अभी मैं अरविंद केजरीवा�� की कोर्ट की वीडियो देख रहा था
जिसमें वह जस्टिस स्वर्णकांता से कह रहा था कि आप आरएसएस के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में गई है इसीलिए मुझे आप पर विश्वास नहीं है
जस्टिस स्वर्णकांता ने बोला कि मैं कब गई थी ?
फिर उसने किसी वकीलों के सम्मेलन का नाम लिया और बोला कि उसमें जो आयोजक था उसकी विचारधारा RSS की है
सोचिए अगर इस तरह की बात नरेंद्र मोदी और अमित शाह कहे होते तो क्या होता
गुजरात हाई कोर्ट में नरेंद्र मोदी और अमित शाह को घेरने के लिए कांग्रेस ने बड़ा घटिया प्लान रचा था
राष्ट्रीय जनता दल के एक बड़े नेता थे आफताब आलम वह वकील भी थे लंबे समय तक लालू प्रसाद यादव की पार्टी से जुड़े रहे
फिर लालू प्रसाद यादव ने उन्हें बिहार का महाधिवक्ता नियुक्त किया उसक�� बाद मनमोहन सरकार ने उनको गुजरात हाई कोर्ट का जज बनाकर भेज दिया
कॉलेजियम के द्वारा हाई कोर्ट के जज बनाए जाने की सिर्फ दो शर्तें होती हैं या वह किसी हाईकोर्ट में 10 साल तक प्रेक्टिस किया हो या वह कुछ वर्षों तक किसी राज्य का महाधिवक्ता अब यह जो महाधिवक्ता वाला योग्यता है इसका जमकर दुरुपयोग होता है
क्योंकि जब वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने अपनी सगी बेटी अभिलाषा कुम���री को हिमाचल प्रदेश का महाधिवक्ता नियुक्त कर दिया जो कानून के खिलाफ है और उसके कुछ वर्षों के बाद मनमोहन सिंह ने अभिलाषा कुमारी को गुजरात हाई कोर्ट का जज बनाकर भेज दिया
और इन दोनो के ही बेंच में अमित शाह और नरेंद्र मोदी के सारे मामले आते रहे
और यह लोग अहमद के इशारे पर फैसला लिखते रहे जबकि कहा तो यह जाता था कि अहमद की ऑफिस में फैसला तैयार होते थे और यह लोग सिर्फ दस्तखत करते थे
फिर इन दोनों को प्रमोट करके सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया गया और वहां ऐसा सिस्टम लगा दिया गया कि गुजरात से जुड़ा कोई भी मामला या नरेंद्र मोदी अमित शाह से जुड़ा कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में जाता था तो वह सीधे आफताब आलम की बेंच में जाता था
जस्टिस आफताब आलम की बेटी और अरुषा आलम तीस्ता सेतलवाड़ के एनजीओ में ट्रस्टी थी और जमकर न्यायपालिका का बलात्कार हो रहा था
और पूरी दुनिया आंखें बंद कर देख रही थी
वह तो गुजरात हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस बीएम सोनी ने इस पूरे गोरख धंधे के बारे में एक लंबा चौड़ा पत्र भारत के राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखा और उसे पत्र को सार्वजनिक लिखा तब जाकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने रजिस्ट्री सिस्टम में बदलाव किया और जस्टिस आफताब आलम को गुजरात से जुड़े सारे मामलों से अलग कर दिया गया
लेकिन एक बार भी नरेंद्र मोदी ने या अमित शाह ने यह नहीं कहा कि आप लोग मुझे न्याय नहीं दे सकते क्योंकि आप हिमाचल प���रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की बेटी है या आप लालू प्रसाद यादव की पार्टी से लंबे समय तक जुड़े रहे हैं
@narendramodi
@AmitShah
@Bhupendrapbjp
@sanghaviharsh
दुनिया में सबसे नामर्द कौम कौनसी है ये पूरी दुनिया में उजागर हो चुका है,
57 देश होने के बाद ये किसी से सामने की लड़ाई नहीं लड़ सकते है सिर्फ खुद में बम लगाकर आम नागरिकों के बीच में अल्लाह हु अकबर करके फट सकते है हिम्मत है तो लें ट्रंप और नेतनयाहू से बदला,
नहीं तो जि/हाद का नाटक बंद करे
👉🏽उस दिन अगर वो गद्दारी न हुई होती... तो 1915 में ही हम आज़ाद हो गए होते और #राष्ट्रपिता ये व्यक्ति होता 👇🏽👇🏽
खून खौल उठता है यह सोचकर कि जिस शेर ने अकेले दम पर रॉयल बंगाल टाइगर के जबड़े फाड़ दिए थे, उसे हम हिंदुस्तानियों ने ही अकेला छोड़ दिया। हम 1947 की आज़ादी की सालगिरह मनाते हैं, लेकिन उस 10 सितंबर 1915 की उस काली दोपहर को भूल गए, जब एक महानायक का सपना अपनों की ही मुखबिरी की भेंट चढ़ गया।
दिल बहुत भारी है यह सोचकर कि हमारे देश का इतिहास कितना अलग होता, अगर उस दिन अपनों ने ही पीठ में छुरा न घोंपा होता।
हम 1947 की आजादी का जश्न मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ए��� शख्स ऐसा भी था जिसने 1915 में ही भारत को आजाद कराने का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया था। ⚔️💪
मैं बात कर रहा हूँ #जतीन्द्रनाथ_मुखर्जी की, जिन्हें दुनिया "बाघा जतिन" के नाम से जानती है।
सोचिए, वो कैसा फौलादी इंसान रहा होगा जिसने बिना किसी बंदूक के, सिर्फ एक छोटी सी खुखर�� से रॉयल बंगाल टाइगर को ढेर कर दिया था। लेकिन उनका असली मुकाबला उन 'सफेद भेड़ियों' से था जिन्होंने हमारी मां भारती को जकड़ रखा था। जतिन दा का एक ही मंत्र था "देश के लिए मरना सीखो, ताकि देश जी सके।"
मुझे उनकी वो बातें आज भी झकझोर देती हैं
साहस का वो मंजर जब अंग्रेजों ने गाड़ी की छत पर बैठकर भारतीय महिलाओं का अपमान किया, तो जतिन दा अकेले उन पर टूट पड़े और तब तक मारा जब तक कि अंग्रेज पैरों में नहीं गिर गए। उस दौर में, जहाँ लोग अंग्रेजों के साये से डरते थे, जतिन दा उन्हें बीच सड़क पर पीट दिया करते थे।
विवेकानंद का वो प्रभाव जो स्वामी जी ने उन्हें सिखाया था कि लोहे की मांसपेशियों में ही वज्र जैसा संकल्प रहता है। और जतिन दा ने उसे जी कर दिखाया।
गद्दारी की वो चोट जब उन्होंने जर्मनी से हथियार मंगाकर पूरे देश में एक साथ बगावत की योजना ब���ाई थी। चेक जासूस रॉस हेडविक ने खुद लिखा था कि अगर वह प्लान कामयाब हो जाता, तो आज राष्ट्रपिता बाघा जतिन होते। पर अफ़सोस, एक गद्दार की मुखबिरी ने हमें 32 साल और गुलामी की आग में झोंक दिया।
10 सितंबर 1915 को जब उन्होंने अस्पताल में आखिरी सांस ली, तो उनका शरीर गोलियों से छलनी था, लेकिन चेहरे पर हार का गम नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति समर्पण की चमक थी।आज समय है यह पूछने का कि क्या हमारी देशभक्ति सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी के स्टेटस तक सीमित है? बाघा जतिन और उनके साथियों ने जब बूढ़ी बालम की तट पर आखिरी गोलियां झेली थीं, तो उनके सामने कोई निजी स्वार्थ नहीं था। उन्हें पता था कि वह शाम उनकी आखिरी शाम है, फिर भी उन्होंने समर्पण के बजाय संघर्ष को चुना।
इतिहास गवाह है कि हम दुश्मनों से कभी नहीं हारे, हम तब-तब हारे जब घर के ही किसी भेदी ने दरवाज़ा खोल दिया। आज बाघा जतिन ��ो सच्ची श्रद्धांजलि यह नहीं होगी कि हम उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाएं, बल्कि यह होगी कि:
हम अपने इतिहास के उन विस्मृत नायकों (Forgotten Heroes) को पहचानें।
राष्ट्रहित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखें, ताकि फिर कभी कोई 'मुखबिरी' किसी क्रांतिकारी के सपने को न कुचल सके।
अपनी आने वाली पीढ़ियों को बताएं कि आज़ादी केवल अहिंसा के चरखे से नहीं, बल्कि जतिन दा जैसे शेरों के लहू से भी सींची गई है।
याद रखिये, जो राष्ट्र अपने ���लिदानियों को भूल जाता है, उसका भूगोल बदल जाता है। जतिन दा का शरीर उस दिन गोलियों से छलनी हुआ था, लेकिन उनकी रूह आज भी हर उस हिंदुस्तानी में ज़िंदा है जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का हौसला रखता है।
उठो! और अपने अंदर के उस 'बाघा' को जगाओ, जो देश के लिए मरने से पहले, देश के लिए जीना जानता हो।"
आज जब हम आजादी की खुली हवा में सांस लेते हैं, तो एक पल के लिए रुक कर सोचिएगा जरूर... क्या हम उन बलिदान���ं के लायक बन पाए हैं? जतिन दा जैसे नायक इतिहास की किताबों के किसी कोने में खो गए हैं, लेकिन हमारे दिलों में उनकी मशाल जलती रहनी चाहिए।
बाघा जतिन जैसे महान क्रांतिकारी के चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमन।🌹🙏
🔥जब सोमनाथ के मंदिर को वि ध्वंस करने के लि�� मोहम्मद गजनवी सोमनाथ पहुंचा तो वहां के राजगुरु आचार्य ब्रह्मभट्ट ने राजा से कहा कि एक राजा विष्णु का अवतार होता है और मैं इस ज्योतिर्लिंग शिवलिंग की ज्योति आपके शरीर में प्रत्यारोपित करता हूँ...
उसके पश्चात आचार्य ने राजा को वहां से प्रस्थान करने को कहा...
तत्पश्चात जब गजनी ने मंदिर में प्रवेश किया तो आचार्य ने गजनी को कहा कि तुम अपने गुर्ज को मेर�� मस्तक पर मारो क्योंकि आचार्य ब्रह्मभट्ट को ज्ञात था कि मस्तिष्क के अंदर जो रक्त रहता है उसे ब्रह्मकपाली कहते हैं और ये रक्त बहुत ही पवित्र होता है, यदि गजनी ने मेरे शीश पर गुर्ज को मारा तो महादेव का रक्त स्नान के अभिषेक द्वारा विसर्जन हो जाएगा और एक बार विसर्जन होने के बाद कोई भी मुर्ती या पत्थर जिसमें प्राण प्रतिष्ठा कि गई हो वो मिट्टी के समान हो जाता है।
ऐसे ही नहीं शेष रहा है हमारा पवित्र सनातन धर्म...
इसकी रक्षा के लिए आचार्य ब्रह्मभट्ट जैसी लाखों विभूतियों ने अपनी आहुति दी है...
हर-हर महादेव,जय महाकाल🙏🚩🙏
दीपू चंद्र दास पुलिस कस्टडी में थे। थाने के अंदर थे। भीड़ आई और उन्हें बाहर खींच ले गई। उसके बाद उन्हें जीवित जला दिया गया। पुलिस ने कुछ नहीं किया ताकि हत्यारों के मानवाधिकार सुरक्षित रहे।
ठीक उसी तरह पालघर में साधु भी पुलिस कस्टडी में थे। उन्हें तो पुलिस ने बाहर लाकर भीड़ को सौंपा था। ताकि हत्यारों के मानवाधिकार सुरक्षित रहे।
ऑस्ट्रे��िया के बोदी बीच के पचास मीटर दूर ही न केवल थाना है, बल्कि तीन पुलिस कर्मी वही थे, बीच पर ही। फायर नहीं किया। ताकि आतंकियों के मानवाधिकार का उल्लंघन न हो जाए।
ये वामपंथियों ने सौ वर्षों की मेहनत से अचीव किया है: “विक्टिम ग्रुप को हिंसा का अधिकार है। पुलिस बाद में न्यायालय में कार्यवाही करे, हिंसक भीड़ पर बल प्रयोग न करे।”
सरकार का मुख्य काम आपकी रक्षा होता है। उसी काम के लिए सारे टैक्स लिए जात��� है।
सरकार ने आपसे हथियार भी छीन लिए, इस वचन के साथ कि वही आपकी रक्षा करेगी। लेकिन जब भी किसी पुलिस कर्मी ने आपको बचाने के लिए बल प्रयोग किया, वामपंथियों ने उसका करियर समाप्त कर दिया। न्यायालय भी भीड़ की रक्षा में खड़े हो गए।
ये सब हुआ क्यूंकि हमने होने दिया। हमने ही वामपंथ को “victim classes” के लिए स्पेशल क़ानून बनने दिए। हमने ही वामपंथ को ये अधिकार दिया कि वो कह सके कि विक्टिम्स पर नैतिक नियम लागू नहीं होते, क़ानून ��ी लागू नहीं होता।
साथ नहीं आयेंगे, इन infantiles के हाथ से इस विश्व को वापस नहीं लेंगे, तो एक एक कर हम सब दीपू बनते जाएँगे। पुलिस को पंगु होने देंगे तो लिंचिंग हमारी होगी, नेताओ व न्यायाधीशों की नहीं।
धुरंधर – वह फ़िल्म जिसने बॉलीवुड की रीढ़ तोड़ दी और पूरे इकोसिस्टम को बेनक़ाब कर दिया
मैं धुरंधर देखने एक अच्छी एक्शन फ़िल्म की उम्मीद लेकर गया था।
बाहर निकला तो एहसास हुआ कि मैंने वो देखा है, जो भारतीय सिनेमा ने 70 सालों में कभी करने की हिम्मत नहीं की।
अगर आप जानना चाहते हैं कि सच म���ं कौन भारत के साथ खड़ा है और कौन ‘नैरेटिव हैंडलर्स’ के साथ—
यह फ़िल्म एक लिटमस टेस्ट है। एक फ़िल्टर। एक आईना।
जब The Wire जैसी साइट एक बेहतरीन फ़िल्म को “ट्रोल जितनी सूक्ष्म” बताती है और उसे 600 लाइक मिलते हैं…
और उसी पर एक साधारण जवाब—
“तुम्हारा पिछवाड़ा क्यों जल रहा है?”—
3,700 लाइक बटोर लेता है…
तो समझ लीजिए, देश की नब्ज़ कहाँ धड़क रही है।
बॉलीवुड ने कभी सच नहीं दिखाया
दशकों तक बॉलीवुड एक प्रोपेगैंडा फैक्ट्री बना रहा—
इसलिए नहीं कि भारत में हकीकत की कमी थी,
बल्कि इसलिए कि हकीकत कुछ लोगों को असहज करती थी।
थोड़ा इतिहास देखिए।
भारत में मुगल:
भाई-भाई की हत्या करने वाले, बर्बर आक्रांता,
जिन्होंने उपमहाद्वीप को रौंदा, मंदिर तोड़े, राजवंश मिटाए और दिल्ली पर कब्ज़ा जमाया।
बॉलीवुड में मुगल:
जोधा अकबर… मुग़ल-ए-आज़म… सलीम-अनारकली…
रेशमी परदे, गुलाब, शायरी और काल्पनिक प्रेम कथाएँ।
पाकिस्तान: वैश्विक आतंक का ज़िम्मेदार देश
IC-814 अपहरण
संसद हमला
मुंबई 1993
मुंबई 2008
कश्मीर में आतंक
वैश्विक जिहाद की फंडिंग
बॉलीवुड का संस्करण:
बजरंगी भाईजान: “पक्स्तानी तो बड़े प्यारे हैं।”
मैं हूँ ना: “बस गलतफहमियाँ हैं।”
टाइगर सीरीज़: भारत - पाकिस्तान भाई-भाई, अंडरकवर रोमांस।
पठान: उसी राज्य का हाई-बजट ग्लैमर, जो हमारे ख़िलाफ़ हाइब्रिड वॉर चला रहा है।
यहाँ तक कि बॉर्डर जैसी फ़िल्म भी अंत में “अमन की आशा” गाने पर खत्म होती है।
यह सिनेमा नहीं है।
यह नैरेटिव इंजीनियरिंग है।
और क्यों न हो?
जब 80–90 के दशक में पाक-फंडेड अंडरवर्ल्ड बॉलीवुड को कंट्रोल कर रहा था…
जब सीमा पार छपी नकली मुद्रा भारत में पंप की जा रही थी…
जब “सुपरस्टार” डी-कंपनी के बच्चों के लिए प्राइवेट पार्टियों में नाच रहे थे…
धुरंधर का आगमन — पहली फ़िल्म जो राक्षस को वैसा ही दिखाती है जैसा वह है
पहली बार किसी मेनस्ट्रीम फ़िल्म ने दिखाया:
- कराची अंडरवर्ल्ड को, जैसा वह सच में है — आतंक की पाइपलाइन
- लयार�� को — अंतरराष्ट्रीय अपराध की नर्सरी
- आतंकियों का राजनीति, सीमाओं और इंटेलिजेंस में घुसपैठ का तरीका
- कैसे भारत हर दिन एक खामोश युद्ध लड़ता है
- कैसे गोलियों से ज़्यादा जानकारी आज का हथियार है
- और कैसे दशकों से हमारी आंतरिक कहानियाँ हाईजैक की गईं
और सबसे बड़ा ट्विस्ट:
फ़िल्म में एक बार भी धर्म का नाम नहीं लिया गया।
एक बार भी आम लोगों को राक्षस नहीं बनाया गया।
यह आतंक-राज्य को बेनक़ाब करती ह���, नागरिकों को नहीं।
आर. माधवन — अजीत डोभाल के रूप में
हर डायलॉग आत्मा पर वार करता है।
“भारत के सबसे बड़े दुश्मन भारत के अंदर हैं।
पाकिस्तान उसके बाद आता है।”
इतना तीखा सच, कि पत्थर काट दे।
रणवीर सिंह
उन्होंने अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस दी।
यह जानते हुए कि:
मिडिल ईस्ट मार्केट खोएँगे
बॉलीवुड एलीट्स दूर हो जाएँगे
क्रिटिक्स हमला करेंगे
उनकी PR इमेज तोड़ी जाएगी
…फिर भी उन्होंने यह किया।
यह साहस है।
यह conviction है।
यही असली अभिनेता होना है।
आदित्य धर
हर फ्रेम में उनकी पहचान है:
उरी का अनुशासन
एक डॉक्यूमेंटेरियन की ईमानदारी
एक देशभक्त का गुस्सा
एक इंटेलिजेंस एनालिस्ट की सटीकता
वह फ़िल्म नहीं बना रहे थे।
वह एक बयान दे रहे थे।
एक सुधार।
उस पूरे इकोसिस्टम को चुनौती,
जिसने दशकों तक भारत की कहानी को कमजोर, पतला और विकृत किया।
पहली बार भारत ने अपनी चोटों पर फ़िल्म बनाई है।
--
क्रिटिक्स क्यों तिलमिलाए हुए हैं?
क्योंकि धुरंधर खतरा है:
उनकी कहानी पर एकाधिकार के लिए
उनकी वैचारिक पाइपलाइनों के लिए
उनके गल्फ-फ्रेंडली बाज़ार के लिए
सच को नरम करने की आदत के लिए
इस भ्रम के लिए कि वही तय करेंगे भारत क्या देखे
यह फ़िल्म उस भ्रम को तोड़ देती है।
यह ज़मीन पलट देती है।
यह दिखाती है वो सच, जिसे बॉलीवुड हमेशा छिपाता र���ा:
कि भारत दो युद्ध लड़ रहा है—
एक सीमा पार,
और दूसरा अपने ही घरेलू ��ुश्मनों से।
धुरंधर सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं है।
सच की देर से हुई वापसी है।
वामपंथी इकोसिस्टम हैंडलर्स बेचैन हैं।
और पूरे भारत में एक सवाल गूंज रहा है:
“तुम्हारा पिछवाड़ा क्यों जल रहा है?”
हमें वाकई बाबा साहब संविधान बचाने के लिए जंग करना पड़ेगा
क्योंकि बाबा साहब अंबेडकर के लिखे मूल ���ंविधान मे धर्मनिरपेक्ष शब्द नहीं था
वक्फ बोर्ड नही था
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड नहीं था
मौलवियों को सरकारी सैलरी नहीं थी
धारा 370 नहीं था
मदरसों को सरकारी पैसा नहीं था
लेकिन राहुल गांधी के गांधी नेहरू परिवार के संविधान में यह सब घुसेड़ दिया गया
इसलिए हमें ओरिजिनल बाबा साहब का संविधान बचाना पड़ेगा
बांग्लादेश के एक एनजीओ ने पुलिस कंट्रोल रूम के 200 से ज्यादा कॉल की रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक किया है
बांग्लादेश में जब मुस्लिम हिंदुओं को मार रहे थे मंदिरों को तोड़ रहे थे तब हिन्दु��� ने सैकड़ों बार पुलिस क��� फोन किया गया
पुलिस वाले हंसते हुए जवाब दे रहे थे कि तुम लोग भी इस्लाम कबूल कर लो और शांति से बांग्लादेश में रहो या बार्डर पार करके भारत चले जाओ
सोचिए जब मुस्लिम किसी देश में बहुसंख्यक हो जाते हैं तब दूसरे धर्म के मानने वालों का क्या हाल होता है
विदेश में रह रहे कश्मीरी पंडितों ने हव���ई जहाज में यात्रा के दौरान @RahulGandhi को घेर कर सवाल पूछे कि वो कश्मीर के मामलों पर वे मोदी का विरोध क्यों करते हैं ?
इसका कोई जवाब राहुल गांधी नहीं दे पाया, राष्ट्रीय मीडिया शायद ही ये न्यूज़ दिखा पाए। 😳😡🙄
आपके (कश्मीरियों) के
फैसले बाहरी (भारत सरकार) ले रहे हैं
ये व्यक्ति भारत का लीडर ऑफ़ अपोजीशन है
प्रधानमंत्री छोड़ो... अपने दिल पे हा�� रख के बोलो क्या ये बंदा भारत का नागरिक होने की हैसियत रखता है ?
Dear @RahulGandhi,
He's Amar Preet Singh. Fighter pilot with 5000+ hours of flying experience.
He's appointed as next Chief of Bharat's Air Force wef Sept 30.
He's a SIKH.
He's wearing TURBAN.
He isn't stopped from going to Gurudwara by IAF or Govt.
He's appointed on his MERIT as #Modi Sarkar doesn't stop ANYONE's Promotions based on Caste & Religion. It believes ONLY in MERIT.
Pls note it.
BIG NEWS 🚨 BJP leader Amit Malviya said Rahul Gandhi did only 5 hours of public events in his 10-day US trip.
BJP seeks disclosure of 10-day trip
He said --
"Who all did he meet? Who hosted him?"
"Do they want Bangladesh like coup in Bharat?"
"Except these 5 hours, no one knows what India’s Leader of Opposition was up to on foreign soil"