
और भी हैं
समस्या अपराध दिखाने में नहीं है
सिनेमा को सच्चाई दिखानी चाहिए।
समस्या यह है कि बिहार की सिर्फ नकारात्मक बातें बार-बार दिखाई गईं और ये कोई बाहर के लोग नहीं थे, ये सब बिहारी ही थे मैक्सिमम ।
मुंबई पर भी अपराध आधारित फिल्में बनीं, लेकिन मुंबई को:
ग्लैमरस,
आधुनिक,
सपनों का शहर
भी दिखाया गया।
पंजाब को:
संगीत,
खेती,
रोमांस,
फैशन
के साथ दिखाया गया।
बंगाल को:
साहित्य,
बुद्धिजीवी संस्कृति,
कला
के रूप में दिखाया गया।
लेकिन बिहार के बारे में संतुलित कहानियाँ बहुत कम बनीं।
कहाँ हैं फिल्में:
बिहारी वैज्ञानिकों पर?
मैथिली संस्कृति पर?
लोककला पर?
मध्यवर्गीय बिहार पर?
महिलाओं के बदलाव पर?
प्रवासी मजदूरों की भावनात्मक दुनिया पर?
फिर आया भोजपुरी सिनेमा । अब क्यूंकि पढ़े लिखे दर्शक और मेकर सब बचपन से हिंदी में ही पले बड़े तो भोजपुरी पर एक तरह के लोगों का कब्ज़ा हुआ जिन्होंने भोजपुरी में वही किया जो उन्हें आता था । दर्शक हमेशा से गरीब कम पढ़ा लिखा वर्ग, प्रवासी मजदूर रहा । भोजपुरी बुरा बनाने वाले से ज्यादा अच्छा ना बनाने की वजह से बर्बाद हुआ और जिन बिहारियों को अच्छा सिनेमा बनाना आता है वो सब हिंदी में हैं ।
तो इस तरह से भोजपुरी सिनेमा के एक बड़े हिस्से ने भी बिहार की छवि को नुकसान पहुँचाया।
कई फिल्मों में:
अश्लीलता,
महिलाओं को गलत तरीके से दिखाना,
डबल मीनिंग गाने,
जोर-जबरदस्ती वाली मर्दानगी
बहुत बढ़ गई।
इससे भोजपुरी भाषा की प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ।
जहाँ मलयालम, मराठी और बंगाली सिनेमा को सम्मान मिला, वहीं भोजपुरी सिनेमा को “सस्ता मनोरंजन” मान लिया गया।
सिनेमा का असर बहुत गहरा होता है
बहुत से लोग जिन्होंने कभी बिहार नहीं देखा, वे बिहार को फिल्मों और सोशल मीडिया के जरिए ही जानते हैं।
जब किसी समाज को बार-बार मज़ाक या अपराध के रूप में दिखाया जाता है, तो -
बाहर के लोग उसे उसी नजर से देखने लगते हैं
अंदर के लोग खुद को कमतर समझने लगते हैं
यहीं से सांस्कृतिक नुकसान शुरू होता है।
आगे का रास्ता
बिहार की नई छवि शायद बॉलीवुड नहीं बनाएगा।
इसलिए हमें चाहिए मैथिली सिनेमा, गंभीर भोजपुरी सिनेमा, बिहार के स्वतंत्र फिल्मकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्में, और जमीनी कहानियाँ बिहार के लोगों की अपनी मातृभाषाओँ में ।
समाधान नकली सकारात्मकता नहीं है।
समाधान है — संतुलन।
बिहार को उसी तरह दिखाया जाना चाहिए जैसा वह सच में है:
संघर्ष भी,
सुंदरता भी,
हिंसा भी,
बुद्धिमत्ता भी,
राजनीति भी,
कविता भी।
क्योंकि बिहार किसी एक stereotype से कहीं ज्यादा बड़ा और जटिल समाज है।
Delhi delivery boy case:
"We are from Bihar and that is why he got killed.
Please take action against constable.
They made no mistake.
His family has no earning member.
Is is a crime to be Bihari in Delhi?
My son's name is Krishna.
Police in simple dress stopped him and aimed gun at him."
- Relatives of man shot dead by constable in alleged racist attack
दिल्ली में गुंडा पुलिस एक बिहारी को इसलिए गोली मार देता है क्योंकि वह अपने दोस्तों के साथ बिहारी भाषा में बात कर रहा था। एक की मौत जाती है। एक घायल है।
बिहारी शब्द की पीड़ा अंतहीन होती जा रही है।
और जान लें अब यह मुद्दा भी ना बनेगा। क्योंकि बिहार-बिहारी की क़ीमत सिर्फ़ चुनाव के दौरान होती है! बाक़ी समय नहीं।
Both trains from Patna to Gopalganj cancelled. Even Siwan trains cancelled. Patna is the state capital how is a common man supposed to travel? Bus fare is 5× train fare. MPs & MLAs useless. Fix this, or change the capital, or merge Gopalganj with UP
@dralokksuman@Gopalganj_index
फिर से बिहार लिखा जा सकता है क्योंकि बदनाम करने की आजादी है,
लेकिन फिर से गुजरात ? फिर से यूपी ? फिर से राजस्थान ? फिर से बंगाल ? लिखने से पत्रकारों के कूल्हे चिटकने का डर है,इसलिए कलम थम जाती है।
A 60-ft ACTIVE bridge got stolen overnight in Chhattisgarh..and everyone is quiet 🤡
No outrage. No debates. No hashtags.
If this happened in Bihar?
‘Bihar is not for beginners’
‘Bihar day by day’
‘Not ready for development’ trending already.
Same crime. Different reactions.
Selective outrage.
In 1972 UNESCO recorded Bhojpuri folk songs as part of the world music project. The majority of the songs that were recorded in North India were in Bhojpuri.
Please read & share the thread below to demand #Justice4Anjali & spread awareness in regard to this poor nurse who was violated, murdered & thrown on tracks. Her father wasn't informed until postmortem was done; with the consent of the very doctor who is accused of the crime.