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आज दुष्यन्त कुमार जी की ये पंक्तियां ध्यान आ रही हैं-
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"मालूम था मुझको कि हर धारा नदी होती नहीं,
हर वृक्ष की हर शाख फूलों से लदी होती नहीं।
फिर भी लगा जब तक क़दम आगे बढ़ाऊँगा नहीं,
कैसे कटेगा रास्ता यदि गुनगुनाऊँगा नहीं।।"
जिस स्कूल कॉलेज से पढ़ के निकल गए हो वहां दुबारा जाने पर सब उदास सा लगता है, जिस गांव घर से निकल के आगे बढ़ गए, वहां वापस जाने पर ऐसा लगता है जैसे एक जमाना गुजरने के साथ रौनक चली गई हो।
सब तरफ घूम कर देखने पर डर सा लगता है, भावुकता से भरा मन एक झटके में वहां से बाहर निकल जाना चाहता है। दरवाजे, खिड़कियां, आंगन एक कहानी कहते हुए दिखते हैं, खुली आंखों से दिखने लगता है कि इसी आंगन में कैसे बैठ कर कितने सांझ चूल्हे पर बनी सोंधी रोटियां खाई थी। मन खोजने लगता है, पुराने समय को, पुराने लोग को, और उनके बीत जाने के दुख से भर उठता है।
कुछ छूट जाने के बाद लौटना और एक एक बारगी अकेले में बीते पलों को महसूस करना, वर्षों पहले आम से बीते हुए दिनों का खास सा लगना होता है। आंगन की तुलसी सालों से सूख गई, दरवाजे का नल अब चलता नहीं है, सांझ की दिया बाती अब कोई नही करता। अब दुवारे पर कोई चौपाल नहीं लगती न ही आंगन वाले ठहाके गूंजते हैं। सब कुछ वीरान सा और घर पर लगा ताला फिल्म के उस चौकीदार सा लगता है जो वर्षों अपने मालिक के इंतजार में बूढ़ा हो चला है।
अकेलापन उदासी के लिबास ओढ़े रहता है, हम सबके मन के कोने में एक कसक सी है। समय के साथ रास्ते खोज लेने चाहिए, मन में एक पक्की सड़क और पुल बनाए रखने की जो नए और पुराने को मजबूती से जोड़े रख सके। हम किसी भी ऊंचाई पर हो, जड़ से जुड़े रहेंगे तो हमेशा हरेभरे रहेंगे।