Super Exclusive-
‘मंदिर का गर्भगृह बहुकोण बनाया!
ये तो मंदिर ‘राक्षस कोण’ बनाया!’
राम मंदिर बनाने वाली कंपनी को नहीं था, मंदिर बनाने का कोई अनुभव।
राजस्थान के बंसी पहाड़पुर में पत्थर खदान मालिक दिलीप सिंह राठौड़ ‘टॉप सीक्रेट’ पर।
दिलीप सिंह राठौड़ के मुताबिक उन्होंने सबसे पहले राम मंदिर के लिए बिना मूल्य लिए पत्थर देने की बात की थी,
मगर उनका आरोप है कि उन्हें खारिज कर 5 गुना क़ीमत पर मंदिर के लिए पत्थर ख़रीदे गए।
(पूरा इंटरव्यू टॉप सीक्रेट के YouTube channel पर)
ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरी का विस्फोटक खुलासा
"मैं कोषाध्यक्ष लेकिन कोष कार्य में भूमिका नहीं, बैंक खाते में मेरे हस्ताक्षर नहीं, मेरे पास कोई चेकबुक नहीं, पेमेंट सिर्फ कैश में, चढ़ावा गिनती क्षेत्र से मेरा कोई संबंध नहीं"
जांच हो जाये तो सीधे सेवातीर्थ जाकर रूकेगी।
भूमिहर्ता च कुनखी चण्डालः समुदाहृतः ।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा प्रायश्चित्तशतैरपि ॥
भूमि हड़पने वाला व्यक्ति चांडाल के समान है। सैकड़ों प्रायश्चित्त करने पर भी उसका पाप नहीं धुलता। मनुस्मृति, अध्याय 11, श्लोक 55
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भूमिहर्ता नरो यस्तु कल्पकोटिशतानि च ।
रौरवे नरके घोरे पच्यते नात्र संशयः ॥
अर्थ: जो मनुष्य दूसरी की भूमि हड़पता है, वह सौ करोड़ कल्पों तक घोर रौरव नरक में पकाया जाता है। इसमें कोई संशय नहीं।
(गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 5, श्लोक 12)
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शास्त्र कहते हैं कि भूमि हड़पना इतना गंभीर पाप है कि सामान्य धार्मिक प्रायश्चित्त हवन, व्रत, जप आदि पर्याप्त नहीं होते।
गरुड़ पुराण का प्रेत कल्प कहता है- जो व्यक्ति दूसरों की भूमि/धन हड़पता है, उसे नरक में घोर यातना भोगनी पड़ती है। प्रायश्चित्त में दान, तप और पश्चाताप से कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन पीड़ित को न्याय दिए बिना, केवल बाहरी कर्म पर्याप्त नहीं।
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पाप भूमि पर निवास बनाने पर परिवारिक कलह और अशांति बार-बार झगड़े, तनाव, अलगाव होते हैं। आर्थिक हानि, व्यापार/नौकरी में रुकावट, ऋण बढ़ना, अप्रत्याशित खर्च होते हैं।
स्वास्थ्य समस्याये, बार-बार बीमारी, मानसिक तनाव, नींद न आना, बच्चों में विकास संबंधी दोष। संतान न होना, बार-बार गर्भपात, बच्चों में अस्वस्थता देखने को मिलती है।
निर्माण व रहने मे बाधा आती है। निर्माण अधूरा रहना, बार-बार मरम्मत, दुर्घटनाएँ देखने मे आती है।
चोरी, आग, कानूनी विवाद, अतिथि/संबंधियों से समस्या, घर में आत्महत्या, हिंसा का इतिहास दोहराना आदि परिणाम आते हैं।
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वास्तु आगम ग्रंथ (मयमतम, समरांगण सूत्रधार, विश्वकर्मा प्रकाश) का सामान्य नियम है-
“शुद्धे भूमौ देवालयं कारयेत्”
अर्थात केवल शुद्ध भूमि पर ही देवालय (मंदिर) बनाना चाहिए। मयमतम (मंदिर निर्माण अध्याय) कहता है- अशुद्ध, हड़पी, हत्या/शोक वाली भूमि पर देव प्रतिमा स्थापित करने से देव दोष लगता है
देवता अप्रसन्न होते हैं, भक्तों को लाभ नहीं मिलता
और क्षेत्र में रोग, अशांति, विपत्ति आती है।
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स्कंद पुराण, तथा गरुड़ पुराण (प्रेत कल्प) कहते हैं कि अपवित्र भूमि (हत्या, हड़प, पाप कर्म वाली) पर देव स्थापना से देवता का तेज कम हो जाता है। और स्थान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
यदि भूमि पूर्व में हत्या, श्मशान, विवाद या पाप कर्म वाली हो तो देव दोष लगता है।
देव दोष के प्रभाव से भक्तों को लाभ कम मिलता है। मंदिर में नकारात्मक घटनाएँ जैसे कलह, आर्थिक हानि, रखरखाव की समस्या आती है। एवं देवक्षेत्र में अशांति बनी रहती है।
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यह बातें मैनें चैट जीपीटी और ग्रोक से बातचीत करके जमा की हैं। वस्तुतः इन अंधविश्वास भरी बातों पर मेरा कोई यकीन नही।
दरअसल हालिया खबरों के बाद, अब मेरा पक्का यकीन है, कि ऐसी जगह पर मन्दिर बनाना, उसके निर्माणको के लिए लाभ का सौदा रहता है।
बशर्ते आपके पास- लोगो की पीड़ा, दुख, दुर्भाग्य, कष्ट, निराशा, क्रोध को मोड़ने के लिए भांड मीडिया, पार्टी तंत्र, अनैतिक अनीति कपट पूर्ण संगठन, सत्ता की ताकत, और गालीबाजो की सेवाएं उपलब्ध हों।
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राम मंदिर तो अब लूटा है, लौह पुरुष सरदार पटेल को बेंच कर पहले ही खा गए थे..कथित राष्ट्रभक्त!
3000 करोड़ की बताई गई सरदार साहब की मूर्ति मात्र 324 करोड़ की थी और बाकी कमीशन राष्ट्रवादी पार्टी और गुजरातियों की जेब में चल गया।
बहुत बड़े बड़े चमत्कार कर रखें है इन संघियो ने!
बुद्धि विहीन हो क्या महोदय
मंदिर जमीन घोटाला संघ वालों ने किया
मंदिर निर्माण घोटाला संघ वालों ने किया
मंदिर से सोना चोरी संघ वालों ने किया
मंदिर से आभूषण चोरी संघ वालों ने किया
मंदिर से चढ़ावा चोरी संघ वालों ने किया
महोदय कह रहे है
आस्था को चोट विपक्ष वाले पहुंचा रहे है
क्योंकि विपक्ष वाले चोर को चोर कह रहे है
गजब है महोदय
देवदत्त पटनायक का जरूरी लेख- 👇
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मुग़लों ने मंदिरों को तोड़कर लूटा। सनातनियों ने मंदिरों को बनाकर लूटा। क्या ये सच है? जब सोने का अंडा देने वाली मुर्गी रोज़ अंडे दे सकती है, तो उसे मारना क्यों?
आजकल के कई मंदिर पवित्र जगहों से ज़्यादा आध्यात्मिक थीम पार्क की तरह काम करते हैं। खाओ। शॉपिंग करो। दान दो। लाइन में लगो। VIP दर्शन खरीदो। सेल्फी लो। रील्स बनाओ। यही दोहराते रहो। हर कदम पर कमाई होती है। होटल, रेस्टोरेंट, दुकानें, पार्किंग, प्रसाद, दान। एक पूरी धार्मिक अर्थव्यवस्था।
इस अर्थव्यवस्था को कौन कंट्रोल करता है? व्यापारी। दुकानें। होटल। अक्सर मंदिर कमेटियाँ। यहाँ तक कि पुजारी भी इसी इकोसिस्टम पर निर्भर होते जा रहे हैं। जहाँ पैसा जमा होता है, वहाँ हिसाब-किताब में गड़बड़ी होना तय है। व्यापारी जानते हैं कि बिना किसी को पता चले पैसे को कैसे गायब करना है। व्यापारियों ने पुजारियों को अपनी सेल्स और मार्केटिंग टीम बना लिया है। मंदिर उनकी फैक्ट्री है।
यह मॉडल कोई अनोखा नहीं है। आधुनिक मक्का को ही देख लीजिए। ऐतिहासिक इलाके गायब हो रहे हैं। आलीशान होटल बन रहे हैं। तीर्थयात्रा एक इंडस्ट्री बन गई है। आस्था इंफ्रास्ट्रक्चर बन गई है। इंफ्रास्ट्रक्चर बिज़नेस बन गया है।
भारत बस इसी मॉडल को कई गुना बढ़ा रहा है। यहाँ एक नहीं, बल्कि सैकड़ों पवित्र शहर हैं। हर धार्मिक स्थल एक डेस्टिनेशन बन जाता है। हर डेस्टिनेशन रियल एस्टेट बन जाता है। हर तीर्थयात्रा एक बाज़ार बन जाती है।
"हिंदू खतरे में हैं" का नारा आस्था को बचाने के लिए भीड़ जुटाता है - एक रील और इंस्टाग्राम पोस्ट के ज़रिए। भीड़ से दान आता है। दान से साम्राज्य बनते हैं। अब हमारे पास कोयंबटूर में "इंस्टाग्राम के लायक" आदि योगी शिव हैं। पूंजीवादी बनिया आध्यात्मिकता।
भक्त हाथ जोड़कर आता है। बाकी सब कैलकुलेटर लेकर आते हैं।
हिंदू समुदाय खुद तय करे कि किससे है हिंदू धर्म को असली खतरा……❗
एक तरफ़ जहां राम मन्दिर बनने के बाद दो साल के अंदर कथित राम भक्तों ने हजारों करोड़ पार कर दिए….., वहीं गोरखनाथ मंदिर में एक मुस्लिम यासीन अंसारी दशकों से मंदिर के वित्तीय और निर्माण कार्यों के प्रबंधन से जुड़े हुए हैं…….उनके लंबे कार्यकाल के दौरान उनकी देखरेख में रखे गए खातों और बजट में वित्तीय गड़बड़ी का एक भी मामला सामने नहीं आया…….
यासीन अंसारी गोरखनाथ मंदिर से जुड़े सबसे भरोसेमंद लोगों में से एक हैं. उन्होंने 1977 से 1983 के बीच मंदिर के आधिकारिक कैशियर के तौर पर काम किया…… वक्त के साथ उनकी जिम्मेदारी बढ़ती गई और अब वह मंदिर परिसर के निर्माण पर्यवेक्षक के तौर पर काम करते हैं…… इस भूमिका में वह निर्माण से जुड़े खातों की देखरेख करते हैं, खर्च का रिकॉर्ड रखते हैं, निर्माण सामग्री के इस्तेमाल पर नजर रखते हैं और साथ ही प्रोजेक्ट के बजट का प्रबंधन भी करते हैं…..
यासीन अंसारी ही नहीं कई अन्य मुस्लिम भी इस मन्दिर की व्यवस्था से वर्षों से जुड़े हैं और आज तक कोई उनके उपर उंगली नहीं उठा सका!…..
एक तरफ चीन अरुणाचल और लद्दाख को आये दिन कब्ज़ा करता जा रहा है दूसरी तरफ मोदी टुकड़ों में देश को अडानी के हाथों बेचता जा रहा है...दोनों में होड़ लगी है कि कौन कितना अपने हिस्से में कर लेता है!
आज भारत की नियति उस विधवा की तरह हो गई है, जिसे हर कोई नोचने के लिए तत्पर मिलता है।
@kkjourno खोफ का अंदाजा लागिये...
इसके बावजूद जो लोग इस सिस्टम के खिलाफ प्रतिरोध कर रहे हैं वो सच मे जनता के सेवक हैं।
ओर जनता उनको ही नकारती आ रही है।
क्यों...? समाज के हर वर्ग के अपने अपने स्वार्थ हैं।
राम मंदिरों के पत्थरों में भी घोटाला??? हे राम!
ये राजस्थान के दिलीप सिंह राठौड़ हैं। इनकी पत्थरों की खान है।
यूट्यूब चैनल टॉप सीक्रेट को दिए इंटरव्यू में ये कह रहे हैं कि पत्थरों में पांच गुना का घोटाला हुआ। इनकी ट्रस्ट वालों से मेल के जरिये बात हुई थी, इन्होंने मंदिर के लिए पत्थर फ्री देने की पेशकश की थी। लेकिन ये कह रहे हैं कि जो पत्थर हम सौ रुपये में दे देते, लेकिन उन्हीं पत्थरों के लिए 500 रुपये का बिल बनवाया गया।
इनके मुताबिक, जो आज सामने आया है, उसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब मंदिर बनाने की तैयारी हो रही थी। इन्होंने कुछ कहने की कोशिश की तो इनको धमकाया भी गया कि 'हम जो कर रहे हैं करने दो, बीच में मत पड़ो, वरना मार दिए जाओगे, कुछ अता पता नहीं लगेगा।' राठौड़ साहेब कह रहे हैं कि हम नाम किसी का नहीं लेंगे। जब बड़े बड़े बाहुबली डर रहे हैं तो हमारी क्या औकात है।
अब आप सोचिए, राम मंदिर की जमीन में घोटाला, पत्थर खरीद में घोटाला, निर्माण में घोटाला और 40 प्रतिशत कमीशन का खेल, फिर चंदे में घोटाला, चढ़ावे में घोटाला.... राम मंदिर को संघियों ने अपना निजी एटीएम बना लिया और जमकर लूटा। बिना संगठित लूट के यह सब संभव नहीं है। आजतक कोई इस्तीफा नहीं हुआ, कोई पकड़ा नहीं गया, आठ नौकरों को पकड़कर जनता को झुनझुना थमा रहे हैं क्योंकि बड़े चोर एक दूसरे को बचा रहे हैं।
असली सवाल यह है कि चंदे और चढ़ावे के चोरी हुए हजारों करोड़ रुपये कहाँ गए? क्या यह पैसा आरएसएस द्वारा विभिन्न शहरों में बनवाए गए पंचसितारा कार्यालयों पर खर्च हुआ, या हवाला के ज़रिए विदेश भेजा गया?