@mohitborker ना , अगर चैन (सुकून) किराये पर मिलता,
तो रास्तो पर अपने ही बच्चों के प्रेम के लिए तरसते बूढें माँ -बाप ना होते , अगर मिलता तो बात-बात पर अपनो को तलाशते पल ना होते ।
सुकून,चैन satisfaction तो खुद के अंदर ही, अगर चाहों तो उसे किराये के मकान की नहीं, खुद के आशियाने मे खोजो।😊
पिता वह पेड़ है,
जिसके साये मे रहकर पंछी उडान भरते हैं।
पिता वह विशाल वृक्ष है,
जो खुद धुप मे रहकर अपनी छोटी-छोटी टहनियों को छाव देता है।
पिता जाडे मे पडनेवाली एक सुरज की
किरण जैसे है,
जिसके पडते ही पत्तीयाँ खिल उठती हैं।
- नोरिका बनकर
Beautifully written!!! Krishna, as a debutante, sets the vinyl straight and asserts his ability to the fullest. Amazingly inspirational was his collection of Rehman's interviews, media posts and concerts.💝💝💝
ये खिडकियों से झाकती आँखें कीतना
कुछ कहती हैं ना,
कुछ भविष्य के सपने ,
कुछ बिते पलों की बातें,
कुछ बंधन मे बंधे अस्तित्व को
तराशते वो पल,
जो कभी आजाद होंगे ऐसा विश्वास।
बस वर्तमान मे ये आँखें सिर्फ खुदको तराशती हैं।
-नोरिका बनकर
प्रवासात अनवड घडलेला ओळख नसलेल्या माणसांशी संवाद वेगळाचं रंगतो,
कारण तिथे बोलताना काहीचं गैरसमझ नसत,
आपल्या मुळे, समोरच्या व्यक्तीची भावना दुखेल अशी भिती , किंवा आपल्या बोलल्याने
त्यानां वाइट वाटेल अशीं शंका नसते , म्हणूनच
हे संवाद गमतीशीर ठरते।
-नोरिका बनकर
रास्ते कुछ कहना चाहते हैं।
यु खामोश रस्तो पर चलते-चलते,
इस मोड़ पर पोहोच गये।
मंजिल का पता नहीं तज़ुर्बा संग ले चले,
चलते चलते गिरना भी इन्हीं रास्तो पर सीखा है।
ध्यान से सुनो ये खामोश रास्ते कुछ तो कहना चाहते है।
-नोरिका बनकर