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*22/ 05/ 2026, रात 9 बजे*
*गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए। न रहेगा, बांस न बजेगी बांसुरी : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन : ग़ौसे आज़म फाउंडेशन*
*ईद से पहले बंगाल में छिड़ा बड़ा संग्राम!*
*गौहत्या बैन पर गरमा गया सियासी मैदान!*
*धर्म, राजनीति या कानून की पहचान!*
*बंगाल में गाय को लेकर मचा घमासान!*
*अहले सुन्नत के नाम पैग़ाम*
जो शख़्स खुद यूं कह रहा है कि
*“मुझे ज़्यादा मालूम नहीं”*
वह दीन की बात करेगा??? यह मज़ाक नहीं है, यह ईमान का मामला है।
*अब असली बात सुनो*
जो खुद को सुन्नी कहता है, वह अपने निकाह के लिए ग़ैर-मुत्तफ़िक़ अक़ीदे वाले (राफ़ज़ी/ वहाबी/ देवबंदी/ जमाअती/ अहले हदीस/ क़ादयानी आदि) घराने में रिश्ता क्यों करता है? क्या अब सुन्नियत सिर्फ़ नाम की रह गई है??? क्या अक़ीदा अब कोई मायने नहीं रखता???
*याद रखो*
निकाह सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं, दो अक़ीदों का जुड़ाव है और जब अक़ीदे टकराते हैं तो उसका असर सीधा आने वाली नस्लों के ईमान पर पड़ता है।
*इमाम के बारे में बहुत साफ़ सुन लो*
मस्जिद का इमाम किसी का गुलाम नहीं होता बल्कि वह शरीअत का मुहाफ़िज़ होता है। वह किसी बाप, किसी रिश्तेदार, किसी दबाव के आगे नहीं झुकता। वह सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुक्म के सामने झुकता है। अगर कोई इमाम जानते-बूझते शरीअत के ख़िलाफ़ निकाह पढ़ा दे तो वह सिर्फ़ एक रस्म अदा नहीं करता बल्कि शरीअत की अमानत में ख़यानत करता है।
*डबल स्टैंडर्ड बंद करो*
ज़ुबान से “हम सुन्नी हैं”। अमल में अक़ीदे की कोई परवाह नहीं। यह तरीक़ा दीन नहीं, यू खुला हुआ धोखा है।
*फैसला साफ़ होना चाहिए*
या तो अपने अक़ीदे पर डट जाओ या फिर खुलकर मनमानी करो और डंके की चोट पर कहो कि हम तो सुल्हे कुल्ली हैं। हम किसी की नहीं मानेंगे
लेकिन
दोनों तरफ़ का फायदा उठाने वाले हमेशा घाटे में रहते हैं दुनिया में भी, आख़िरत में भी।
*आख़िरी अपील*
अहले सुन्नत के लोगो! होश में आओ, अपने घरों को बचाओ, अपनी औलाद के ईमान की हिफाज़त करो और हर ऐसे कंटेंट को रोक दो, जो दीन को मज़ाक बना रहा है।
*सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन*
*जनादेश का फैसला आ चुका, अब इम्तिहान शुरू : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
*जनता की सेवा, बुनियादी हक़ और अमन-इंसाफ पर कोई समझौता नहीं*
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने एक मजबूत और साफ़ संदेश देते हुए कहा कि जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। अब वक़्त है कि नेता सिर्फ सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि खिदमत की सियासत का सबूत दें। यह जीत या हार का नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी और जवाबदेही का दौर है। उन्होंने कहा कि चूंकि अभी सरकार का गठन और शपथग्रहण होना बाकी है, इसलिए सभी दलों को संयम, समझदारी और दूरदर्शिता का परिचय देना चाहिए।
*गांव हो या शहर, बुनियादी हक़ अब वादों में नहीं, ज़मीनी हक़ीक़त में दिखने चाहिए*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि अब जनता सिर्फ भाषण नहीं, नतीजे चाहती है। गांव की धूल भरी गलियों से लेकर शहर की भागती सड़कों तक, हर जगह इंसान अपने हक़ के इंतज़ार में है। पानी, बिजली, सड़क, इलाज, तालीम और रोज़गार, ये किसी पर एहसान नहीं, बल्कि हर नागरिक का बुनियादी हक़ हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में असली कसौटी यही होगी कि क्या गांवों तक स्वास्थ्य और शिक्षा की रोशनी पहुंचती है? क्या शहरों में व्यवस्था और रोजगार मजूबूत होता है? क्या हर गरीब, मज़दूर और किसान को इंसाफ और सहूलियत मिलती है?
*सत्ता सेवा का नाम है और विपक्ष जागरूकता का*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि जो भी दल सरकार बनाएगा, उसे याद रखना चाहिए कि सत्ता हुकूमत करने का नहीं, सेवा करने का नाम है और जो विपक्ष में बैठेंगे, उनकी जिम्मेदारी है कि वे सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि रचनात्मक निगरानी और सही मार्गदर्शन करें।
*नफ़रत की आग नहीं, मोहब्बत की रौशनी फैलाइए*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि चुनाव खत्म हो चुका है। अब अगर कोई नफरत, झूठ और अफवाह फैलाता है, तो वह सिर्फ समाज नहीं, बल्कि पूरे देश को नुकसान पहुंचाता है। हम सबको मिलकर यह तय करना होगा कि सियासत इंसानियत पर भारी न पड़े।
*आख़िरी पैग़ाम और दुआ*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने अपने पैग़ाम में कहा कि जनता का भरोसा सबसे बड़ी अमानत है और इस अमानत में खयानत की कोई गुंजाइश नहीं। उन्होंने दुआ करते हुए कहा कि अल्लाह तआला हमारे मुल्क और इन राज्यों को अमन, तरक्की और खुशहाली से नवाज़े और हमारे नेताओं को ईमानदारी, इंसाफ और सच्ची खिदमत की तौफीक अता फरमाए।
*वंदे मातरम प्रस्ताव पर धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक संतुलन बनाए रखने की अपील*
ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन के चेयरमैन एवं चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने “वंदे मातरम” को राष्ट्रगान के समकक्ष दर्जा देने के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, जिसका सम्मान हर हाल में बनाए रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “मुस्लिम समाज दिल की गहराइयों से अपने वतन से मोहब्बत करता है और देश की एकता व अखंडता के लिए प्रतिबद्ध था, है और हमेशा रहेगा। हालांकि ‘वंदे मातरम’ के कुछ अंश ऐसे हैं, जिन पर धार्मिक आपत्तियां रही हैं। ऐसे में किसी भी नागरिक को उसके धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध बाध्य करना उचित नहीं होगा।”
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने आगे कहा कि इस विषय पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, ताकि राष्ट्रीय सम्मान और सभी समुदायों के संवैधानिक अधिकार, दोनों सुरक्षित रह सकें। उन्होंने सरकार से अपील की कि देश की विविधता और विभिन्न धार्मिक भावनाओं का ध्यान रखते हुए ऐसा समाधान निकाला जाए, जिससे आपसी सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा हो सके।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने समाज के सभी वर्गों से भी शांति, संयम और जिम्मेदारी के साथ इस विषय पर विचार करने की अपील की।
मेहनत कभी किसी की गुलाम नहीं होती लल्ला,
वक़्त चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो,
अल्लाह तआला मेहनत करने वालों की कोशिश को कभी ज़ाया नहीं फ़रमाता।
जो आज संघर्ष, सब्र और मेहनत के रास्ते पर है,
कल वही अपने किरदार, अख़लाक़ और कामयाबी से इतिहास लिखेगा।
याद रखो —
मेहनत इंसान का फ़र्ज़ है,
और कामयाबी अल्लाह तआला की अता।
— सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
चेयरमैन ग़ौसे आज़म फाउंडेशन
*दीन को कारोबार और रूहानियत को ब्रांडिंग बनाने वालों से सावधान रहना होगा : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि आज समाज को सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि दीन, मज़हब और धार्मिक मंचों को व्यापार, दिखावे और व्यक्तिगत प्रसिद्धि का साधन बनने से बचाया जाए। उन्होंने कहा कि इस्लाम कोई तमाशा व इवेंट नहीं, बल्कि अल्लाह की वह पवित्र अमानत है, जिसकी हिफाज़त के लिए अंबियाए किराम, सहाबा, औलिया और उलमा-ए-हक़ ने अपनी पूरी ज़िंदगियां कुर्बान कर दीं। उन्होंने कहा कि कभी धार्मिक जलसे समाज सुधार, इल्म, अख़लाक़ और इंसानियत की तालीम का माध्यम हुआ करते थे, लेकिन आज कई स्थानों पर वे केवल भीड़, शोर, भावनात्मक उत्तेजना और प्रचार का साधन बनते जा रहे हैं। कुछ पेशेवर तक़रीर करने वालों, नात के नाम पर व्यापार करने वालों और मंच संचालकों ने मज़हबी जज़्बात को कमाई का जरिया बना लिया है।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि दुखद स्थिति यह है कि आज किसी आलिम या वक्ता की कूद्र उसके इल्म, तक़वा और किरदार से नहीं, बल्कि इस बात से की जाती है कि उसके कितने वीडियो वायरल होते हैं, कितनी भीड़ जमा होती है और उसकी कितनी मार्केट वैल्यू है। उन्होंने कहा कि जब दीन से ज़्यादा, ब्रांडिंग महत्वपूर्ण हो जाए, तो समाज का नैतिक पतन शुरू हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि आज कुछ स्थानों पर पीरी-मुरीदी और ख़ानकाही सिलसिलों को भी ब्रांडिंग और दिखावे का माध्यम बना दिया गया है। बड़े-बड़े पोस्टर, अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार, कृत्रिम महिमामंडन और भीड़ जुटाने की प्रतिस्पर्धा ने रूहानियत की सादगी और तसव्वुफ़ की असल रूह को नुकसान पहुंचाया है। सच्चे औलिया और बुज़ुर्गों ने हमेशा ख़ामोशी, अख़लास, तौबा, ख़िदमत और अल्लाह की याद का पैग़ाम दिया, न कि अपनी शख़्सियत का बाज़ारी प्रदर्शन। उन्होंने कहा कि इस्लाम ने दावत व तबलीग़ को कभी व्यापार नहीं बनाया। हमारे अकाबिर बुज़ुर्गों और औलिया ने सादगी, अख़लास और ख़ौफ़-ए-ख़ुदा के साथ दीन की सेवा की। उनकी मजलिसों में शोर नहीं बल्कि असर होता था, दिखावा नहीं बल्कि सुधार होता था।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने अवाम से अपील करते हुए कहा कि वे केवल ऊंची आवाज़, भावनात्मक नारों और सोशल मीडिया प्रसिद्धि को, दीनदारी का पैमाना न बनाएं, बल्कि ऐसे उलमा और दाइयों को आगे लाएं जिनकी ज़िंदगी इल्म, अमल, सादगी और ईमानदारी का नमूना हो। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते समाज ने इस गंभीर संकट को नहीं समझा, तो आने वाली पीढ़ियां, धार्मिक कार्यक्रमों को इबादत नहीं बल्कि एक व्यवसायिक तमाशा समझने लगेंगी, जो पूरी उम्मत के लिए, अत्यंत चिंताजनक स्थिति होगी।
Facts About the Constitution Of India.
* President Has Power To Appoint Chief Election Commissioner And Election Commisioner *
* The Election Of President Held By Election Commission *
There Is A Conflict Of Interest 🙌.
#president#Constitution#ConstitutionOfIndia#politics
80 million people out of 1.2 billion Indians,roughly equal to 6.7% of India's population, lived below the poverty line of $1.25 and 84% of Indians lived on less than $6.85 per day in 2019.
India Has the 5th Largest Economy In The World
* 2019-2023 Economy Same*
Is That Possible?
India Is A Country Of Secularism.
Maintaining Peace In India Is A Part Of Culture. This Graph Shows The Religion Hate Crime In India From 2009-2018. 2014❓-2023❓.
*(The Role Of Indian Government)* #Trending#trend
The Legal System Of India Consists Of Civil Law,
Common Law,Customary law, Religious law and Corporate law. Murder Of Atiq Proved That,
In Now Days Era The Value Of Legal System Is Void.
*Extremist Kill Many People In The Name Of Religion.*
Peace Will Convert Into Violence.
#Atiq
The Legal System Of India Consists Of Civil Law,
Common Law,Customary law, Religious law and Corporate law. Murder Of Atiq Proved That,
In Now Days Era The Value Of Legal System Is Void.
*Extremist Kill Many People In The Name Of Religion.*
Peace Will Convert Into Violence.
#Atiq