भैया कोई भी अंक सोचो।
3 से गुना 54 जोड़ो।
3 से भागा पहला छोड़ो।
कोई अंक सोचें। उसका तीन से गुणा करें।
उसमें 54 जोड़ें। जो आए उसमें 3 से भाग दें।
जो आए उसमें सोचा हुआ अंक घटा दें। शेष 18 आयाॽ
नेटफ्लिक्स का जहर भारत में तेजी से फैल रहा है। हिंदुओं को हिंसक और बर्बर दिखाना और रहीम चाचा सिंड्रोम उनकी कंटेंट पॉलिसी का हिस��सा है। देखें पूरा वीडियो: https://t.co/eCBmgupk0W
@narendramodi @MIB_India
प्रकृति और विज्ञानः एक समन्वय
प्रकृति और विज्ञान दोनों का अपना महत्व है। प्रकृति का अर्थ अत्यंत व्यापक है। क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर इन पंचमहाभूतों से ही सृष्टि बनी है। इनका इनका संतुलन बिगड़ा तो प्रलय निश्चित है। वहीं विज्ञान का 'समीचीन ज्ञान' रखने वाला व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है। वेदों में जे विज्ञान है, उसे आज दुनिया मान रही है। इसलिए अध्यात्म और विज्ञान को ��िरोधी मत समझो।
श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य, श्रीगोवर्धनमठ-पुरीपीठ
Shankaracharya @DandiSwami Swami Sadanand Saraswati's responded to the Ayodhya Ram Mandir donations controversy, stating that "Hindu religious places should not fall under government control because governments lack religious knowledge & expertise.
Temples should be placed under trusts headed by Dharmacharyas (Priests, Spiritual Leader & Teacher of Law).
He also said the donations should only be used for Cow welfare, Hospitals, Schools, Universities, Vedic Ritual sites & restoration & research of ancient Vedic culture.
He also said that those who committed corruption in the Temple funds, should be prosecuted & punished.
Who is a Fake Nastik and Who is a Real Nastik.Our Religion also gave space and hearing to the opinions of True Nāstika countering with points-Sri Sannidhanam
छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।।
प्रयागराज में संगम तट पर बरगद का एक विशाल और न क्षरित होने वाला वृक्ष था जिसे #अक्षयवट कहा गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने इस वट को प्रयाग रुपी राजा का छत्र कहा है। यह अब किला क्षेत्र में है। जहांगीर ने इसे काटने का प्रयास किया।
#मानस_शब्द#संस्कृति
एकं ज्योतिरभूद्वेधा राधामाध��रूपकम्। एक ही परम दिव्य ज्योति (परमेश्वर) राधा और माधव के रूप में दो हिस्सों में विभक्त हुई है। जो साक्षात राधा हैं, वही कृष्ण हैं और जो कृष्ण हैं, वही राधिका हैं।
विशेषज्ञों ने बताया है कि भागवतकार जब राधा का नाम लिखते थे तो उनके स्मरण मात्र से ही वे समाधि में चले जाते थे अतः उन्होंने भागवत में राधा नाम लिखे बिना ही भागवत पूरा लिखा। कई स्थलों पर राधा को केवल संकेत मात्र से वर्णित कर दिया है।
विपत्तौ किं विषादेन सम्पत्तौ हर्षेण किम्।
भवितव्यं भवत्येव कर्मणामीदृशी गतिः॥
~ सुभाषित
"कठिनाई आने पर दुखी होने से और ऐश्वर्य मिलने पर प्रसन्न होने से क्या लाभ? जब जो होना है, वह होना ही है! कर्मों की गति ही इस प्रकार की है।"