फिल्में कम ही देखता हूं, लेकिन कल देर रात एक फिल्म देखी, मिर्जापुर. हालांकि औपचारिक डिस्क्लेमर लगा था कि उसका वास्तविक घटनाओं-पात्रों से कोई लेना-देना नहीं है. फिर एक बड़े फिल्मकार की बात याद आई कि ‘(सिनेमा) एक आईना है जो समाज को प्रतिबिंबित करता है.’ जैसलमेर, जहां यादवों की आबादी नगण्य है, वहां का बब्बन यादव नशीले पदार्थों का कारोबारी दिखाया गया और उत्तर प्रदेश में करीब दस साल से कोई यादव मुख्यमंत्री नहीं है वहां एक यादव मुख्यमंत्री को माफियाओं से पैसे लेते दिखाया गया. और फिल्म में दिखाए गए ब्राह्मण माफिया की अगली पीढी के तीन चेहरों को विजेता की तरह दिखाया गया है. मुझे समझ नहीं आया कि कथाकार क्या कहना चाहते हैं. -- जैसा मैंने पहले कहा, मैं सिनेमा कम देखता हूं और कोई समझ भी नहीं है. और हां, मेरा उपनाम कुछ भी हो, मैं अपने को पत्रकार के सिवा कुछ नहीं मानता.
लखनऊ: यूपी बोर्ड का बड़ा आदेश
सिर्फ अधिकृत किताबों से ही पढ़ाई होगी
सत्र 2026-27 में अनधिकृत पुस्तकों पर सख्त कार्रवाई तय
इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम के तहत जारी हुआ सख्त निर्देश
कक्षा 9-10 के लिए अंग्रेजी, गणित, विज्ञान की किताबें अनिवार्य
कक्षा 11-12 के 36 विषयों की अधिकृत पुस्तकें लागू
एनसीईआरटी की 70 किताबें पूरे प्रदेश में प्रचलन में लाई गईं
हिन्दी, संस्कृत और उर्दू की 12 चयनित पुस्तकें भी शामिल
सभी स्कूलों में पुस्तक जागरूकता शिविर होंगे आयोजित
जिला व मंडल स्तर के अधिकारियों को सख्त निगरानी के निर्देश।
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मैंने पुनः 26/07/24 को शिकायत (Complaint no. is MV26072408463) दर्ज कराया है, फिर से 06 घंटे में समाधान के लिए बोला गया।
हमारे समस्त ग्रामवासी जानना चाहते हैं कि ये 06 घंटे कब तक होंगे?
कृपया मामले का संज्ञान लें, ताकि लोगों को इतनी असुविधा का सामना न करना पड़े।
24/07/24 को हेल्पलाइन न पर शिकायत (Complaint no. is MV24072410040) करने पर 06 घंटे में निवारण के लिए बोला गया, जिसको एरिया के जेई/एसडीओ महोदय द्वारा बिना समाधान किए क्लोज कर दिया गया है।
आज मैंने पुनः शिकायत (Complaint no. is MV26072408463) दर्ज कराया है, फिर से 06 घंटे में समाधान के लिए बोला गया।
मैं जानना चाहता हूं कि ये 06 घंटे कब तक होंगे?
कृपया मामले का संज्ञान लें, ताकि लोगों को इतनी असुविधा का सामना न करना पड़े।
24/07/24 को हेल्पलाइन न पर शिकायत (Complaint no. is MV24072410040) करने पर 06 घंटे में निवारण के लिए बोला गया, जिसको एरिया के जेई/एसडीओ महोदय द्वारा बिना समाधान किए क्लोज कर दिया गया है।
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मोदी के विश्वगुरु भारत में शायद यह लोग शामिल नहीं हैं.. इनके मुद्दों की कोई कीमत नहीं है? क्या आप लोगों के लिए यह एक मुद्दा है या फिर केवल मछली के ही मुद्दे पर आप मतदान करेंगे?
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मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पाँवों चलता हूँ
मैं असभ्य हूँ क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूँ
मैं असभ्य हूँ क्योंकि चीरकर धरती धान उगाता हूँ
मैं असभ्य हूँ क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूँ
आप सभ्य है क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर
आप सभ्य है क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर
आप सभ्य है क्योंकि धान से भरी आपकी कोठी
आप सभ्य है क्योंकि जोर से पढ़ पाते हैं पोथी
आप सभ्य है क्योंकि आपके कपड़े स्वयं बने हैं
आप सभ्य है क्योंकि जबड़े खून सने हैं
आप बड़े चिंतित है मेरे पिछड़ेपन के मारे
आप सोचते हैं कि सीखता यह भी ढंग हमारे
मैं उतारना नहीं चाहता ज़ाहिल अपने बाने
धोती-कुरता बहुत ज़ोर से लिपटाये हूँ याने!
- भवानी प्रसाद मिश्र
सिनेमा हॉल में देखिये, फिल्म का आखिरी सीन चल रहा है लगता है कि अब दो-चार मिनट में फिल्म ख़तम हो जायेगी, लोग एग्जिट के पास जाकर खड़े हो जाते हैं, फिल्म ख़त्म होते ही ऐसे भागते हैं जैसे अब तक जेल में थे.
ट्रेन अगर अपने गंतव्य पर पहुँचने वाली हो तो लोग पंद्रह मिनट पहले सामान लेकर खानदान सहित दरवाजे पर ऐसे लद जाते हैं कि ट्रेन क्या पता रुके न रुके, धीमी होते ही बीवी बच्चों समेत कूद जाना है.
अभी कुछ दिन पहले मैंने देखा, ओपन एयर थिएटर में क्लासिकल म्यूजिक का प्रोग्राम था. लोगों को पता चल गया था कि ये आखिरी परफोर्मेंस है तो दस मिनट पहले कुछ कद्रदान ये कहते हुए निकल गए कि बाद में पार्किंग में भीड़ हो गयी तो गाडी फँस जायेगी, निकल लेते हैं.
हमारे जीवन से धैर्य, तसल्ली, पेशेंस कहाँ चला गया?
रील्स का जो ये ज्वालामुखी फटा है ये यही तो बता रहा है कि हम तीन मिनट का वीडियो भी शांति से नहीं देख सकते. हमें जानने की जल्दी तो है, सब कुछ जानना है लेकिन उसे समझने का धैर्य नहीं है. OTT वगैरह पर एक नया आप्शन पैदा हुआ है जो वीडियो की गति बढ़ा देता है, 1x, 1.5x, 2x. यानी अगर आप दो घंटे की एक फिल्म 2x स्पीड में देखेंगे तो वो जल्दी चलकर एक घंटे में ख़त्म हो जायेगी. उन्हें ये आप्शन देने की ज़रूरत इसीलिए ही तो पड़ी होगी कि कुछ लोग इस तरह फिल्म देख रहे होंगे.
सोचिये आप ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का सलीम-अनारकली का प्रणय सीन देख रहे हैं बैकग्राउंड में तानसेन गा रहे हैं. अब इसे 2x स्पीड में देखिये तानसेन तो हनी सिंह लगेंगे और सलीम-अनारकली टॉम एंड जेरी.
हमने अपनी जिंदगी से ठहराव खो दिया है. अब हम रुक कर नहीं सोचते. थम कर उस गाने को पूरा नहीं सुनते जो हमारी आत्मा तक पहुँचने की कुव्वत रखता है. ‘साहिब बीवी और गुलाम’ जैसी क्लासिक फिल्म हमें स्लो लगती है. हम एक पांच सौ पेज की किताब नहीं पढ़ना चाहते इसलिए फेसबुक पर मैगी लेखकों का उदय हो रहा है जो आपको मोटी-मोटी किताबों में से कुछ उत्तेजक हिस्से निकाल कर पेश कर देते हैं और आपको लगता है हमने सब कुछ जान लिया. कहते हैं God is in the details लेकिन God को भी कहाँ पता था कि डिटेल्स जानने की फुर्सत लोगों के पास रहेगी नहीं. किताबें तो बहुत दूर की बात रही लोगों के पास इतना धैर्य नहीं बचेगा कि वो एक तीन पेज की फेसबुक पोस्ट पढ़ पायें. वैसे तो ढाई पेज की चेखव की ‘वांका’ पढ़ना ही काफी है अगर हम वांका के दर्द को महसूस कर पायें तो.
तसल्ली से एक बार थम कर, रुक कर, ठहर कर सोचिये कि ये जो जल्दी दिखा कर आप समय बचा रहे हैं इसका आप क्या उपयोग करने वाले हैं? ज़रा सोचिये कि ये जो जल्दी दिखा कर आप खो रहे हैं उसकी कीमत क्या है? सूचनाओं का ये अम्बार जो हमारे दिमाग में सतत खलल मचाये हुए है वो हमें कहीं रुकने नहीं दे रहा है. एक तीन पेज की कविता पढ़कर उसको अपनी आत्मा तक पहुँचने देना और फिर उससे एक बेहतर संवेदनशील इंसान बनकर निकलने का वक़्त नहीं है हमारे पास.
आपको और मुझे रुकने की ज़रूरत है. सब कुछ जानना हमारे लिए ज़रूरी नहीं है. हमारे पास वक़्त की कोई कमी नहीं है. हमने जो ये शिगूफा छेड़ रखा है ना कि टाइम नहीं है. ये बकवास बात है. बहुत वक़्त है हमारे पास, इसलिए रुकिए, ठहरिये और बैठ जाइए. सिनेमा हॉल से भागने की ज़रूरत नहीं है, ट्रेन से कूद कर कहीं नहीं जाना है, रिमोट को एक तरफ रखकर फिल्म को देखना है और किसी अच्छी किताब के दो पेज पढ़कर रूककर सोचना है कि क्या पढ़ा. क्षणों को अपने अन्दर आत्मसात नहीं किया तो रोबोट बन जायेंगे. बन क्या जायेंगे बन ही रहे हैं.
- किशोर कुमार की पोस्ट
उनके पांव में जूता महंगा
तेरी टूटी चप्पल है
उनके चारों ओर सुरक्षा
तुझको ख़तरा हरपल है
उनकी थाली हेल्थ कांशियस
तेरी जूठी पत्तल हैं
तू उनके चक्कर में आया
जीवन चक्कर खाएगा
उनके बच्चे सूट पैंट में
तेरे पकड़े पिस्टल हैं
राम नाम है उनका धंधा
तू क्यों गाहक बन बैठा
उनको मिलता वोट-इलेक्शन
तू किस बात पे तन बैठा
उनका बिज़नेस खड़ा किया
और ख़ुद लड़खड़ा के जा बैठा
तू बिक गया है बिना भाव के
और वो बेच वतन बैठा
उनके प्याले लब-लब करते
तेरे घर सूखे नल हैं
उनके बच्चे हैं विदेश में
तेरे पकड़े पिस्टल हैं
अपने घर फ्लड लाइट जलाकर
तेरे बल्ब वो ले भागे
तू घर-घर में आग लगाता
नफ़रत से ख़ुद को दागे
तेरी शिक्षा, तेरी रोज़ी, तेरा हक
तू भूल गया
बच्चा तेरा गाय बचाने निकला
फिर न स्कूल गया
उनके घर में मोर नाचता
तेरे कट गए जंगल हैं
उनके बच्चे करें आईपीएल
तेरे पकड़े पिस्टल हैं
- मयंक
सबसे बड़ा झूठ है कि चैनलों में डिबेट ऐंकर ज़्यादा काम करता है। उसके जितना कम काम पूरे चैनल में कोई नहीं करता। वह चाहे तो एक ही कपड़े में साल भर ऐंकरिंग कर सकता है, कपड़े से पसीने की बू तक नहीं आएगी। कम लागत, कम काम के लिए ही है डिबेट शो। बस चार फ़ालतू लोग शहर में होने चाहिएँ।
"आदमी और कुत्ता"
देश की अंतिम भुजा के हाथ में रोटी नहीं
दिल तुम्हारा जानता है बात ये छोटी नहीं
फिर भी होंठों पर तुम्हारे एक ताला है बंधा
कौनसा चाबुक तुम्हारी आत्मा पर है सधा
जो तुम्हें निष्ठुर बना दे वो कोई निष्ठा नहीं
आदमी हो तुम किसी का भौंकता कुत्ता नहीं