रात भर उम्मीद जागती रही, सुबह ने आकर बस इतना कहा—"आज भी नहीं।" अब मैं सूची का नहीं, अपने ही टूटते हुए विश्वास का इंतज़ार कर रहा हूँ। कितना अजीब है कि किसी और की मेज़ पर रुकी एक फ़ाइल, किसी के भीतर पूरे जीवन को ठहरा देती है।
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मैं चल रहा हूँ पाँवों में छाले हैं, मन में संशय भी है; पर यात्रा जारी है क्योंकि अब यह केवल किसी पद,परीक्षा या किसी उपलब्धि का प्रश्न नहीं रहा यह उस वचन का प्रश्न है,जो मैंने एक दिन अपने अंतःकरण से किया था परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठोर हों,मैं अपने स्वप्न से विश्वासघात नहीं करूँगा
जो सफल नहीं हुए और जिन्हें नौकरी नही मिली,
वो ख़ुद को साबित करने में लगे हैं
उन्हें लगता है नौकरी मिलते ही
सब सही हो जाएगा
और जिन्हें मिल गई है,
वो नौकरी की उलझनों में फसें हैं
हकीकत तो ये है कि संघर्ष कभी ख़त्म नहीं होता,
बस उसका रूप बदल जाता है।
प्रतिशोध एक कृष्ण विवर है—
जो न्याय की खोज में जन्म लेता है, पर धीरे-धीरे विवेक का प्रकाश भी निगलने लगता है।
उसका गुरुत्व जितना शत्रु को बाँधता है,
उतना ही प्रतिशोधी को भी उसकी परिक्रमा में कैद कर देता है।"। #2YearsOfMajhiGovt#anthuriumnoida#12YearsOfYuvaShakti#शिखर_सम्मेलन