बिहार के जमुई में एक नाबालिग छात्रा और उसके मित्र के साथ छेड़खानी एवं अभद्र व्यवहार की घटना मानवता को शर्मसार करने वाली है। आरोपियों द्वारा इस अमानवीय कृत्य का वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर वायरल करना बिहार के उस जंगलराज का उदाहरण है, जहां अपराधी बेखौफ हैं और कानून का कोई भय दिखाई नहीं देता।
@officecmbihar आरोपियों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे कि भविष्य में कोई भी व्यक्ति ऐसी घटना को अंजाम देने के बारे में सोचने से पहले कानून के डर को महसूस करे। साथ ही, पीड़ित नाबालिगों की सुरक्षा, गरिमा और निजता सुनिश्चित की जाए।
चीटिंग क्या होती है समझना है तो समझिए AIIMS के इस केस से, जब सालों साल तक चुन चुनकर दलित छात्र-छात्राओं को फेल किया जा रहा था।
मुंगेरकर कमेटी बैठी,जांच हुई तो पता चला जाति के हिसाब से फेल किया गया और कोर्ट ने न सिर्फ पास किया सबको 10 लाख कंपनसेशन दिलवाया।
प्रतापगढ़ में 22 वर्षीय दलित युवक अर्जुन गौतम की पुलिस हिरासत में मौत हो गई
पुलिस के मुताबिक़ पूछताछ के दौरान अर्जुन भागते हुए कोतवाली के बाथरूम में गया और कंबल से फांसी लगा लिया
#DalitLivesMatter
एससी छात्रो को एट्रोसिटी Face करना परिवार को सिखाना चाहिये। कोई एससी छात्र संस्थान में एट्रोसिटी के कारण अत्यंत तनाव में है और आत्महत्या के विचार आ रहे है तो मुझे Inbox करे या आसपास के कट्टरवादी अम्बेडकर संस्थान/व्यक्ति से सम्पर्क करें।
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आईआईटी मुम्बई में एक दलित छात्र साहिल वाकोडे ने आत्महत्या कर ली, बीटेक दूसरे साल के इस छात्र के माता पिता ने आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर सूर्यनारायण डुल्ला और अन्य अधिकारियों पर जातिसूचक गालियां देने और प्रताड़ित करने का गंभीर आरोप लगाया है । आईआईटी मुम्बई तुंरन्त अपने अधिकारियो के बचाव में आकर कह रही है कि;
"छात्र जीपीटी चैट से परीक्षा में आंसर खोज रहा था"
वाह मुंन्ना। बचाव भी ऐसा करा की हजम नही हुआ।
1.परीक्षा देने से पहले बीए से लेकर एमबीए तक के छात्र की तलाशी होती है या बार बार कह दिया जाता है कि किसी के पास।मोबाइल हो तो रख दो और इंहा छात्र मोबाइल लाकर चैट जीपीटी पर आंसर खोज सकता है। भाई बात कुछ जमी नही है।।
2.परीक्षा दे रहे अन्य छात्रो ने इसकी पुष्टि शुरू से ही नही करी।। अबे मिस्टर इंडिया के अनिल कपूर की गायब होने वाली घड़ी पहनकर छात्र परीक्षा दे रहा था क्या, जो अन्य इस घटना को देख नही पाए।
3.चलो मान लिया चीटिंग करते पकड़ा गया। उंसके बाद आपने उंसकी कॉपी पर काहे नही लिखा। क्या आपने गाल पर प्यार भरा थप्पड़ मारकर कह दिया कि चल कोई बात नही और इससे वो आहत होकर आत्महत्या कर गया। तुम यह बताओ कि अगर वाकई चीटिंग करते हुए पकड़ा गया तो आपने किस स्तर तक उसे harrash किया। आत्महत्या करना हर किसी के बस की बात नही है। Harrash होने की एक बहुत गम्भीर सीमा को पार करने के बाद ही कोई यह कदम उठा सकता है। ।
4.अनुसुचित जाति के परिवारों को शुरू से अपने बच्चों को बतानां चाहिए कि;
A. हर दूसरा व्यक्ति आपसे एट्रोसिटी करने के लिए तैयार बैठा है।
B. ऐसी स्तिथी में आपको मजबूत बनना है। इतना मजबूत की "आत्महत्या" का विचार एक प्रतिशत भी दिमाग मे न आये।
C. अनुसुचित जातीयो के नौकरी पेशा करने वाले परिवारों की समस्या यह है कि वो;
"समाज से कटते है। समाज मे जाते नही। बच्चो को लेकर जाते नही। अधिकतर Pay back to Society के अंतर्गत बाबा साहब जयंती तक कर कार्यक्रम में न तो हिस्सा लेते और न ही चन्दा देते है"
लेकिन उनका बच्चा जब आरक्षण से कोर्स करने जाता है तो सबको पता लग जाता है कि आरक्षित शीट पर वो आया है, चूँकि उसका अनुभव परिवार से सामाजिक नही रहा तो जब उसके साथ एट्रोसिटी होती है तब वो झेल नही पाता।
5.बचपन मे 7वी में मुझे कुछ बनिया-जैन के बच्चे परेशान करते थे, में रोजाना अपने भाई के सामने रोता था। मेरे भाई जो कि ग्रुप ए अधिकारी ने कहा कि उनका सर फोड़कर आ जाना, बाकी में देख लूंगा। मनोबल मिल गया। अगले दिन एक के सर पर ईंट बजा दी जिससे 5 अन्य डर गए। उंसके बाद किसी ने मुझे नही छेड़ा।
6.समझे अनुसुचित जातीयो के छात्रो। पहले से ही एट्रोसिटी को Face करने के लिए तैयार रहा करे। ज्यादा हो , मतलब इस स्तर का की आत्महत्या के विचार आ रहे हो तो आत्महत्या की जगह हिंसक सँघर्ष के लिए तैयार रहे, अब चाहे प्रोफेसर ही क्यो न हो।।और इंहा ध्यान रखना;
"जब ऐसा कुछ विवाद होता है तो सामने वाला पहले डरता है क्योंकि उसकी एटॉसिटी की हरकतें कोर्ट तक जाएगी, यह सोचकर उसका एट्रोसिटी करने का मन ढीला होता रहता है।
कोई अनुसुचित जाति का छात्र आगे अपने संस्थान में इसे face कर रहा है और काफी तनाव में है तो मुझे इनबॉक्स करे। हम उसका मोरल भी बढ़ाएंगे और उंसके आसपास के मिशनरी अम्बेडकरवादियो से उसे कनेक्ट भी करवाएंगे। लेकिन आत्महत्या के विचार मन मे न लाये।
विकास कुमार जाटव
@Mayawati@AnandAkash_BSP
1. आज मेरा पुनः पार्टी के लोगों से यही कहना है कि मेरे ख़ुद के अनुभव को मद्देनज़र रखते हुये यदि इनको राजनीति में कामयाब होना है और समाज के लिए कुछ करना है तो उन्हें मेरी तरह अपने भाई-बहिनों व नज़दीकी रिश्ते-नातों आदि के मोह से ऊपर उठकर अपनी पूरी ईमानदारी व निष्ठा से कार्य करना है,
* इसीलिए बी.एस.पी. के जन्मदाता एवं संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी ने राजनीति में आने के बाद, फिर अपने सभी नज़दीकी रिश्ते-नातों आदि को राजनीतिक लाभ देने से हमेशा दूर रखा है। उन्हें केवल निःस्वार्थ भावना से पार्टी संगठन में कार्य करने की ही इजाज़त दी है। इतना ही नहीं बल्कि इन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी, अपना ख़ुद का परिवार ना बनाकर, ’बहुजन समाज’ के हित व कल्याण के लिए ही समर्पित की है।
2. जिनसे प्रेरित होकर फिर मैंने भी उन्हीं के ही पदचिन्हों पर चलने का फैसला लिया और अपनी पूरी ज़िन्दगी ’बहुजन समाज’ के लिए समर्पित कर दी है।
* लेकिन मैं एक लड़की होने की वजह से फिर मजबूरी में मुझे अपने किसी ना किसी भाई-बहिन आदि को हमेशा अपने साथ रखना पड़ा है, जिसके तहत् ही मेरा छोटा भाई श्री आनन्द कुमार यह पिछले काफी वर्षों से मेरी सेवा में कार्यरत है।
3. और इनके विशेष आग्रह करने पर फिर इनके परिवार में से मुझे इनके बड़े बेटे श्री आकाश आनन्द को राजनीति में आगे करना पड़ा है।
* जिनकी शादी होने के बाद से अब श्री आकाश आनन्द का क़दम-क़दम पर ऐसा रवैया व गतिविधियाँ आदि रही हैं कि जिसकी वजह से अभी कुछ दिन पहले फिर से इनको पार्टी से अलग भी करना पड़ा है।
* अर्थात् अब वह अपने ससुर श्री अशोक सिद्धार्थ के जंजाल में पूरी तरह से फंस चुके हैं, जिसे अब पार्टी में वापिस लेना यह पार्टी के लिए बहुत बड़ा विश्वासघात ही होगा, जो मैं यह पार्टी विरोधी ग़लत कार्य कदापि नहीं कर सकती हूँ।
4. ऐसे में अब मैं श्री आनन्द कुमार के परिवार में से किसको पार्टी में आगे करूँ या ना करूँ, यह मेरे लिए पिछले कुछ समय से काफी दुविधा सी बनी हुई है, जिस पर विराम देते हुए अब मैंने हर पहलू पर काफी गम्भीरता से सोच-विचार करने के बाद यह फैसला लिया है कि इनके परिवार में से ऐसे किसी सदस्य को अब पार्टी में आगे किया जाये, जो आकाश के नक्शेकदम पर बिल्कुल भी ना चले।
5. और जहाँ तक आगे चलकर, इनकी बेटी की मदद लेने का सवाल है तो इनकी शादी होने के बाद, फिर इनका मामला भी यदि श्री आकाश आनन्द की तरह ही निकल गया तो यह भी पार्टी हित में सही नहीं होगा।
* ऐसी सम्भावना को भी ध्यान में रखकर अब पार्टी हित में यही उचित होगा कि श्री आकाश आनन्द व इनकी बहिन को भी अब पार्टी की कोई भी ज़िम्मेवारी देने से इन दोनों को एकदम दूर रखा जाये अर्थात् अब इनके इस फैसले में कोई भी फेरबदल नहीं किया जायेगा।
6. और अब इन दोनों के स्थान पर श्री आनन्द कुमार के परिवार में से केवल श्री ईशान आनन्द को ही, पार्टी में सम्मानजनक ज़िम्मेवारी देकर इनको आगे किया जायेगा, जिसका श्री आकाश आनन्द व इनकी बहिन की तरह कभी भी कोई चक्कर नहीं रहेगा। अभी तक ऐसा ही लग रहा है। आगे तो कुछ भी नहीं कहा जा सकता है
7. फिर भी यदि इन्होंने पार्टी विरोधी ऐसा कोई भी गम्भीर कृत्य किया तो फिर इनको भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा, लेकिन तब ऐसी स्थिति में श्री आनन्द कुमार के परिवार में से अन्य किसी भी सदस्य को पार्टी की कोई भी छोटी-बड़ी ज़िम्मेवारी नहीं दी जायेगी।
* बल्कि इसके स्थान पर, तब फिर पार्टी में ही कार्यरत दलित वर्ग के किसी भी एक मिशनरी व वफादार कार्यकर्ता को ही आगे कर दिया जायेगा। इसलिए देश व जनहित के ज़रूरी मुद्दों के साथ-साथ इस ख़ास मुद्दे को भी लेकर अब दिनांक 23 सितम्बर की बी.एस.पी. की अत्यन्त ज़रूरी ऑल-इण्डिया की बैठक बुलाई गई है ताकि फिर पार्टी के लोग अपनी पार्टी के कार्यों में पूरे जी-जान से जुट जायें।
8. अन्त में अब मैं यही कहना चाहती हूँ कि ख़ासकर परिवार को लेकर पार्टी व मूवमेन्ट के हित में मैंने यह फैसला मान्यवर श्री कांशीराम जी से प्रेरित होकर तथा परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर जी के भी लिखे गये एक पत्र से प्रभावित होकर लिया है, जिस पत्र का सारांश इस प्रकार से है:
9. बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने, दिनांक 23 फरवरी सन् 1956 को 26 अलीपुर रोड, सिविल लाइन्स, नई दिल्ली से बम्बई में अपने पुत्र श्री यशवन्त बी. अम्बेडकर को पत्र में लिखा है कि,
* मुझे तम्हें सूचित करना है कि श्री उपशम के कई पत्राचार मिले हैं कि तुम उन्हें बौद्ध भूषण प्रिन्टिंग प्रेस के एकाउण्टेन्ट व कैशियर के रूप में उनकी ड्यूटी नहीं करने दे रहे हो।
* तुम्हें ऐसा लगता है कि ऐसा करके तुम प्रेस को अपने कब्जे में ले लोगे। मैं तुम्हें आगाह कर रहा हूँ कि प्रेस पब्लिक प्रापर्टी है, ना तुम्हारा है और ना मेरा, और एक पब्लिक अकाउण्ट में किसी भी प्रकार की अनियमितता की अनुमति देना संभव नहीं है।
* तुम्हारा आचरण उचित नहीं रहा है...अगर तुमने मेरी अन्तिम व फाइनल निर्देश की परवाह नहीं कि तो फिर मैं तुम्हें प्रेस से निकाल-बाहर करूंगा और इस चेतावनी के नहीं मानने पर फिर मैं आपके विरुद्ध अभियोजन (मुक़दमा) (prosecute) भी करूंगा।
10. संक्षेप में अब मैं अपने ख़ुद के बारे में भी यही कहना चाहती हूँ कि समस्त ’बहुजन समाज’ ही मेरा असली परिवार है तथा सत्ता की मास्टर चाबी के ज़रिये ही उन्हें ’शोषित से शासक वर्ग’ बनाकर उनका हित व कल्याण सुनिश्ति करना ही मेरा मिशनरी लक्ष्य व मेरी प्रतिज्ञा भी है, जिसके लिए मैं अपने भाई-बहिनों आदि के ख़िलाफ भी किसी भी हद तक जा सकती हूँ, जैसाकि बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने उदाहरण पेश किया, यही मेरा भी संकल्प है।
रसड़ा के लोकप्रिय बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के घर पर क्षेत्र की जनता की समस्याओं को लेकर जनता का लगाया जाता है लेकिन आज उमाशंकर सिंह जी इस दुनिया में नहीं हैं मगर उनके पुत्र युकेश सिंह विधायक जी के पद चिन्हों पर चलने का काम कर रहें हैं उनके बताए मार्ग पर चल रहे हैं।
आज एक विकलांग व्यक्ति अपनी समस्या को लेकर दिवंगत विधायक उमाशंकर सिंह जी के आवास पर पहुंचा तो उमाशंकर सिंह जी के पुत्र यूकेश सिंह ने उस दिव्यांग व्यक्ति को सोफे पर बिठाया और ख़ुद ज़मीन पर बैठकर उनकी समस्या सुन रहे थे।
जनता का सेवक किसे कहते हैं? यह आप इस तस्वीर में देख सकते हैं और अगर ऐसा जनसेवक हो तो वहाँ की जनता अपने नेता पर उंगली नहीं उठा सकती।
भागो, कँहा तक भागोगे, हर जगह हम है।
अब कोर्ट ने राज्य सरकार के चार मेडिकल कॉलेज में एससी/एसटी के विशेष आरक्षण पर रोक लगा दी है। यह अच्छी बात है कि अधिकतर मेडिकल कॉलेज में एससी/एसटी के अधिकतर बच्चो ने पहली कॉउंसलिंग में एडमिशन ले लिया है, जिसपर कोई नेगेटिव निर्णय पास नही हुआ। लेकिन इसपर नजर रखनी जरूरी है क्योंकि कभी विरोधी अन्य जगह इन्हें घटा दे।
वैसे न्यायालय के आदेश पर कोई आश्चर्य नही है क्योंकि राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में पैरवी न करने व बिना अध्यादेश लाए इसे जांरी किया था। बल्कि बताया जा रहा है कि सुनवाई के समय राज्य सरकार का अधिवक्ता तक कोर्ट में नही था।
अब सीधी बात है कि;
1.राज्य सरकार पर दवाब डाले।
2.अपनी सरकार बनाये।
तभी मामला जड़ से हल होगा। डॉक्टर्स की एसोसिएशन ने काफी बेहतरीन तरीके से इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ी है। उन्होंने Pay back to Society काफी बेहतरीन तरीके से इस मामले में की है, जिससे समाज के लोगो मे फैली नकारात्मक छवि की आरक्षण से एमबीबीएस या अन्य कोर्स करके समाज को भूल जाते है का कॉउंटर इस घटना ने किया है। जिनका जमीर, मनोबल जिंदा है वो उस समाज के साथ खड़ा है जिसके प्रतिशत पर आरक्षण लेकर सफल हुआ है।
वैसे;
यह मामला सामने है इसलिए पता लग रहा है। ऐसे 50 केस में एससी/एसटी का आरक्षण खत्म कर दिया गया है।
क्यो?
क्योंकि उसका विरोध करने के लिए उंसकी जानकारी होनी चाहिए।।एससी/एसटी के अधिकतर सन्गठन व व्यक्ति इनपर ध्यान नही रखते है। ध्यान जाएगा, तभी विरोध करेंगे।
अधिकतर मामलों में हमारा ध्यान गया, लेकिन दिक्कत यह है कि;
जो बोले, वो खर्चा भी करे"
इसलिए ढीली होती जेब के कारण अधिकतर मामलों में मुझे चुप रहना पड़ा क्योंकि Pay back to Society में सहयोग केवल कुछ ही देते है।
काफी लम्बी लम्बी फैंकने वाले वायदा करते है फिर जब मामले को आगे बढाने के लिए सहयोग की बात आती है तब सहयोग करते नही, उनसे बार बार मांगने पर व्यक्तिगत तौर पर अजीब लगता है। इसलिए काफी विषय छूट गए, जिसमे एससी/एसटी को राज्य सरकार ने काफी नुकसान पहचाया। इतना है कि;
"सब्स्क्राइब तक नही करते, जिसका मिला कुछ पैसा इन्ही कामो म खर्च होता है"
इसलिये काफी मामले छोड़ने पड़े।।
अब इस मामले गेंद अनुसुचित जातीयो के पास आ गयी है। चुनावी माहौल में उन्हें राज्य सरकार पर दवाब डालकर विशेष कानून अध्यादेश के रूप में पास करवाना चाहिए।
डॉक्टर्स के जो ग्रुप इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ रहे है उनका धन्यवाद।
विकास कुमार जाटव
@Mayawati@AnandAkash_BSP
1. बहुचर्चित सामाजिक न्याय की ज़रूरत व माँग भी यही है कि यूपी सरकार माननीय न्यायालय में यदि इस बात की पुरज़ोर पैरवी करती कि एससी समाज के हित व कल्याण हेतु ’स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान’ के धन से ज़िला सहारनपुर, अम्बेडकरनगर, क़न्नौज व जालौन में बनाये गये मेडिकल कालेजों में एससी वर्ग हेतु अतिरिक्त आरक्षण की व्यवस्था 50 प्रतिशत के सामान्य आरक्षण से अलग है और इस व्यवस्था से स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान की भरपूर उपयोगिता साबित होती है, तो शायद माननीय कोर्ट इस पर ज़रूर सकारात्मक विचार करता और इस पर रोक नहीं लगाता।
2. किन्तु अब जबकि मा. हाईकोर्ट ने इस पर पाबन्दी लगा दी है और मेडिकल दाख़िला भी अब यहाँ इससे प्रभावित है, तो ऐसे में यूपी सरकार तुरन्त मा. सुप्रीम कोर्ट में आपेक्षित राहत के लिये अपील करे तो यह उचित होगा।
जातिवाद का नंगा नाच।
कितनी बेशर्मी से ये समाज में जातिवाद परोस रहे है।
दो फैला रहे है और बाकी प्रचारित कर रहे है।
जबकि बॉटम 10 हज़ार में सबसे कम नंबर पर एडमिशन लेने वाले जनरल वर्ग है।
1. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर अर्थात जीडीपी ग्रोथ के सरकारी दावे को लेकर ज़बरदस्त बहस छिड़ी हुई है, और देश में ख़ासकर अति-महंगाई, अपार ग़रीबी, बेरोज़गारी आदि की मार से पीड़ित आमजनता अचंभित भी है कि वह किस पर भरोसा करे और किस पर ना करे।
2. वैसे इसके सम्बंध में सरकार के आसमान छूते दावे को प्रथम दृष्टया मान लिया जाये तो यह अच्छी बात होगी, किन्तु अगर यह जुगाड़ के आँकड़े हैं तो यह चिन्ता की बात ज़रूर है। इसीलिये जनता में उम्मीद जगाने हेतु सरकार को विश्वसनीय ढंग से यह ज़रूर बताना चाहिये कि इस उच्च विकास दर का क्या लाभ देश की करोड़ों ग़रीब मेहनतकश जनता को मिला है और आगे में इसका क्या लाभ होगा।
3. इतना ही नहीं बल्कि यह मुद्दा आमजनहित से जुड़ा होने के कारण विकास के आँकड़े व दावे दोधारी तलवार की तरह हैं। इसीलिये उन्हें ज़मीनी हक़ीक़त से भी ज़्यादातर आँका जाता है अर्थात् विकास वही सही व उपयोगी जो जनता को भाये यानी जनता के जीवन में समतामूलक परिवर्तन लाये और लोग ख़ुश व खुशहाल बनें।
4. अतः जीडीपी ग्रोथ के आँकड़े व दावे आदि अपनी जगह है, लेकिन विकास की असल हक़दार देश की करोड़ों मेहनतकश जनता को भी इसका लाभ मिलना और उसे इसका महसूस होना भी देश व जनहित में ज़रूरी है, वरना यहाँ के लगभग 140 करोड़ लोग ’धनवान सरकार की ग़रीब जनता’ होने का बोझ लगातार ढोती रहेगी। देश का विकास तभी ’अच्छे दिन’ वाला होगा जब यहाँ की करोड़ों बहुजन मेहनतकश जनता ग़रीबी, बेरोज़गारी व भ्रष्टाचार आदि से मुक्त आत्म-सम्मान का थोड़ा सुखी जीवन जीने योग्य बनेगी।
5. इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आउटसोर्स कर्मचारियों का दोगुना तक मानदेय बढ़ाने तथा 20 लाख लागों को सुरक्षा कवर आदि यूपी आउटसोर्स सेवा निगम की स्थापना के माध्यम से देने के फैसले से कहीं बेहतर होता लोगों को सीधे तौर पर सरकारी नौकरी देना, ताकि यह व्यवस्था अफसरशाही की मनमानी, भ्रष्टाचार एवं शोषण आदि की जंजाल से मुक्त हो।
"चमार हमारे इंहा कुर्सियों पर नही बैठ सकते, यह हमारे गाँव की मर्यादा है"
मामला मध्य प्रदेश के कटनी जिले का बताया जा रहा है।
एक महिला के घर के बाहर दुकान पर समोसा बेचा जा रहा था। रक्षा बंधन कर मौके पर गांव में आये धनीराम चौधरी भी समोसा खाने चला गया। वँहा ग्राहकों के लिए रखी कुर्सी पर वो बैठ गया। अब किसी रेस्टोरेंट में ग्राहक की जाति से क्या लेना देना। लेकिन महिला के गांव की मर्यादा चमार जाति को कुर्सी पर बैठने नही दे रही। इंहा चमार से मतलब एससी की सभी जातीयो से है। क्योंकि महिला ने जाति पूछी तब मना किया। चमार की जगह अन्य एससी का भी होता तब भी इस जाहिल महिला के जाहिल गाँवो की फर्जी मर्यादा उखड़ जाती।।
अब घर से महिला निकलती है, कहती है कि चमार होकर कुर्सी पर न बैठो। हमारे गाँवो की मर्यादा भंग हो जाएगी।।
बाबा साहब इसलिए आह्वान करके गए थर की जितनी जल्दी हो सके गाँवो को छोड़कर शहर का रुख करो। जँहा एक वर्ग पैदा हो जाएगा।
हम ऐसे ही इंटीरियर गाँवो में जाकर Pay back to Society के अंतर्गत अनुसुचित जातीयो के बच्चो की मदद करते है क्योंकि वो बेचारे ऐसे माहौल में पढ़ ले यह ही बड़ी बात है।
विकास कुमार जाटव
@Mayawati@AnandAkash_BSP
1. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अगले छह महीने में (अर्थात विधानसभा आमचुनाव तक) एक लाख युवाओं को सरकारी नौकरी देने की घोषणा हालाँकि विलम्ब से उठाया गया सही किन्तु चुनावी क़दम ज़्यादा लगता है, फिर भी वे नियुक्तियाँ पेपरलीक व भ्रष्टाचार आदि के अभिशाप से मुक्त समय से पूरा हो जायें तो यह सही होगा ताकि यह चुनावी छलावा ना साबित हों, जबकि इसके साथ ही एससी, एसटी व ओबीसी समाज के आरक्षित पदों के बैकलाग पर भर्तियों के बारे में भी सरकारी घोषणा की लोगों को उत्सुकता से प्रतीक्षा है।
2. इतना ही नहीं बल्कि यहाँ 69,000 शिक्षक भर्ती में आरक्षण के नियमों को लेकर इन वर्गों के 6,800 अभ्यार्थी अपनी नियुक्ति के लिये भूखे-प्यासे लगातार आन्दोलनरत हैं, उनके बारे में भी सरकार को पूरी सहानुभूतिपूर्वक ज़रूर सोचना चाहिये, क्योंकि उन्हें वास्तविक राहत सरकार ही दे सकती है।
3. इसके साथ ही, बी.एस.पी. यूपी सहित पूरे देश भर में स्कूली शिक्षा की बदहाल व्यवस्था को समुचित तौर पर बेहतर बनाने की माँग लगातार करती रहती है, किन्तु संभवतः ’जेन-जी’ व ’जेन-अल्फा’ के दबाव में जो थोड़ी अनचाही हलचल सरकारी स्तर पर देखने को मिल रही है वह मामूली ही सही परन्तु स्कूली शिक्षा में सुधार करने की सही नीयत से हो तो यह उचित होगा और इस क्रम में यहाँ लगभग 30 हज़ार जो सरकारी स्कूल बंद कर दिये गये हैं उन्हें दोबारा अच्छे तरीके से सक्रिय करने की व्यवस्था सरकार अविलम्ब करे तो यह भी जनहित में होगा।
4. इसके अलावा, बुजुर्ग महिलाओं को बसों में निशुल्क यात्रा आदि की व्यवस्था से कहीं अधिक महिलाओं को हर क्षेत्र में शोषण, अत्याचार, उत्पीड़न आदि से बचाने के साथ ही महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान व आत्मनिर्भरता के बारे में भी सरकारों को सही नीयत व नीति से कार्य करने की ज़रूरत है।
अकबर के इस भतीजे से मिलिए।
ये गपोड़ी आम्बेडकरवादियों को मुस्लिमों से दूर रहने का ज्ञान देता था। उनके अल्लाह पर भी अभद्र टिप्पणी करता था। अब उन्ही के यहां रिश्तेदारी करने के लिए लार टपका रहा है।
फ्रिंज एलिमेंट : एक लड़के की तरफ इशारा करते हुए कहता है कि यह मेरा दोस्त का रेप भीम आर्मी के लड़कों ने किया और यह प्रेग्नेंट है।
रिपोर्टर : यह कैसे सम्भव है।
फ्रिंज एलिमेंट : तो फिर यह कैसे पॉसिबल है कि 3 हजार साल तक जिन्हें पानी नही पीने दिया उंसकी नश्ल आज भी जिंदा है।।
प्रश्न :इससे क्या साबित हुआ?
उत्तर : आप दुनिया के सबसे हटिया, निम्न मानसिकता, जिनकी बुद्धि का विकास नही हुआ, उंसि सँघर्ष में है। आपके सामने कोई बुद्धिजीवी नही है। बल्कि वो सामाजिक घटिये स्तर के एलिमेंट्स है जो विश्व के मानव अधिकारों के बने मापदंड का 20% भी पूरा नही करते है जो भारत को तो बर्बाद कर रहे है, विदेश में जाकर अपनी हरकतों से भारत का नाम बदनाम करते है। इस प्रकार के फ्रिंज एलिमेंट्स आपके विपक्ष में खड़े है।।
में यह नही कहता की पूरी जाति ऐसी है। लेकिन अधिकतर उनमे से इसी मानसिकता के है। जो सही है वो घर मे अपना काम कर रहे है।। बल्कि बाबा साहब ने महाड आंदोलन में ब्राह्मण सहस्त्रबुद्धे व कायस्थ चित्रे को निर्देश दिया था कि वो जाकर अछूतों को इकट्ठा करे और हम आंदोलन करेंगे। इस आंदोलन में बाबा साहब के साथ कई ब्राह्मण, कायस्थ व अन्य भी थे। इनपर भी हमला हुआ।।
अब इस मूर्ख को कोई बताए कि;
"प्राकृतिक सार्वजनिक हर स्थल पर मानव अधिकार के तहत समान अधिकार से पानी पीने का विषय है न कि अछूतों की बस्तियो में उपलब्ध पानी के स्रोत से भी रोकने का था।
बाबा साहब ने महाड आंदोलन एक तालाब जो कि वँहा की स्थानीय नगर पंचायत ने सार्वजनिक तालाब घोषित किया था, वँहा अछूतों को पानी नही पीने दिया जाता था। बाबा साहब सम्पूर्ण मानव अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस तालाब से पानी नही पीने देना अथार्त देश के 17% अछूत वर्ग को उनके मानव अधिकारों से वंचित करना था। जो पूरे देश मे हर जगह हो रहा था।
बाबा साहब ने प्रतीकात्मक रूप से इस तालाब को विरोध के लिए चुना जिससे पुर्र देश मे संदेश जाए कि अछूत जातीयो को भी वो मानव अधिकार है जो अन्य को है। यह एक तरह से Existance की लड़ाई थी। ऐसी लड़ाई जिसमे अछूत भी समान अधिकार रखता है।
"
लेकिन यह फ्रिंज एलिमेंट्स अपने बाप दादाओं के बुरे कार्यो पर अफसोस करने व उसे अपनी जिंदगी में न उतारने का संकल्प लेने की जगह अब एट्रोसिटी एक्ट से डरकर नए रूप में जातिवादी घृणित मानसिकता का परिचय दे रहे है। अब जातिवाद के नए फ्लेवर की "बिना पानी पिये जिंदा रहे" कह कहकर अपमान कर रहे है।
इसलिए अनुसुचित जातीयो को समझना चाहिए कि;
1.आपके खिलाफ जो सँघर्ष कर रहे है वो सामान्य बुद्धि वाले नही है जिनसे आप मानव अधिकारों का उल्लेख करके चर्चा कर सके। वो एक तरह से पागल कुत्ते के समान है। जो काटेगा ही। आप उसके प्रति कितनी भी दया दिखा ले।
2.आपके खिलाफ कौन है? वो ही है जिन्हें आप अपना धर्म बन्धु कहते है।
3.उन्हें अल्पसंख्यक को मिल रहे सबसे बेस्ट आरक्षण आर्टिकल 30 से दिक्कत नही है। एक शब्द आजतक नही बोला। उन्हें एससी/एसटी के होने से ही दिक्कत है।।वो आपके साथ अपनत्त्व से रहना नही चाहते है।
यह बाबा साहब जानते थे इसलिए 1956 में अपनी जिंदगी का सबसे बेहतरीन कार्य करके गए, जिससे आज महाराष्ट्र में 1 करोड़ से ज्यादा जिनके पूर्वज बाबा साहब के साथ इस कार्य मे सम्मलित होकर आज आलीशान जिंदगी जी रहे है।
मूर्ख कौन?
जो नफरत कर रहे है या जो इस नफरत को देखकर भी उन्ही के पैरों में पड़ने के लिए तैयार है।
विकास कुमार जाटव
1. जैसाकि सर्वविदित है कि परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने मानवतावादी, कल्याणकारी व सभी जाति-धर्मों के मानने वालों को एक-समान समतामूलक अधिकार देने वाला सेक्युलर संविधान देकर पूरे देश को एक कड़ी में जोड़ कर सशक्त भारत बनाने की गारण्टी सुनिश्चित की है और इसके तहत् सभी धर्म के ग्रंथों व उनके धार्मिक रीति-रिवाज व मान्यताओं के आधार पर शान्त एवं सुखी जीवन जीने का अधिकार है, जिसकी अनदेखी करने व उसमें दख़ल देने के बजाय सभी को उसकी पवित्रता का सम्मान करना चाहिये।
2. इस क्रम में महिलाओं की अस्मिता, सम्मान व पर्दा आदि के ज़रिये अपने आत्म-सम्मान व स्वाभिमान की रक्षा जैसे मामलों को उसकी उसी संवेदनशीलता से देखना चाहिये और जहाँ तक स्कूलों में यूनीफार्म, पर्दा, चादर, हिजाब आदि पहन्ने का मामला है, तो इन मामलों को ज़्यादा तूल देकर कोर्ट-कचहरी में विवाद का क़ानूनी मुद्दा बनाने के बजाय, उन्हें स्थानीय स्तर पर स्कूल प्रबंधन व शासन-प्रशासन की आपसी समझ व सूझबूझ से सुलझा लेना चाहिये ताकि किसी को भी इसकी आड़ में संकीर्ण राजनीति करने का मौक़ा ना मिल पाये।
3. जबकि बी.एस.पी. सर्वसमाज के सम्मान व उनके जान-माल व मज़हब की सुरक्षा की गारण्टी वाली अम्बेडकरवादी पार्टी है और यही मानना है कि किसी भी धर्म, धार्मिक ग्रंथ व धार्मिक प्रचलन/मान्यताओं के संवेदनशील मामलों पर सभी लोग टीका-टिप्पणी करने से बचें तो यह देश व जनहित में होगा।
4. इसके साथ ही, यूपी के ज़िला बदायूँ में भारतरत्न परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा स्थापित करने को लेकर जारी विवाद व तनाव की स्थिति को शासन-प्रशासन तुरन्त इसका शान्तिपूर्ण व उचित समाधान निकाले तो यह उचित होगा।
महाराष्ट्र में वर्गीकरण समर्थक अपना प्रतिशत काहे नही देखते
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बिहार में;
चमार जाति = 5.25%
बाल्मीकि/मेहतर = 00.24%
दुसाध = 5.32%
धोबी = 00.84%
पासी = 1%
कुल पद = 2035
चमार = 111 (5.4% अथार्त प्रतिशत 5.25% के आसपास)
दुसाध = 88 (4.34% अथार्त अपने प्रतिशत 5.31% से कम)
धोबी = 59 (2.92%अथार्त अपने प्रतिशत 0.84% से ज्यादा)
पासी = 49 (2.42% अथार्त अपने प्रतिशत 1% से ज्यादा)
लेकिन इन मोहतर्मा अपने ब्राह्मण ठाकुर व अन्य मित्रो के साथ मिलकर ऐसा माहौल बनाने की सोच रही है जैसे चमार को कई गुणा ज्यादा मिल गया।।जबकि;
"दुसाध को नुकसान हुआ। लेकिन वर्गीकरण का सबसे ज्यादा विरोध बिहार में दुसाध ही करते है क्योंकि रामविलास पासवान जी जानते थे कि जब तक एकता है तब तक पूछा जा रहा है"
इसलिए मुझे धोबी व पासी के द्वारा अपने प्रतिशत से 3 गुणा ज्यादा शीट लेने पर आपत्ति नही है। अच्छी बात है कि वो पढ़कर मौका ले रहे है।।
प्रश्न : यह है कि ऐसा मौका बाल्मीकि व अन्य क्यो नही भुना रहे।
उत्तर : जैसे यह मोहतर्मा बाल्मीकि से आह्वान करने की पढ़ाई करो, और धोबी व पासी की तरह अपने प्रतिशत से कई गुणा ले लो कि जगह "चमार हाय हाय" में व्यस्त है।
यह मोहतर्मा इसकी जगह कह सकती थी कि;
"बाल्मीकि मात्र दशमलव 2 प्रतिशत (0.2%) होने के बाद भी उनके पास अवसर है कि वो पढ़कर 16% आरक्षण पर हक जमा सकते है।।अब अगर बाल्मीकि की लिए वर्गीकरण भी कर दिया जाए तो 0.2% पर कितना मिलेगा?
"
ऐसी ही मूर्खता महाराष्ट्र में हो रही है।।
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1.मातंग मात्र 2% है।
2.चमार कि उससे सम्बंधित जातिया भी 2% के आसपास है।
3.महार 8% है।
अब मातंग व चमार महाराष्ट्र में 2%-2% में क्या कर लेंगे? जबकिं वो 14% पर बिहार में पासी व धोबी की तरह शिक्षित होकर अपना हक जमा सकते है।
वर्गीकरण के नाम पर एक तरह से बाल्मीकि का कंधा इस्तेमाल करके जो जातिया हमेशा आरक्षण ही नही बल्कि एससी/एसटी के खिलाफ रही है वो मुख्यतया सवर्ण जातिया अपना हित साधना चाहते है। उन्हें आर्टिकल 30 के अल्पसंख्यक आरक्षण जो कि एससी/एसटी से बेहतर है से आपत्ति नही है लेकिन एक नफरत, चिढ़, जो एससी/एसटी के प्रति डीएनए में पूर्वजो से मिली है, उंसके आधार पर नए नए प्रयोग करते रहते है।
अब इस मोहतर्मा से जाटव हाय हाय करवाते रहते है। जबकि इस मोहतर्मा को समझना चाहिए कि इन लोगो को तुम्हारे व्यक्तिगत मैटर से कुछ लेना देना नही है, न ही कोई sympathy है। वो तो एससी/एसटी के ही बिल्कुल खिलाफ है।।
विकास कुमार जाटव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने ही मंच पर केंद्रीय मंत्री एवं सांसद चिराग पासवान ने कहा कि “मेरे नेता मेरे पिता आदरणीय रामविलास पासवान जी के संघषों की क़सम खाते हुए कहता हूँ कि और आप लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि जब तक चिराग पासवान जीवित हैं ना संविधान पर ना आरक्षण पर कोई खतरा था और ना ही आगे कोई संविधान या आरक्षण पर कोई खतरा रहेगा।
इस समय जिस तरीके से चिराग पासवान डंके की चोट पर समाज के हक और अधिकारों के लिए बिना किसी सरकार के दबाव में आवाज बने हुए हैं समझ लीजिए उनके अब उनके पिता जी की छवि दिखने लगी हैं और ऐसे ही ये आवाज बुलंद बनी रहे।