अपर्णा सेन ने 1981 में ‘36 Chowringhee Lane’ का निर्देशन किया, जिसे अंग्रेजी भाषा की भारतीय फिल्मों में एक महत्वपूर्ण कृति माना जाता है; इस फिल्म को Karnataka State Film Award में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का सम्मान मिला था।
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शबाना आज़मी ने 1975 में ‘अंकुर’ से फिल्मी शुरुआत की और समानांतर सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्रियों में शामिल हुईं; उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाँच बार मिला है।
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मीना कुमारी को ‘ट्रेजेडी क्वीन’ कहा जाता है; वे केवल अभिनेत्री ही नहीं बल्कि उर्दू की कवयित्री भी थीं और अपनी कविताएँ ‘नाज़’ उपनाम से लिखती थीं।
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वैजयं��ीमाला पहली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री थीं जिन्हें हिंदी सिनेमा में बड़ी स्टार पहचान मिली और वे शास्त्रीय नृत्य की प्रशिक्षित कलाकार होने के कारण अपनी नृत्य-अभिनय शैली के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हुईं।
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नर्गिस पहली भारतीय अभिनेत्री थीं जिन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया; उनका कार्यकाल 1952 में नहीं बल्कि 1980 में शुरू हुआ और वे संसद के उच्च सदन में नामित होने वाली शुरुआती फिल्म हस्तियों में शामिल हुईं।
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देविका रानी भारतीय सिनेमा की पहली प्रमुख महिला सितारों में थीं और उन्हें 1970 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया; यह इस ��र्वोच्च भारतीय फिल्म सम्मान का पहला प्रदान था।
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कमलाबाई गोखले ने ‘मोहिनी भस्मासुर’ (1913) में मोहिनी की भूमिका निभाई और उन्हें भारतीय सिनेमा की शुरुआती महिला सितारों में गिना जाता है; वे दुर्गाबाई काम�� की बेटी थीं।
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दुर्गाबाई कामत को भारतीय सिनेमा की पहली महिला अभिनेत्री माना जाता है; उन्होंने दादासाहेब फाल्के की दूसरी फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ (1913) में अभिनय किया था।
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‘लगान’ (2001) तीसरी भारतीय फिल्म थी जिसे Academy Awards में Best Foreign Language Film के लिए आधिकारिक नामांकन मिला; इससे पहले ‘मदर इंडिया’ और ‘सलाम बॉम्बे!’ नामांकित हो चुकी थीं।
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सत्यजीत रे की ‘पथेर पांचाली’ (1955) को कान फिल्म समारोह में 1956 में ‘Best Human Document’ पुरस्कार मिला, जिसने भारतीय समानांतर सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भू���िका निभाई।
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‘नीचा नगर’ (1946) की पटकथा ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी थी और यह मैक्सिम गोर्की की रचना ‘The Lower Depths’ से प्रेरित सामाजिक यथार्थवादी सिनेमा की भारतीय मिसाल थी।
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‘संत तुकाराम’ (1936) पहली भारतीय फिल्मों में से थी जिसे वेनिस फिल्म समारोह में प्रदर्शित कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिली और इसे 1937 में Festival’s International Cinema पुरस्कारों में सम्मानित किया गया।
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‘अछूत कन्या’ (1936) में अशोक कुमार और देविका रानी की जोड़ी ने अभिनय किया; फिल्म ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक रूढ़ियों को कहानी का केंद्रीय विषय बनाया था।
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भारत की पहली महिला फिल्म निर्देशक फातिमा बेगम थीं, जिन्होंने 1926 में मूक फिल्म ‘बुलबुल-ए-परिस्तान’ का निर्देशन किया था।
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भारत का पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह 1954 में आयोजित हुआ और उस समय पुरस्कारों को ‘State Awards’ कहा जाता था; सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पहला पुरस्कार ‘श्यामची आई’ को मिला।
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‘मदर इंडिया’ (1957) पहली भारतीय फिल्म थी जिसे Academy Awards में Best Foreign Language Film की श्रेणी में आधिकारिक रूप से नामांकित किया गया; यह केवल एक वोट के अंतर से शीर्ष पाँच से बाहर हुई थी।
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भारतीय सिनेमा का पहल�� अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख सम्मान प्राप्त करने वाला क्षण 1946 के कान फिल्म समारोह में आया, जहाँ चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ ने Grand Prix साझा किया।
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बॉम्बे ट��कीज़ की स्थापना 1934 में हिमांशु राय और देविका रानी ने की थी; यह स्टूडियो भारतीय फिल्म उद्योग में संगठित स्टूडियो प्रणाली विकसित करने वाले शुरुआती संस्थानों में था।
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‘किसान कन्या’ को भारत की पहली स्वदेशी रंगीन फीचर फ��ल्म माना जाता है, लेकिन इससे पहले 1933 की ‘सैरंध्री’ को विदेश में रंगीन प्रक्रिया में प्रिंट किया गया था।
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भारत की पहली स्वदेशी रंगीन फीचर फिल्म ‘किसान कन्या’ (1937) थी, जिसका निर्देशन मोती बी. गिडवानी ने किया और इसे अर्देश���र ईरानी की Imperial Movietone ने बनाया था।
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