अंजना ओम कश्यप ने यहाँ अपने पद का ही इस्तेमाल किया है और उनका जातिगत अहंकार साफ़ तौर पर दिखाई देता है। उन्होंने साफ़ कह दिया चलो, हमारे चैनल से हटो। मानो यह चैनल उनकी जागीर हो।
यही सब तो विश्वविद्यालयों में भी होता है। कह दिया जाता है चलो, यहाँ से निकलो, तुम्हारे लिए कोई नौकरी नहीं है। तुम्हारे लिए यहाँ दाख़िले में भी जगह नहीं है जैसे विश्वविद्यालय उनके पिता और दादाजी की विरासत हो।
उत्तर प्रदेश में ओबीसी की सरकारी नौकरियों पर सीधी डकैती चल रही है।
ओबीसी का हक़ काटकर सवर्णों को EWS के नाम पर दिया जा रहा है—यह सामाजिक न्याय नहीं, संवैधानिक धोखा है।स्कॉलरशिप, फंड और आरक्षण सब छीना जा रहा है,और ओबीसी समाज चुप बैठा है।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित केंद्रीय संस्थान में यदि अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के शोधार्थियों के साथ खुला भेदभाव हो और प्रशासन मौन साधे रहे, तो यह केवल एक विभाग का मामला नहीं, बल्कि संविधान और सामाजिक न्याय पर सीधा हमला है। DMC का शुल्क लेने के बाद केवल RET श्रेणी के आरक्षित वर्ग के शोधार्थियों को जबरन संबद्ध महाविद्यालयों में भेजना दोहरे मापदंड और संस्थागत अन्याय को उजागर करता है। 10 महीनों से छात्र मानसिक उत्पीड़न और शैक्षणिक क्षति झेल रहे हैं। हम इस अन्याय के खिलाफ छात्रों के साथ खड़े हैं। सामाजिक न्याय की लड़ाई में चुप्पी अपराध है।
भाजपा सरकार OBC, SC, ST वर्ग के युवाओं के भविष्य से लगातार खिलवाड़ कर रही है।
भाजपा सरकार ने OBC, SC, ST वर्ग के पदों में कटौती करके आरक्षित वर्ग से अन्याय एवं अभ्यर्थियों पर कुठराघात किया है।
भाजपा सरकार का यह रवैया पूरी तरह अनुचित एवं अन्यायपूर्ण है। सरकार को इन विसंगतियों का समाधान करके OBC, SC, ST के अभ्यर्थियों के साथ न्याय करना चाहिए।
@yadavakhilesh@NationalDastak
EWS वाले कम नंबर पाकर भी नौकरी पा रहे हैं,
दलित, पिछड़े ज्यादा नंबर लाकर भी नौकरी से वंचित हैं,
आरक्षण लूटा जा रहा है, लेकिन BJP के
दलित, पिछड़े नेता RSS के डर से खामोश हैं,
@SanjayAzadSln
झांसी की बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी का यह मामला बीजेपी की शिक्षा नीति की असली तस्वीर दिखाता है। MA का टॉपर छात्र, तीन बार NET क्वालिफाइड, चार किताबों का लेखक—फिर भी पीएचडी में एडमिशन रोका जा रहा है, वजह बताई जा रही है “राजनीति करते हो”। जब योग्यता बेकार हो जाए और विचार अपराध बन जाए, तो समझिए शिक्षा तंत्र सत्ता के इशारों पर चल रहा है। बीजेपी के दौर में सवाल पूछने वाले छात्रों को कुचला जा रहा है। यह सिर्फ एक छात्र का नहीं, पूरी पीढ़ी के भविष्य का सवाल है।
नड्डा जी के स्वास्थ्य मंत्रालय को गोरखपुर एम्स के लिए ओबीसी और दलित डॉ नहीं मिल रहे। 80 पोस्ट खाली थी। 13 भरे गए जिसमें 8 जनरल के भरे गए। ओबीसी और दलित वाली सीट nfs कर दी गई।
• पिछले 5 साल में हुयी सभी भर्तियों में PDA के पदों की लूट हुई है ।
• ये पिछली 4 भर्तियों का लेखा जोखा है। इन सभी भर्तियों में 30 हज़ार से अधिक PDA पदों की लूट हुयी।
• इन सभी भर्तियों में चोरी पकड़े जाने के बाद सरकार ने तथाकथित कमिटी गठित की थी लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई केवल मीडिया मैनेजमेंट हुआ।
• क्या ये Anti-PDA सरकार बताएगी की वो आख़िरकार कब तक OBC/SC/ST आरक्षण की लूट करेगी।
- आरक्षण मारने के ‘Not Found Suitable’ जैसे ग़ैरक़ानूनी फ़ार्मूले को अब कोर्ट में चुनौती देने का समय आ गया है।
दरअसल भाजपा के एजेंडे में नौकरी है ही नहीं और पीडीए समाज के लिए तो बिल्कुल भी नहीं है।
भाजपा जाए तो नौकरी-भर्ती आए!
देश का एक जिम्मेदार नागरिक, और देश की सबसे बड़ी पंचायत का सदस्य होने के नाते मैं भारत की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में किसी भी विदेशी हस्तक्षेप की कड़ी निंदा करता हूं।
लेकिन तथ्य और सच्चाई को भी नहीं झुठलाया जा सकता की आज़ादी के 75 साल बाद भी देश की सत्ता, संसाधन और संपत्ति कुछ मुट्ठीभर जातियों के कब्ज़े में है।
एक रिपोर्ट बताती है कि भारत की मात्र 1% आबादी के पास देश की 40.1%, जबकि महज 10% लोगों के पास 77% राष्ट्रीय संपत्ति है, जबकि नीचे 60% का हिस्सा केवल 4.8% है.
इसलिए देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई में भी जाति का विभेद साफ दिखाई देता है।
दलित, आदिवासी (SC/ST), पिछड़े वर्ग (OBC) और धार्मिक अल्पसंख्यक आज भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेले गए हैं।
यही असमानता भारत की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है और यही बाहरी ताक़तों को हमारे समाज पर सवाल उठाने का मौका देती है। अगर हम सचमुच भारत को मजबूत और संप्रभु बनाना चाहते हैं, तो पहले अपने घर की इस सड़ी हुई व्यवस्था को बदलना होगा।
इसके लिए तीन कदम अनिवार्य हैं:
1. जातिगत जनगणना – ताकि असली तस्वीर सामने आए कि देश के संसाधनों पर वास्तव में किन लोगों का कब्जा है?
2. निजी क्षेत्र में आरक्षण – ताकि अवसर सिर्फ ऊँच वर्ग की जागीर न रहें।
3. आर्थिक न्याय–ताकि संसाधनों पर समान अधिकार सुनिश्चित हो सके।
तभी बनेगा एक समानता वाला भारत, जहाँ जातिगत विषमता न तो विदेशी ताक़तों के लिए मुद्दा बनेगी और न ही बाबा साहेब के संविधानिक भारत की छवि धूमिल होगी।
बाबा साहब का यह संदेश मेरे लिए पत्थर की लकीर की तरह है
“हम सबसे पहले और सबसे आखिर में भारतीय हैं।”
पिछले 2-4 दिनों से जब भी पार्टी मुझे किसी चैनल पर भेजती है, तो चैनल की ओर से फोन आता है कि “मैडम, हम आपको नहीं रख सकते, बीजेपी ने आप पर रोक लगा दी है।”
मेरा सीधा सवाल है, आखिर बीजेपी कौन होती है किसी प्रवक्ता को बैन करने वाली? यह तो हमारी पार्टी का अधिकार है, पार्टी जिसको जहाँ भेजती है वह वहीं जाता है। क्या यह निर्णय बीजेपी और एंकरों की सुविधा के आधार पर होगा?
परसों से पहले ही 3 चैनलों ने मुझे हटा दिया। उसके बाद परसों 2 और चैनलों ने ऐसा ही किया। परसों एक चैनल ने साहस दिखाते हुए कहा “आईए, हम रिस्क लेंगे।” लेकिन जैसे ही मैं शो से जुड़ी, महज़ 10 मिनट के भीतर बीजेपी ऑफिस से चैनल को फोन आने लगा कि मुझे हटाया जाए। जब मुझे नहीं हटाया गया तो बीजेपी ने अपने प्रवक्ता को हटा लिया। कल भी एक चैनल ने शो शुरू होने से सिर्फ 10 मिनट पहले मुझे ड्रॉप कर दिया। एक चैनल ने तो फोन तक नहीं किया।
जिन चैनलों ने मुझे ड्रॉप किया, उन्होंने साफ कहा “हमने बहुत कोशिश की, लेकिन बीजेपी मान ही नहीं रही है।”
अब ज़रूरी है कि समझा जाए यह सब क्यों हो रहा है। सच्चाई यह है कि आरजेडी के सामने इनका नैरेटिव लगातार नाकाम हो रहा है। तथाकथित राजनीतिक विश्लेषक, जो वास्तव में संघी होते हैं, एंकर जो सामान्यत: बीजेपी का ही पक्ष लेते हैं, बीजेपी और एनडीए के अधिकांश प्रवक्ता सब एक ही भाषा बोलते हैं। इसके बावजूद वे आरजेडी की महिला प्रवक्ताओं से घबराए हुए हैं।
असल समस्या यह है कि इन्हें यह कल्पना तक नहीं थी कि पिछड़े और दलित समाज से आई महिलाएँ उनके कुतर्कों का डटकर सामना करेंगी और उन्हें टिकने नहीं देंगी। महिलाओं के प्रति घृणा तो इनकी विचारधारा का हिस्सा है ही।
लेकिन यह लड़ाई ऐसे ही थमने वाली नहीं है। हम डरकर पीछे हट जाएँ यह संभव ही नहीं है।