क्रोध को साधा है मैंने और दुखों को साथी बनाया बारिशों में आंसू घोला मुस्कुराहट को ओढ रखा है
मुश्किल को आसान पहाड़े सा याद किया
इस तरह साथ निभा रही जिंदगी का...
पता है
जब नदियाँ रोती है
समंदर भींग जाते है ......
कई बार हंसी इतनी
खारी होती है
की मीठी मुस्कराहटें
सहम जाती है
कई बार ओस
इतनी जिद्द करता है
अपने रत्ती भर
आस्तित्व को बचाने
के लिए दिन से लड पडता है ...
कभी खत्म ना होने वाली लड़ाई
लड़ता है ......
सबने पूछा
मेरा नाम
मैंने तुम्हारी ओर देखा
फिर पता
पहचान
जात धर्म
जो तुम्हारा वो
मेरा हों गया
इस तरह मैं
तुम्हारी जीवन संगिनी
तुम्हारी तमाम
पहचान के साथ
एक कागज में दर्ज हों गई .....