बीरभूम के आदित्यपुर गांव में छवि साहा पुराने अख़बारों से पैकेट/लिफ़ाफ़े बनाती हैं और उन्हें स्थानीय दुकानों में बेचती हैं. मगर हाल में अख़बारों की ख़रीद में आई गिरावट से 75 वर्षीय छवि निराश हैं.
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महाराष्ट्र में छोटे सहकारी बैंकों को राजनीतिक आकाओं के दबाव में बड़े-बड़े असुरक्षित ऋण देने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि छोटे क़र्ज़दारों के साथ धोखाधड़ी की जा रही है. पेश है एक खोजी रिपोर्ट
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#pariinhindi
"अगर घुंघू पहनकर जंगल जाओ, तो कभी आप पर बिजली नहीं गिरेगी.” घुंघू एक तरह का छाता है, जिसे मालू (फनेरा वाहली) नाम के पौधे की पत्तियों से बनाया जाता है. यह बेल इस इलाक़े में आमतौर पर पाई जाती है.
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घरेलू गैस (एलपीजी) के संकट ने कचरा बीनने वालों का आर्थिक जीवन पटरी से उतार दिया है. वे सोचने को मजबूर हो गए हैं कि लकड़ी के जो टुकड़े वो इकट्ठे करते हैं उन्हें बेचें या उनसे चूल्हा जलाएं
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"जब हमें जलाने को कबाड़ नहीं मिलता, तो खाना पकाना मुश्किल हो जाता है." तब वो रस्सियों का और अपने अस्थायी घर में लगे सामान और बल्लियों को खोलकर उन्हें इस्तेमाल करते हैं.
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ज़ुबैदा कहती हैं, "हम रस्सियां काटते हैं और कुछ बल्लियां निकाल लेते हैं. उन्हें [ईंधन की तरह] इस्तेमाल करके थोड़ा चावल पकाते हैं." वह ध्यान रखती हैं कि सिर्फ़ कुछ ही सहारे (बल्लियां) हटाएं.
पंजाब के तरन तारन ज़िले में फलों के बाग़ों की रखवाली का ज़िम्मा सूरज बहरदार जैसे प्रवासी मज़दूरों पर होता है. काम के बारे में कोई जानकारी न होने के बावजूद 15 साल का यह किशोर बिहार से यहां आया था और बेहद ख़राब परिस्थितियों में काम करने को मजबूर था.
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भूख के आगे इस दिल का क्या मोल…
यह कहानी पंजाब के तरन तारन ज़िले के पट्टी क़स्बे की एक दलित महिला की है, जिसे इस बुढ़ापे में अपना पेट पालने के लिए जानवरों का बाड़ा साफ़ करना पड़ता है.
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डीज़ल की राशनिंग, घबराहट में ईंधन की ख़रीदारी और पेट्रोल पंपों पर लगी लंबी लाइनें महाराष्ट्र के अनेक ज़िलों में खेती-बाड़ी को बाधित कर रही हैं. सबसे अधिक मार छोटे किसानों पर पड़ रही है और उनमें से कुछ फिर से बैलों की मदद से खेती करने लगे हैं.
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‘नमक-तेल भी हमारे लिए विलासिता की चीज़ है’
यह साल 2026 है, लेकिन भुखमरी ने पश्चिम बंगाल के इस आदिवासी समुदाय का पीछा अब भी नहीं छोड़ा है. इस समस्या को दर्ज करने के लिए एक फ़ोटोग्राफ़र यहां फिर से लौटा है.
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बिहार के भोजपुर ज़िले में रहने वाली राधा देवी एक ऐसे दौर को याद करती हैं जब राज्य में बड़े पैमाने पर भेड़-पालन का काम हुआ करता था, ऊन का उत्पादन अपने शिखर पर था और कंबल बुनाई का काम आजीविका का महत्वपूर्ण साधन था.
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एक पत्रकार राजस्थान के थार मरुस्थल के एक गांव में मेघवाल परिवार के साथ बिताए समय की झलक दिखलाने के साथ-साथ वहां बदलती जल तथा जलवायु परिस्थितियों को भी दर्ज करता है.
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भारत में आज भी दुनिया के सबसे ज़्यादा कुष्ठ रोगी पाए जाते हैं. कश्मीर के श्रीनगर की बहरार कुष्ठ रोग बस्ती राज्य भर के रोगियों का इकलौता ठिकाना है.
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“वेण्डा,” जब हमने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने तमिल में जवाब दिया. कुछ पल तक समझ में नहीं आया कि वे अपना नाम बता रही हैं या जवाब देने से मना कर रही हैं. दरअसल ‘वेण्डा’, तमिल शब्द वेण्डाम का छोटा रूप है, जिसका अर्थ होता है – ‘अवांछित’.