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त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥
हे मां, जो मनुष्य आपकी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। आपकी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं।
मैं अपनी सीढ़ियों पर
चुपचाप बैठी हूँ।
सामने सूर्य
अस्त हो चुक��� है।
पर आकाश अब भी
उसकी लालिमा ओढ़े हुए है।
शायद प्रेम भी
ऐसा ही होता है—
किसी को मुक्त कर देना,
और उसके चले जाने के बाद भी
उसकी मौन उपस्थिति में
देर तलक
निस्पंद बैठे रहना।
जिस्म बिछड़े तो कोई तूफान नहीं उठता है,
रूह बिछड़े तो सदियाँ भी ख़बर रखती हैं।
तुम जिसे छोड़ के जाओगे, वो मैं ही तो नहीं,
तुम्हारे अंदर का कोई शहर भी वीरान होगा।
जब समस्त आश्रय तिरोहित हो जाते हैं, एक निःसीम निर्वात अवतरित होता है। न स्मृतियों का स्पन्द शेष रहता है, न आकांक्षाओं का उद्���ेलन—केवल मौन का अधिष्ठान
��सी मौन में वैराग्य का बीज प्रस्फुटित होता है; और ज्ञात होता है—अधिष्ठान किसी साध्य में नहीं, स्वबोध की निःस्पन्द उपस्थिति में है
साधना किसी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं अपितु मिथ्या अहं की निवृत्ति है।
उपनिषद् कहते हैं—सत्य का उद्घाटन अविद्या के तिरोभाव से होता है।
प्रज्ञा तब एक विचार नहीं रहती, वरन् स्वप्रकाश चैतन्य की स्फुरणा बन जाती है।
साधना का परम फल उपलब्धि नहीं, कर्तृत्वाभिमान का पूर्ण विसर्जन है।
नैनों की इस नीरव ज्योति में
कोई अनकहा मंत्र स्पंदित है
मौन के गर्भ से उठती ध्वनि
जो भीतर ही अनुगूँजित है
ललाट का वह सूक्ष्म बिंदु
द्वार है अंतर-आकाश का
जहाँ ‘मैं’ की रेखा मिट जाती
और आरंभ हो प्रकाश का...
मां💜
निस्पन्द निःशब्दता के गहनातिगूढ़ वितान में
जब चित्त-सरिता अविरल निर्विकल्प धार से बहती है तब शब्द-प्रपंच के समस्त आवरण स्वयं विलीन हो जाते हैं
उस क्षण अनाहत अनुभूति के अदृश्य आलोक पर निरुपाधि करुणा की एक अकथनीय, अचल अनुभूति बरसा जाता है, यही मौन स्वर-परंपरा का परम अवगाह्य मूल है।