आजाद भारत में अपने हक और हकूक
के लिए संघर्ष करते हुए
#गुर्जर_आरक्षण_आंदोलन में सर्वोच्च बलिदान देने वाले 73 बहादुर वीरों को कोटि-कोटि नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। आप सभी का त्याग,संघर्ष,बलिदान और समाज के प्रति समर्पण भाव हमेशा स्मरणीय रहेगा। #गुर्जर_बलिदान_दिवस
आजाद भारत में अपने हक और हकूक
के लिए संघर्ष करते हुए
#गुर्जर_आरक्षण_आंदोलन में सर्वोच्च बलिदान देने वाले 73 बहादुर वीरों को कोटि-कोटि नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। आप सभी का त्याग,संघर्ष,बलिदान और समाज के प्रति समर्पण भाव हमेशा स्मरणीय रहेगा। #गुर्जर_बलिदान_दिवस
@ashokgehlot51 जी आप भी तो अपने जीवन भर तक दूसरों की मेहनत पर #cm रहे हैं..ओर ये तो सारे देशवासी जानते है कि 2018 में भी फिर से सत्ता मलाई खा चुके है ...किसी ओर की मेहनत का फल आपको मिल जाता है तो आपको भी ये सवाल पुछना चाहिए @INCIndia@RahulGandhi@priyankagandhi क्यों???
🔥 तीन दिन, दो राज्य, दस ज़िले : एक जज़्बा, एक जुनून और एक नाम- @SachinPilot !
➡️बिना थके... बिना रुके... कांग्रेस का एक सिपाही चल रहा है धूप में पसीना बहाकर, कांग्रेस का परचम लहराने के लिए, कांग्रेस के संदेश को हर घर, खेत, खलिहान, चौपाल तक पहुंचाने के लिए।
जहाँ लोग थकान से रुक जाते हैं, सचिन पायलट वहीं से शुरुआत करते हैं। जहाँ जाते हैं, उम्मीदों से भरी आंखे पलक-पांवड़े बिछाकर स्वागत में जुट जाती है। क्योंकि उन्हें भरोसा है- कांग्रेस पर, सचिन पायलट के मजबूत इरादों पर। क्योंकि सचिन पायलट होने का मतलब है- हर किसान की बात, हर नौजवान की पुकार, हर महिला की उम्मीद, हर बुजुर्ग का भरोसा। 🔥सचिन पायलट सियासत में सादगी का प्रतीक, संघर्ष में स्थिरता का नाम और कांग्रेस में नई ऊर्जा का पर्याय हैं। न कुर्सी की चिंता, न ओहदे की दौड़। बस एक ही मक़सद- कांग्रेस को मजबूत करना, राहुल गांधी जी के संदेश को जनता के दिल तक पहुँचाना।
📌 बीते तीन दिन में दो राज्यों (राजस्थान और हरियाणा) के दस जिलों में सोनीपत से लेकर सिरोही और बीकानेर से लेकर जयपुर तक हर जगह से सचिन पायलट ने एक ही संदेश दिया- कहीं दुःख होगा, हम दुःख बाटेंगे...कहीं युवाओं की बात होगी, हम भरोसा देंगे, कहीं किसानों का दर्द होगा, हम मरहम लगाएंगे।
💪 सचिन पायलट का ये संघर्ष सिर्फ प्रचार नहीं, यह कांग्रेस के पुनर्जागरण की शुरुआत है। क्योंकि... जो बिना थके चलता है, जो बिना रुके लड़ता है, वही आने वाले कल की दिशा तय करता है।
राजस्थान की राजनीति का सबसे बड़ा रहस्य...
कुर्सी बदली, चेहरे बदले…
लेकिन पैमाना (benchmark) नहीं बदला।
छह साल हो गए सचिन पायलट को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी छोड़े हुए।
लोग सोचते थे उनकी चमक फीकी पड़ जाएगी… लेकिन हुआ इसका उल्टा।
📌आज जिन नेताओं को आप भीड़ जुटाते देखते हैं
📌जिन्हें गाड़ियों पर चढ़कर हाथ हिलाते देखते हैं
📌जिन्हें जनता से संवाद करते देखते हैं
📌जन्मदिन पर भीड़ जुटाते देखते हैं
ज़रा गौर कीजिए…
क्या यह सब आपको पहले से कहीं देखा-सुना नहीं लगता?
याद आया कुछ…
यही तो वो अंदाज़ है, जो कभी सचिन पायलट ने शुरू किया था और राजस्थान में कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराई थी। बाकी सब आज भी उसी नक़्शे-कदम पर चलने की कोशिश कर रहे हैं, मगर चल नहीं पा रहे हैं।
➡️ हालांकि इससे एक बात तो साबित हो जाती है कि राजनीति में सफल होने का एक ही पैमाना रह गया है- सचिन पायलट जैसा बनना,
लेकिन सवाल यही है-
👉 क्या कोई सचिन पायलट से आगे निकल पाया है?
👉 क्या कोई उस जुड़ाव, उस सादगी और उस लोकप्रियता को पार कर पाया है?
👉 क्या बिना संघर्ष किए सचिन पायलट बना जा सकता है?
जवाब सबको पता है...🔥🔥
राजस्थान में राजनीति हो या नेतृत्व की बात- आज भी Benchmark सिर्फ़ और सिर्फ़ @SachinPilot हैं, लेकिन उनके जैसी मेहनत कोई करना नहीं चाहता। 🔥🔥
#RPCC के यशस्वी एवं ऊर्जावान प्रदेश अध्यक्ष @GovindDotasra जी को जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएँ 🎉
आपका संघर्ष और नेतृत्व हम सभी कार्यकर्ताओं की शक्ति है। मैं ईश्वर से आपके उत्तम स्वास्थ,दिर्घायु जीवन एवं उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं !!✌️✋
#HappyBirthdayDotasraJi@SachinPilot
#RPCC के यशस्वी एवं ऊर्जावान प्रदेश अध्यक्ष @GovindDotasra जी को जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएँ 🎉
आपका संघर्ष और नेतृत्व हम सभी कार्यकर्ताओं की शक्ति है। मैं ईश्वर से आपके उत्तम स्वास्थ,दिर्घायु जीवन एवं उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं !!✌️✋
#HappyBirthdayDotasraJi@SachinPilot
रॉयलिनफ़ील्ड पर "मुकद्दर का सिकंदर" के बने सचिन पायलट और बार-बार हीरा चाटती ज़ोहरा बाई!
कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट ने मध्यप्रदेश में एक रैली निकाली है। सचिन पायलट में एक सहज-सा सम्मोहन है और वह जहाँ भी जाते हैं, लोग खिंचे चले आते हैं। बहुत बार सुनता था कि सचिन पायलट की भीड़ प्रायोजित होती है; लगता था कि संभव है। वे काफ़ी प्रभावशाली और चुंबकीय आकर्षण वाले नेता हैं, ऐसा कर लेते होगे। क्योंकि ऐसा करके कई नेता जाने कहाँ के कहाँ पहुंच गए हैं। लेकिन मैंने रवींद्रसिंह भाटी की राजनीतिक यात्रा का क़रीब से अध्ययन किया और डेटा ऐनेलिसिस किया तो उनके प्रति लोगों का बहुत सहज आकर्षण सामने आया।
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हमारे प्रदेश में ऐसे कुछ ही नेता हैं, जिनके प्रति लोगों में सम्मोहन है। पुराने नेताओं में यह वसुंधरा राजे के प्रति काफ़ी है। नयों में हनुमान बेनीवाल हैं, डॉ. किरोड़ीलाल मीणा हैं, पहले देवीसिंह भाटी ऐसे ही नेता थे। नए हालात में नरेश मीणा के इर्दगिर्द कुछ आकर्षण जुटना शुरू हुआ है, लेकिन अभी कुछ कह नहीं सकते। राजेंद्र गुढ़ा ने आकर्षण बनाना शुरू कर दिया है। लेकिन वह क्या रूप लेगा, अब कहना जल्दबाज़ी होगी। कांग्रेस में दिव्या मदेरणा और संजना जाटव भी काफ़ी प्रभामंडल बना रही हैं।
अब सचिन पायलट गंभीर नेताओं में एक हो गए हैं और उनका आकर्षण तो ज़बरदस्त है ही, एक बड़ी चोट खाने के बाद उनमें गंभीरता भी आई है और ताज़ा डेटा ऐनेलिसिस और लोकप्रियता में वे कांग्रेस नेताओं में बहुत ऊपर हैं। हो सकता है, हमारी रीच ठीक नहीं हो। समझ भी कम हो सकती है। लेकिन मैं अपने स्तर की बहुत छोटी बात कर रहा हूँ। अभी प्रह्लाद गुंजल ने अपने आपको बहुत साबित किया है और कांग्रेस उन्हें अपनी आदत के प्रतिकूल साथ रख सकी तो इस संगठन में जान आ सकती है।
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लेकिन बात पायलट की चल रही थी। कुछ सौ लोगों से जब हमने बात की तो पता चला कि वे अपने सबसे मुश्किल दौर में चुप रहे और सिर्फ़ सफ़ाई देने के स्तर पर ही बोले, जबकि उनके विरोधी नेता ज़बरदस्त तरीक़ों से उन पर प्रहार करते रहे। इसका उन्हें बहुत अधिक नुक़सान हुआ। कुछ ज़रूरी सवालों पर उनका चुप रहना कुछ समय तक बहुत ज़रूरी लोगों के ज़ेहन में बैठ गया और विरोध वाली बातें ठोस हो गईं। कुछ लोगों ने उन्हें इतनी आवाज़ें दीं कि उनका गला बैठ गया; लेकिन राजनीति में स्थापित लोगों की स्थिति ऐसी होती है कि वे हर बात पर भरोसा नहीं करते।
लेकिन यह सही है कि इस पेड़ की छाँव में जो भी गया, वह वहीं बैठ गया। उनका ग़ुस्से भरा लहजा भी इतना मीठा था कि कुछ न पूछो, हमें एक ने बताया। एक ने यह भी बताया कि वे उनके नज़दीक जा रहा था तो जाने कहाँ से भक्खी में जैसे किसी बाउंसर का घुसंड पड़ा है। लेकिन हर कोई जानता है कि बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें कभी मख़्सूस नहीं होतीं। जो एक बार जाता है, उनके यहाँ बैठ जाता है। कुछ लोग छिटके हैं, छिटकना जिनकी आदत में शुमार हैं।
अब बहुत बार दिल्ली के कई आला पत्रकार जो इन दिनों राहुल जी पर फ़िदा हैं, मानते हैं कि क्रांति आ ही रही है और कांग्रेस सत्तासीन होने ही जा रही है। उनके लिए मेरे एक बेहद ज़हीन दोस्त का बताया यह किस्सा कि वे पायलट से बहुत ही प्रभावित हैं; लेकिन मुझे पता है कि उनके यहाँ मिलने जाऊंगा तो हमारा फ़ोटो और विडियो पहले ही पहुंच जाएगा। इसलिए मैं कभी मिलने ही नहीं गया। मेरे साथ वाले मित्र ने कहा कि मेरे एक कॉमन फ्रेंड हैं। उन्हें बोलता हूँ कि वह उन्हें आपके घर ले आते हैं। दोस्त ने हाथ जोड़कर कहा, किसी ज़माने की दुश्मनी निकालनी है क्या?
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एक बहुत पुराने नेता बता रहे थे, "आज की कांग्रेस में डाह केवल संगठनात्मक नहीं है, मानसिक है। प्रतिद्वंद्विताएँ एकदम छोटी, बच्चों जैसी, व्यक्तिगत, लगभग कबीलाई, जो इस संगठन की सामूहिक इच्छा को खोखला कर रही हैं। वे नेता, जो मिलकर भाजपा के सामने एक मज़बूत चुनौती पेश कर सकते थे, आपस में ही ईर्ष्या और संदेह से एक-दूसरे को काटते रहे और एक पूरी सरकार भाजपा को सौंप दी। इसका नतीजा केवल जड़ता भर नहीं है; यह अपने प्रतिद्वंद्वी को ताक़त का सक्रिय तोहफ़ा है।"
बात सही है। दो प्रमुख नेताओं के बीच लम्बे समय से चला आ रहा संघर्ष केवल निष्ठाएँ नहीं बाँटता, उस ऊर्जा को भी पलीता लगा जाता है, जो एक अभियान बनाने या वैकल्पिक शासन का प्रस्ताव देने में लग सकती थी। इसके बजाय यह प्रतिद्वंद्वी दल को उसी तरह मज़बूत होने के लिए साफ़ सामग्री उपलब्ध कराता है, जैसे कभी भाजपा में हुआ करता था। राजस्थान ही नहीं, मध्य प्रदेश में, हरियाणा में, स्थानीय कांग्रेस गुटों के बीच टिकट बँटवारे पर इतनी कड़वाहट फैलती है कि कांग्रेस को मज़बूत करने के बजाय वह और बिखर जाता है। अभी मैं बिहार के चुनाव संबंधी सोमू आनंद की रिपोर्ट देख रहा था, जिससे साफ़ लग रहा था कि कांग्रेस अपने इस रोग को कम करने के बजाय बढ़ाती ही जा रही है। यहाँ तक कि दिल्ली में भी कांग्रेस नेताओं की फुसफुसाहट उपेक्षा और अधूरी महत्वाकांक्षा की है, जिससे पार्टी की आवाज़ दब जाती है जबकि प्रतिद्वंद्वी ज़मीनी स्तर पर भरोसा मज़बूत करते हैं।
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यह त्रासदी नई नहीं है। कभी भारत की कल्पना का प्रतीक रही पार्टी आज ईर्ष्या के अपने ही प्रतिध्वनि-कक्ष में फँसी दिखाई देती है। नेता अपनी क़ीमत इस आधार पर नहीं मापते कि वे क्या बना सकते हैं, अपितु उनका पूरा दमख़म इस पर जाता है कि वे पार्टी के भीतर दूसरों को कितना रोक सकते हैं। राजस्थान के एक सुयोग्य बुजु़र्ग नेता का आकलन है कि यह उस समाज जैसा है, जहाँ एकता के नारे भीतर चल रही लगातार कलह को ढकते हैं। आशा की मशीनरी की जगह नाराज़गी की मशीनरी ने ले ली है।
चुनावी विश्लेषण और जातिगत स्ट्रक्चर के एक माहिर वयोवृद्ध नेता ने इस ऐनालिसिस के दौरान मुझे बताया कि भाजपा के लिए यह अव्यवस्था एक ख़ामोश सहयोगी है। उसे कांग्रेस को तोड़ने की ज़रूरत नहीं है; कांग्रेस ख़ुद ही उसके लिए यह काम कर रही है। ईंट दर ईंट, झगड़ा दर झगड़ा। और सबसे गहरी विडंबना यह है कि जो लोग हाशिये पर जाने से सबसे अधिक डरते हैं, वही लोग उसे सबसे तेज़ी से आगे बढ़ा रहे हैं, अपनी संलिप्तता से अंधे। सत्ता कभी सिर्फ़ छीनी नहीं जाती; अक्सर यह सौंपी जाती है : टुकड़ों में, ईर्ष्या से, अहंकार से और साथियों के छोटे-छोटे विश्वासघातों से।
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और सचिन पायलट बाइक पर : सियासत की "मुकद्दर का सिकंदर" वाली यह मुद्रा
सचिन पायलट हैलमेट पहनकर रॉयल एनफ़ील्ड पर बैठते हैं तो यह केवल एक सवारी नहीं रह जाती। यह मुझे 1978 की "मुकद्दर का सिकंदर" का पुनराविष्कार लगती है। जैसे नवीं कक्षा के मुझ छात्र की आँखों में अमिताभ बच्चन सिकंदर बनकर गंगानगर की कृष्णा टॉकीज़ की बेशुमार भीड़ में आँखों में उतर गया था, वैसे ही पायलट की यह छवि राजस्थान के नौजवानों के मानस में बैठती जाती है।
सिकंदर को दिलावर हर मोड़ पर रोकता है। कई बार बुरी तरह पटकता है। शक्ति-संपन्न प्रतिद्वंद्वी, जो सिकंदर की राह हमेशा पेचीदा बनाता है। दोनों की प्रतिद्वंद्विता की यह कहानी ही सियासत की धुरी बन जाती है।
पायलट के साथ कुछ साथी "मुकद्दर का सिकंदर" के विशाल जैसे हैं। ईमानदार, निष्ठावान, लेकिन अक्सर हाशिए पर धकेले गए। लेकिन कांग्रेस संगठन का एक हिस्सा "सलाम-ए-इश्क मेरी जान जरा कुबूल कर लो" गाती ज़ोहरा बाई की तरह थका और हारा हुआ लगता है; जिसमें चाहत है, पर भविष्य नहीं। और कभी-कभी पार्टी के बुज़ुर्ग चेहरे फ़ातिमा की तरह प्रकट होते हैं। सहानुभूति देते, पर निर्णायक बदलाव लाने में असमर्थ। और एक समय ऐसा आता है कि ज़ोहरा बाई हीरा चाट लेती है। कांग्रेस के नए सितारे राहुल गांधी के तमाम आरोपों को सही मान लेने के बावजूद हम चुनावों में बार-बार हीरा चाटने का यह दृश्य देख ही रहे हैं।
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यह एक तरह का “मिथ ऑव प्रोजेक्शन” है; जहाँ समाज अपनी इच्छाएँ एक चेहरे पर आरोपित कर देता है। पायलट की बाइक की मुद्रा केवल नेतृत्व की नहीं, प्रतीक की है। वह करिश्मा जो नौजवानों को खींचता है, लेकिन पार्टी के भीतर की कलह उसी करिश्मे को कच्चा और अधूरा छोड़ देती है। पार्टी के भीतर का यह द्वंद्व कांग्रेस को उतना ही खोखला करता है, जितना सिकंदर को दिलावर के वारों ने किया था।
कहानी का अंतिम ट्विस्ट यह है कि जैसे "मुकद्दर का सिकंदर" का सिकंदर अपनी ही तक़दीर से घायल होता है, वैसे ही कांग्रेस अपनी ही कलह से कमजोर होती जाती है। भाजपा को बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं। यह पार्टी ख़ुद ही अपनी पटकथा लिख रही है, ईंट-दर-ईंट, झगड़ा-दर-झगड़ा।
उम्मीद की जा सकती है कि सियासत की इस पटकथा का लेखक समय आने पर समझेगा और इसे एक सुखांत मोड़ देगा। लेकिन विडंबना यह है कि कांग्रेस में कोई "मुकद्दर का सिकंदर" वाला दरवेश बाबा नहीं है, जो कल के सिकंदर और आज के सिकंदर को कह सके : सत्ता के सुख को ठोकर मार। दु:ख को अपना। अरे, सुख तो बेवफ़ा है। चंद दिनों के लिए आता है और चला जाता है। दु:ख तो अपना साथी है। अपने साथ रहता है। दु:ख को अपना ले। तक़दीर तेरे क़दमों में होगी और तू मुक़द्दर का बादशाह होगा। फ़िल्म में दरवेश बाबा की बात सुनकर बालक सिकंदर हँसता है और पर्दे पर एक "मुकद्दर का सिकंदर" प्रकट होता है; लेकिन यह बहुत पेचीदा कहानी है, जिसका पटाक्षेप काँग्रेस के एक बहुत पुराने पदाधिकारी रहे ज़हीन इन्सान के सुनाए नसीहत भरे शे'र में है :
ये एक बात समझने में रात हो गई है।
मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है।
बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ' मैं ने किया;
बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है।
@SachinPilot@INCIndia #MuqadderKaSikander #RajasthanWithTribhuvan
राजस्थान वीरों , स्वाभिमान, शौर्य व बलिदान की धरती है यह वीर शिरोमणि महाराणाप्रताप भक्त शिरोमणि मीरा की धरती है । पुनिया जी आज आपने राजस्थान का अपमान करके अपनी गंदी राजनीति का परिचय दिया है आपको राजस्थान की जनता कभी माफ़ नहीं करेगी ॥
राजस्थान के शिक्षा मंत्री डॉ. बुलाकी दास कल्ला जी को जन्मदिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
मैं आपके स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना करता हूँ।
@DrBDKallaINC
राजस्थान के शिक्षा मंत्री डॉ. बुलाकी दास कल्ला जी को जन्मदिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
मैं आपके स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना करता हूँ।
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