लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपालका नवनियुक्त सम्माननीय प्रधानमन्त्री श्री बालेन्द्र शाह तथा सम्पुर्ण मन्त्रीपरिषदलाई सफल कार्यकालको शुभकामना ! जनताको आशा अनुसार पक्कै पनि नेपाली राजनीति अबका दिनमा सहि दिशामा जानेछ ।
इस्वी सन् 1500 देखिका साम्राज्यहरुको इतिहाँसको अध्ययन गरेका Ray Dalio ले साम्राज्यहरु कसरि उदाए अस्ताए, कति र कसरि टिके, के कारणले र कसरी अस्ताए भनेर हिसाव गरेरै ग्राफ बानायेर येसरी देखाएछन ! र साथमा थ्रेड 👇👇👇
देउवाले मान्यता नपाएकामा ओली नै अदालत जान बेर छैन ।
"आयोगलाई घेर्नुस्, लोकतन्त्र कमजोर हुन दिनु हुँदैन भनेको थिएँ, तर कांग्रेसले सकेन,’
गगन थापालाई कांग्रेसको सभापति बनाउने आयोगको निर्णयमा वैदेशिक हस्तक्षेप रहेको ओलीनिष्कर्ष ।
@rastrapahile
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वेलकम पीके,
वेलकम टू हार्ड रियलिटीज!!
जनसुराज का कैम्पेन इस बार महागठबंधन या एनडीए से ज्यादा फॉलो किया। इसमे कुछ पीके में मेरी रुचि का योगदान था।
और कुछ मीडिया द्वारा बड़े पैमाने पर परोसे गए उनके इंटरव्यूज का भी।
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कैम्पेन दर्शनीय था, श्रवणीय था,
खूबसूरत था।
जो हम सुनना चाहते है- गांधी का नाम, सर्वधर्म समभाव, करप्शन पर वार, वंशवाद का विरोध, रोजगार, आर्थिक प्रश्न, पलायन, शिक्षा स्वास्थ्य.. पीके ने सब कहा।
अकेले लड़े सारी सीटो पर। जनता के बीच से "आम" उम्मीदवार दिए। गोदी मीडिया की ठुकाई कर, खूब तालियां बटोरी। शराबबंदी को स्कैम कहने की हिम्मत की। मय सबूत,विरोधियो को यूं घेरा, कि वे चूं करने की हालत में न थे।
तो पीके ने वैसा चुनाव लड़ा, जो हम जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी, कांग्रेस या राजद को लड़ते देखना चाहते है।
रिजल्ट- जीरो बटे सन्नाटा!!
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उन्हें 3% वोट मिलने की खबर है। 99% उम्मीदवारो की जमानत जप्त हो गयी।
पॉलीटकल कंसल्टेंट के तौर पर जो रणनीतियां औरो के लिए कारगर रहीं, वही खुद उनको परिणाम न दे सकी। अब यहाँ हार्डकोर सँगठन और, दबंग कमीनो को साथ रखने की औरो की मजबूरी समझ आती है।
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हम अभी भी मध्ययुगीन फ़्यूडल सोसायटी हैं। शक्तिशाली से डरने, प्रेम करने, उसे समर्पण और समर्थन देने की आदत है। अपना घोड़ा जीतते देखना चाहते है, और जीतने वाले को अपना घोड़ा घोषित करते हैं।
यहां विजन, समाज या आर्थिकी, विचार बिंदु नही- बरियारी है। हिन्दू को मुसलमान पर, ब्राह्मण को हिन्दुओ पर, ठाकुर को वैश्य शूद्र पर, और शूद्र को अपने से नीचे वाले शूद्र पर वर्चस्व चाहिए।
देशव्यापी बीमारी है ये। वोक्कालिगा को लिंगायत और लिंगायत को वोक्कालिगा पर प्रभुत्व चाहिए। नगा को कुकी पर, कुकी को मैतेई पर चाहिए। भारत मूलतः शिक्षित, सूटबूट में लैपटॉप पकड़ा हुआ एक कबीलाई समाज है।
हम इसे प्रोग्रेसिव समझने की भूल करते हैं।
भाजपा नही करती।
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वो समाज की सच्चाई जानती है, उसे यूज करती है। फॉल्ट लाइन को गहरा करते हुए वोट लेना, और चुनाव जीतना आसान है। लेकिन जोड़ने की कोशिश, एक लंबा, दुखदाई और अक्सर निष्फल प्रयास है।
100 साल पहले, उस महात्मा ने, जो अक्सर पीके के पीछे तस्वीर में लगे दिखते है, इस सच्चाई को स्वीकारने से मना कर दिया था।
वे स्वप्न देखते थे।
जमीनी सच्चाइयों से अलहदा स्वप्न..
- ये देश एक है।
- हिन्दू मुसलमान एक है।
- सब जातियां, सब इंसान बराबर है।
- सबको यहां इज्जत से रहने का हक है।
ये झूठ था। पर गांधी ने मानने से मना कर दिया। जमीनी सचाइयां मानने से इनकार करना, जमीन से कटना कह सकते हैं। लेकिन गांधी ने, इन मायनो में जमीन से कटना ही पसन्द किया। लीडर जनता की कुंठाओ से रोशनी नही लेते।
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उनने अपनी रौशनी से इस कुंठित सोसायटी को रौशन किया। नेहरू, मौलाना, सुभाष, शास्त्री और तमाम चेले भी, उन्ही की तरह इस रियलिटी को स्वीकारने से इनकार करते रहे।
वतो गांधी सपने की तरफ .. मंथर ही सही, स्थिर गति से बढ़ता रहा। वो सपना, पूरा नही, अधूरा सही, सच हुआ। एक सम्विधान बना। देश ने अंगीकार किया।
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दूसरी धारा ने सामाजिक सच्चाइयों को स्वीकार किया। मिटती दरारों को खोजा। उसे उंगली डालकर चौड़ा किया। नफरत की खरपतवार उगाई। खूब खाद पानी डाला, और अब खरपतवार ही मुख्य फसल हो गयी है।
पीके, या दूसरे जो भी इन रियल्टीज को डिनाय करना चाहते है, मिटाना या घटाना चाहते है। प्रबुद्ध मुद्दों पर बात करते है- वे मौजूदा राजनीति के खेत मे खरपतवार हैं।
हंसी के पात्र हैं। अर्श से बेहद दूर, पीके को इस फर्श से, फिर शुरुआत करनी है।
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यह पेड वर्कर्स, मीडिया मैनेजमेंट, फंड मैनेजमेंट, स्ट्रेटजी मैनेजमेंट से नही होगा। पहले अपने अन्तस् की पूंजी चाहिए। आशा है कि उनमे होगी।
मैं उनकी सफलता, उनका सर्वाइवल चाहता हूँ। वे साहसी शख्स है, धारा से विपरीत चलने का माद्दा है। नया सोचने की बुद्धि है। पर शुभेच्छा तब तक, जब तक इसी धारा में-- भले 10 चुनाव हारकर--लगातार चलते रहे।
वे इस जाति धर्म की वास्तविकताओ से कटे रहें।
स्वप्न देखे। यक़ीन दिलाएं।
आइडिया ऑफ इंडिया के लिए लड़ें।
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पीके की पराजय यह भी बताती है कि टेक्स्टबुक शैली का राजनीतिक प्रयास काफी नही।
सामने वे लोग है, जो जनता की कुंठाओ से फ्यूल लेते है।सत्ता में है, संसाधन से लैस औऱ सिस्टम के किले में सुरक्षित..
और जो जनता की कुंठाओ से लड़कर, उसे नई राह दिखाना चाहते है, उन सबको एक संयुक्त सामाजिक अभियान की जरूरत है। जो आम जन को एजुकेट करे, उसे उसके भय और कुंठाओ में ऊपर उठाएं।
ये काम पीके के अकेले बस का नही। उन्हें दायरा बढाना होगा। विद्वान, प्रबंधक और बेहतर ज्ञान होने के अहंकार से बाहर आना होगा।
वेलकम पीके,
वेलकम टू हार्ड रियलिटीज!
अब पनि सच्चिन्नन् भने नयाँ रुख रोप्नु! कम होलान् तर सोच, विचार, हुटहुटी र पाएकाबेलाको क्षमता देखेका जनले पत्याउँछन्। संगठन विस्तारमा लाग्नु! कम सिट आउला तर मलजल गरेपछि बढ्छ नै। तीसौँवर्ष मलजल गरेको रुखमा हरक्षण बिष फले अब रुखको माया नगर्नु! सानै सही, आशाको नयाँ बिरुवा रोप्नु!😓🙏
“महत्वपूर्ण सम्पत्तिहरूको सुरक्षाको लागि भूमिगत बंकर”
हालैको Gen‑Z आन्दोलनले देखायो कि सरकारी संरचनाहरू, अभिलेख, डाटा, आदि नष्ट हुन सक्छन्-
भविश्यमा यस्ता घटनाहरु नदोहोरिएला भनेर भन्न सकिदैन, त्यही भएर सरकारले महत्वपुर्ण डाटा, दस्तावेजहरुको सुरक्षाको लागी भुमिगत बंकर निर्माण ।
Our democracy is not self-executing. It depends on us all as citizens, regardless of our political affiliations, to stand up and fight for the core values that have made this country the envy of the world.
२००७: राणाशासन अन्त्य - प्रजातन्त्रको सुरुवात
२०१७ः प्रजातन्त्रको अन्त्य - पन्चायतको सुरुवात
२०४६: पञ्चायत अन्त्य - बहुदलीय व्यवस्था
२०५२–२०६२: माओवादी युद्ध
२०६२–२०६३: जनआन्दोलन - राजतन्त्र अन्त्य
२०७२: संविधान, तर भूकम्प
२०८२: Gen-Z आन्दोलन
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Gen-Alpha लाई के सुझाव दिने?
टू गुड टू लीड ए ब्लडी रिवोल्यूशन!!
श्रीलंका, बंग्लादेश और नेपाल में एक पैटर्न खोजने की कोशिश है। विशेषकर सत्ता समर्थंक वर्ग भय में है। सोशल मीडिया पर छिपी धमकियां और खुली चेतावनी दे रहा है।
सहमे संघियो को राहुल गांधी,CIA, चीन और जार्ज सोरोस की चौकड़ी का अगला टारगेट, मोदी सरकार नजर आती है। पर क्या सचमुच भारत मे ऐसी क्रांति हो सकती है?
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पहले इस डर का कारण.. याने पैटर्न में समानता ढूढते हैं।
1- इन देशों में लंबे समय से काबिज सरकारें, वन मैन शो और लगभग तानाशाह थीं। चुनी हुई थी, मगर चुनावी प्रक्रिया जनता में जनता को संदेह रहा। श्रीलंका, बंग्लादेश में तो विपक्ष को साफ साफ क्रश किया गया।
नेपाल में थोड़ा अलग। वहां अस्थिर सरकारें, पक्ष-विपक्ष का घालमेल चला। आज तुम सत्ता मे, कल हम। लेकिन सत्ता पक्ष, मौजूदा विपक्ष को जेल में डालने से चूका नही। दो बार के उप प्रधानमंत्री को जेल में डालना, लोगो ने देखा।
2- जनता से कटी सरकारें। नकली विकास का कानफोड़ू शोर, मीडिया पर नियंत्रण। सत्ता एक खास वर्ग के हाथ, शेष देश की आवाज पर पहरे।
3- सीमित लोगो को ठेके, नीतियों का लाभ, अकल्पनीय धन। देश मे जबरदस्त आर्थिक असमानता, भयंकर बेरोजगारी, महंगाई, इस बीच नेताओ की दौलत का अंबार...
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इसके साथ खोखला राष्ट्रवाद, सामाजिक विभाजन और कड़वे सवाल को देशभक्ति के बरछे से बींधकर हत्या। भारत मे यही तत्व मौजूद है। लेकिन यहां किसी क्रांति के फूटने का डर बेमानी है।
कारण बुरे और अच्छे दोनों हैं।
सबसे पहले तो यही- कि हिंदुस्तानी जात, क्रांति के लिए बनी नही।
3000 साल के इतिहास में भारत मे कोई मैग्नाकार्टा न बना, रक्तहीन ग्लोरियस रिवोल्यूशन, या फ्रेंच/ रशियन जैसी खूनी क्रांति न हुई।
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यहां किसी सीजर पर डिक्टेटर बन जाने के कारण खंजर नही चला, तो इसका कारण समाजशास्त्रीय है। हम व्यक्तिगत स्तर पर सोचते हैं।
निजी लाभ, धन, सम्मान, भय और लालच वगैरह, दूरगामी सामाजिक परिवर्तन के आदर्शों पर चटपट हावी होते हैं।बिकाऊ लोग हैं, तो भारत की मेधा में कलेक्टिव सोशल थिंकिंग नही है।
बहुत हुआ तो जाति, धर्म, लैंग्वेज के नाम पर छोटे, अस्थायी ब्लॉक्स बना सकते हैं। करप्शन भी हिस्सा मिले, तो सहनीय है।सिविल राइट, सामाजिक आर्थिक समानता, धर्मनिरपेक्षता- ये हमारी चेतना और समझ के स्तर से बहुत ऊपर की बातें है।
तब बिना कलेक्टिवल सोशल यूनिजन..
किसी क्रांति का प्रश्न ही नही उठता।
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एक बार वह गांधी ने वह स्थिति बनाई।
बस एक बार..अंग्रेजो से लड़ने को।
तब जाति, धर्म, भाषा, उत्तर, दक्षिण, हिन्दू मुस्लिम से ऊपर उठकर इस देश को वन ब्लॉक बनाया। पर अंग्रेज जाने की गंध आते ही, उनका शीराज़ा बिखर गया। हम सब औकात पे जो आ गए।
तो आज जब देश मे सामाजिक विभाजन का सूचकांक, गगन भेद रहा है, किसी लिबर्टी, फ्रेटर्निटी इक्वलिटी के आदर्श के पीछे, हमारा खड़ा हो पाना असंभव है।
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हमारी राष्ट्रधारा पर गांधी का असर भी अगला कारण है।
पाकिस्तान, बंग्लादेश भारत से टूटे, वे जिन्ना की धारा पर चले। दंगे, डायरेक्ट एक्शन, हिंसा। नेपाल, श्रीलंका गांधियन धारा का हिस्सा कभी रहे नही। तो वहां बलप्रयोग, और हिंसा क्रांति का स्वीकृत मार्ग है।
नेपाल का ताजा इतिहास भी माओइस्ट ब्लडबाथ का है, और श्रीलंका में लिट्टे का। पड़ोस में सैनिक तख्तापलट, या अराजक हिंसा से सत्ता बदलना नार्मल है। मगर रिपब्लिक ऑफ इंडिया की गांधियन चेतना में यह तरीका नार्मल नही।
हमे इसको रिजेक्ट करने की ट्रेनिंग मिली है।
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याद करें, कैसे गांधी ने 1946 के नेवी विद्रोह के लोगो को समर्थन देने से इनकार किया। 1947 के बाद उन्हें जेल से तो छोड़ा गया, मगर आजाद भारत मे न तो नौकरी वापस मिली, न फ्रीडम फाइटर का दर्जा।
नेहरू ने कहा कि आजाद हिंद फौज के भारत पर अटैक का विरोध करेंगे। INA ब्रिटिश विद्रोहियो से बनी फौज थी। नेहरू ने INA ट्रायल लड़ा, जेल से छुड़ाया। लेकिन भारतीय सेना में वे वापस नही लिए गए।
सन्देश स्पस्ट था- सैनिक विद्रोह पूजनीय नही है।
वह नजीरें कायम हैं। तो आज भारत की सेना, पुलिस और हथियारबंद बल- नेताओ को मारकर, फांसी देकर, पाक बंग्लादेश की तरह सत्ता हथियाने की बात सोचना भी देशद्रोह समझते हैं। दे डोंट इवन थिंक इट
सो दे डोंट डू इट!!
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यह ट्रेनिंग जनता को भी मिली है।
गांधी ने सांडर्स की हत्या को देशभक्ति नही माना। वे चौरीचौरा के बाद आंदोलन रोकते है? क्यो, सोचिये। गांधी ने खुद हिंसक, बल प्रयोग से सत्ता परिवर्तन को इनकार किया।
जनता को भी इजाजत नहीं दी।
तो नेपाल के हालिया आंदोलन की तरह, पुलिस, प्रशासन
के अफसरों की हत्या, नेताओ की लिंचिंग, आगजनी, संस्थानो और सरकारी बिल्डिंगों पर कब्ज़ा करके, सत्ता बदलने की बात हम बुरा समझते हैं।
तो संघियो को डरना नही चाहिए। यहां राजा का सर काटकर आने वाली फ्रेंचनुमा रिवोल्यूशन नही होगी। राजपक्षे के घर की तरह कोई घुड़दौड़ मार्ग में नही घुसेगा।
यह हमारे गांधी का आदेश है।
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एक एश्योरेंस और भी।
कि भारत का विशाल आकार भी एक फैक्टर है। आप अन्ना के साथ लाखों लोग रामलीला मैदान में बिठा लें, हर राज्य की राजधानी में प्रदर्शन करें, किसानों की तरह दिल्ली घेर लें। लेकिन सरकार नही गिरती।
नेपाल में भन्नाए यूथ ने नेताओ को पीटा, इस्तीफे लिखवाए, आगजनी की। सरकार गिर गयी। 1973 से 75 तक भारत मे जेपी की टोटल रिवोल्यूशन के नाम पर यही तो हुआ था न।
सरकार गिरी क्या?
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हम हमेशा सरकारें चुनाव से हटाते हैं। वही सही है, क्योकि सबक यह है कि सरकारे हिंसक क्रांति से बदलनी भी नही चाहिए।
खूनी क्रांतियां अपने बच्चों को खा जाती है। 3 पीढियां पीछे धकेल दी जाती हैं। यह बात फ्रांस के लिए सही है, रूस और चीन के लिए भी। बंग्लादेश और श्रीलंका समृद्ध नही हुए, नेपाल भी गर्त की ओर है।
कोई नया तानाशाह आ जाता है। नजला जनता ही भुगतती है।
अरब स्प्रिंग या अमरीकी दखल से- इराक, लीबिया, मिस्र, ट्यूनीशिया.. जहां जहां रातोरात रेजीम बदले, वहां सुख नही है।
क्रांति के बाद सोसायटी और पोलिटी को स्थिर होते होते लाखों जीवन नष्ट हो जाते हैं।
ये बात गांधी समझते थे।
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और राहुल गांधी समझते हैं।
सिम्पल एग्जाम्पल- वोट चोरी के ठोस प्रेजेंटेशन के बाद, इस सरकार को चोरी की सरकार, अवैध सरकार कहकर इस्तीफा मांगते, आंदोलन करते।
उदाहरण 1996-2005 का बंग्लादेश
कांग्रेसी देश ठप कर देते। जैसे गुंडाई के बल पर हाल में बिहार बन्द कराया गया, वैसे ही देश भर मे दंगा, आगजनी, हिंसा, हड़ताल, धरना प्रदर्शन। मुट्ठी भर असामाजिक तत्वों से दुराभिसन्धि। जो नेताओ को जमकर पीटते, घर जलाते, बम ब्लास्ट कराते।
उदाहरण-1975 का भारत।
पर यह कांग्रेस की लेगेसी नही। गांधी और नेहरू की राह नही। राहुल ने सिर्फ इलेक्शन कमीशन से जवाब मांगा, वहीं तक सीमित रहे। अभी भी सिर्फ वोटर रोल सुधार की मांग कर रहे हैं।
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इसे राहुल या कांग्रेस की कमजोरी माना जा सकता है।
तो मानिये।
और सत्ता समर्थंक जो वर्ग भय और संशय में है, सीआईए और जार्ज सोरोस के दुःस्वप्न देख रहा है, डरना बन्द करे।
राहत की सांस ले।
यह सरकार, आराम आराम से, राजनीतिक प्रक्रिया से, जनादेश की लात खाकर जाएगी। खूनी क्रांतियां न भारत मे हो सकती हैं, न होनी चाहिए, और न राहुल करेंगे।
वो बेसब्र नही है, अराजक नही है।
ही इज टू गुड, टू लीड ए ब्लडी रिवोल्यूशन!!
तस्वीर नेपाली युवक की है,
वर्दी रूसी फौज की..
30 हजार से ऊपर नेपाली, रूस की तरफ से यूक्रेन में लड़ रहे हैं। 5000 डॉलर महीना, रहना खाना, मारे गए-विकलांग हुए तो बोनस..
कुछ हजार नेपाली, यूक्रेन की तरफ से रशिया से लड़ रहे हैं।
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भाड़े पर लड़ना नेपाल के लोगो के लिए मान्य व्यवसाय रहा है। भारत और ब्रिटेन की सेना में तो उन्हें बकायदे रिक्रूट किया जाता है।
गोरखा रेजिमेंट बनी है। जगह सीमित, कमाई कम है। भाड़े का कांट्रेक्ट फौजी बनने।पैसा बहुत है।।रोजगार को तरसते युवा के लिए हथियार उठाना मजबूरी है।
20 साल पहले उन्होंने अपने देश के माओवादियों के साथ हथियार उठाये थे। फिर राजशाही उखाड़ फेंकी। उन्हें अच्छे दिन की आशा थी।
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जो आये नही। नेपाली माओवादी दो पार्टियों में बंट गए। पूर्व स्थापित नेपाली कांग्रेस, कुछ छोटे दल और इंडिपेंडेंट, औऱ दो माओवादी दल।
इनके बीच कोई भी कॉम्बिनेशन का गठबंधन बनाकर प्रचण्ड, देउबा और ओली सत्ता में आते रहे। फिर पार्टियां इधर उधर होती, नई सरकार, नया पीएम..
नेपाल में विपक्ष कोई नही। बारी बारी, आपसी अरेंजमेंट से सभी सत्ता की मलाई लेते रहे। सभी के करप्शन के किस्से हवा में तैरते रहे। खूब चीनी इन्वेस्टमेंट आया, और धन, ठेके, प्रोजेक्ट की लूट मची।
नेपाली युवा विदेशों में मामूली काम खोजता रहा। रिफ्यूजी स्टेटस लेकर विदेश में जाने लगा। तो नेताओ ने रिफ्यूजी साबित करने के दस्तावेज बेचने का धंधा अपना लिया।
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तो गरीब के बच्चों के ताबूत आते, औऱ नेताओ के बच्चों की विदेशों में गुलछर्रे उड़ाती तसवीरें। इसकी आलोचना औऱ गुस्सा सोशल मीडिया पर दिखने लगा।
कंट्रोल करना जरूरी था। तो सरकार कानून लाई की सभी विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफार्म अपना रजिस्ट्रेशन करायें, और अमुक अमुक नियम पालन करें।
रजिस्ट्रेशन की डेट चली गयी। लेकिन टिकटोक छोड़ किसी ने रजिस्ट्रेशन नही कराया। नतीजा ट्विटर फेसबुक इंस्टाग्राम स्नैपचेट सहित 25 प्लेटफार्म बैन हो गए।
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इसके विरोध में मुट्ठी भर छात्रों ने जुलूस निकाला, संसद की तरफ तख्तियां लेकर बढ़े। 15-20-22 साल के बच्चे, उनपर लाठीचार्ज हुआ। वे भागे, कुछ संसद परिसर में छुपने लगे।
इनको सीधे गोली मार दी गई। 22 मौत में एक 12 साल का एक बच्चा था। हत्याकांड की खबर फैलते ही पूरा काठमांडू उमड़ पड़ा। देखते ही देखते दंगा, आगजनी, अराजकता फैल गयी। हालत नियंत्रण से बाहर हो गए।
सरकार को इस्तीफा देना पड़ा।
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भारत मे बैठे मूर्ख खुश हैं।
वे खुद को दक्षिणपंथी मानते हैं, इसलिए तो वामपन्थी सरकार गिरने से खुश है। खुद को सत्ताधारी मानते है, तो विपक्ष के घर जलने से खुश हैं।
उनकी खुशी तो हर कत्लेआम में है। गाजा में मुसलमान मरे- खुश। उक्रेन में पुतिन के दुश्मन मरे-खुश। मणिपुर में मोदी के दुश्मन मरे- खुश। कश्मीर में कश्मीरी मरे- खुश
मगर ऐसी खुशी किसी सरकार के लिए आत्मघाती है। जब सरकारें, और उनके समर्थक समाज की गहरी पीड़ाओं को नजरअंदाज कर ,अपने ही स्वप्नलोक में उतराते रहती हैं,
तब वे ज्वालामुखी के मुख पर बैठे होते है।
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यह ठीक कि भारतीय समाज की तासीर नेपाल, बंग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, या पकिस्तान जैसी नही। इसका लावा जल्द नही फूटता।
मगर जल्द ठंडा भी नही होता।
बेरोजगारी, महंगाई, मूर्खतापूर्ण टैक्स, दिशाहीन विदेश नीति, विचित्र मौद्रिक नीति, अर्थनीति और व्यापार- हर तरफ उदाहरणो की एक पूरी सूची बन चुकी है, कि प्रशासन किस तरह से नही चलाया जाना चाहिए।
लेकिन इनका सबसे बड़ा पाप सोशल एजेंडा है। नफरत औऱ टूट की राजनीति है। तो 90 साल जो विचारधारा हाशिये पर रही, घृणित औऱ हास्यास्पद मानी गई..
उसने पहली बार खुद को साबित करने को मिला भरपूर मौका यूँ गंवाया है, कि जब सत्ता से जाएगी, तो ढूंढे से न दिखेगी।
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नेपाली पोलिटिकल एलीट की तरह, वह भी, रिसते सामाजिक आर्थिक घावों से आंख मीचे, आवाज दबाने के टुच्चे तरीको में मशगूल है। चुनाव हो या सोशल मीडिया, अभिव्यक्ति का गला घोंटा गया है।
न्याय के मार्ग औऱ अदालती निदान भी अवरुद्ध हैं। सरकारी भाषा मे धमक, बुलडोजर और गुंडई की प्रतिध्वनि है। नतीजे गले तक आ चुके हैं। तेजी से नाक से ऊपर जा रहे हैं।
जिस तरह दिया बुझने के पहले तेजी से जलता है, आवाज में गुंडई की प्रतिध्वनि भी, पतन के पहले तेज होती जाएगी।
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तब इतिहास के नए सफहे पर, वक्त किस रंग से अंजाम लिखेगा, कोई नही जानता। लेकिन अब तक जो नुकसान हो चुका, उसके ही असर दूरगामी हैं।
भारत मे अग्निवीर लागू है। 10 साल के भीतर दुनिया के कॉन्फ्लिक्ट जोन में हमारे बच्चे लड़ते दिखेंगे।
ट्रेंड और बेरोजगार, वे दुनिया को असुरक्षित बनाने में योगदान देंगे। फटेहाल घरवालों को रेमिटेंस भेजेंगे।
तस्वीर आपके बेटे की होगी
वर्दी विदेशी फौज की..