कुछ राष्ट्र इतिहास लिखते हैं।
कुछ राष्ट्र इतिहास को याद रखते हैं।
और कुछ राष्ट्र... इतिहास को फिर से जीते हैं।
2014 से 2026 के बीच भारत ने केवल स्मारक नहीं बनाए, उसने अपनी सभ्यतागत स्मृति को पुनः स्थापित किया।
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा समारोह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था; यह सदियों की प्रतीक्षा का सांस्कृतिक पूर्णविराम था।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक, केदारनाथ और सोमनाथ का पुनरुत्थान—इन परियोजनाओं ने तीर्थों को अतीत की विरासत से भविष्य के अनुभव में बदल दिया।
नई संसद में स्थापित सेंगोल ने सत्ता को शासन से और शासन को धर्मसम्मत कर्तव्य से जोड़ा। संसद की दीवारों पर अंकित सभ्यता का इतिहास बताता है कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ें आधुनिक नहीं, सहस्राब्दियों पुरानी हैं।
भारत मंडपम के बाहर खड़ा 28 फ़ुट ऊँचा नटराज, और G20 का संदेश—“वसुधैव कुटुम्बकम्”—दुनिया के सामने भारत की सांस्कृतिक भाषा बनकर उभरे।
दशकों तक विदेशों में बिखरी भारत की धरोहरें लौटने लगीं। जहाँ स्वतंत्रता के बाद सात दशकों में बीस से भी कम पुरावशेष वापस आए, वहीं पिछले बारह वर्षों में छह सौ से अधिक अमूल्य विरासतें स्वदेश लौटीं।
#modijistaysafe # @narendramodi
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SHOCKER - Arfa Khanum Sherwani mocks Hindus 😳
ARFA : "Why Hindu girls love Muslim Men?"
NIVEDITA MENON : "Love Jihad is a conspiracy by Hindus because they are insecure about Muslim Men more attractive than Hindus"
@KolkataPolice should take action.
अम्बेडकर जी के बारे में जो लोग अधूरी जानकारी या पूर्वाग्रह के कारण नकारात्मक बातें करते हैं—उनकी नीतियों से असहमति हो सकती है, लेकिन उनकी नीयत पर शक करने का कोई कारण नहीं है।
उनके मन में हिन्दू धर्म के प्रति नफरत नहीं थी, बल्कि हिन्दू समाज में जो भेदभाव था, उससे उन्हें दुख और गुस्सा था। और यह गुस्सा भी बिना वजह नहीं था। अगर हम उनकी जगह होते, तो शायद उससे भी ज्यादा कड़ी प्रतिक्रिया देते।
उन्होंने समाज के एक हिस्से के साथ हुए अपमान को अपना अपमान माना। और जहाँ सम्मान न मिले, वहाँ से हट जाना ही एक स्वाभिमानी व्यक्ति का स्वभाव होता है। इसलिए उन्होंने रास्ता बदला, लेकिन बहुत दूर नहीं गए।
उन्होंने घर नहीं छोड़ा, बस एक कमरे से दूसरे कमरे में चले गए। उनके अपने शब्दों में, उन्होंने सिर्फ पूजा की पद्धति बदली, अपनी संस्कृति नहीं।
अम्बेडकर कोई दुश्मन नहीं थे, बल्कि एक आहत और नाराज भाई थे। इसलिए हमें भी अपने व्यवहार को ऐसा नहीं बनाना चाहिए कि नाराजगी दुश्मनी में बदल जाए।
#RajeevMishra
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#Ambedkar #ambedkarjayanti #अंबेडकर_जयंती
#Ambedkar
बंगाल में BJP की कैम्पेन केंद्रीय स्तर पर ऑर्गनाइज्ड लग रही है – नए संगठन बूथ, ‘परिवर्तन’ पर आधारित यात्राएँ और TMC शासन के रिकॉर्ड पर सवाल।
TMC की तरफ से ‘बांग्ला बचाओ’ नारा और स्थानीय मुद्दों का जोर।
दोनों तरफ से विकास vs क्षेत्रीय पहचान की लड़ाई साफ दिख रही है।
2026 में बंगाल का रुख क्या बदलेगा? आपकी राय?
#BengalElection2026 #ElectionStrategy
आशा भोंसले …वो आवाज़, जो वक्त से बड़ी थी…वो एहसास, जो हर पीढ़ी में बस गया…
हम सबकी तरह मैं भी उनका एक छोटा-सा प्रशंसक था। बचपन लाखों की तरह उनके गीतों के साथ बीता—
उनकी आवाज़ पर बोलना धृष्टता ही होगी...
फिर ज़िंदगी ने एक दिन ऐसा भी दिया—
2007 के आसपास, एक चैनल में उनसे मिलने का अवसर मिला, दिनेेश गौतम और नमिता डोगरा उन्हें मुझसे ज़्यादा जानते थे, पर मैंने भी कुछ पल उनके सामने खड़े होकर बिताए।
वो … सीधी, सपाट और थोडी अख्खड लगीं. लेकिन जो इतना बडा हो, उस पर ये फबता ही है. अपन ठहरे नाचीज़ , फोटो भी खिंचा, नंबर भी exchange हुये...
पर हिम्मत कभी नहीं जुटा पाया उन्हें कॉल करने की।
वक़्त यूँ ही बीतता गया…
हाल ही में, जब हमने 50s, 60s और 70s के विज्ञापनों की एक प्रदर्शनी लगाई—
जिसे इक़बाल रिज़वी ने क्यूरेट किया था—तो उसमें आशा जी की HMV के दो विज्ञापन सामने आए।
मैंने उन्हें वो तस्वीरें भेजीं…और उनका जवाब—तुरंत, आया स्नेह से भरा—
This is so cool. Can I get copies of these which I’d like to hang in my home?
मैंने कहा—
“ज़रूर… पर अगर अनुमति हो तो मैं खुद आकर देना चाहूँगा।”
उन्होंने लिखा—
Very well. I’m overseas right now. Back in India by 29 Dec.
पर वो 29 दिसंबर… कभी नहीं आया।
मैंने दो बार संदेश भेजे…सोचा—वो विदेश में होंगी, कभी भी जवाब आ जाएगा…
पर आज ये एहसास हुआ—कुछ मुलाक़ातें सिर्फ़ ‘हो सकती थीं’ बनकर रह जाती हैं।
आज बस इतना ही कह सकता हूँ—कुछ आवाज़ें समय से बड़ी होती हैं…और कुछ अफ़सोस, उम्र भर के साथी।
नमन...
@dineshgautam1
#ashabhosle #asha #AshaBhosleSongs
https://t.co/8RAwldSmso #AshaBhosle
After warning that 'an entire civilization will die tonight,' Trump has gracefully agreed to a 2-week suspension of attacks on Iran.
#Pakistan , a country that struggles to keep its own house in order, has suddenly emerged as the indispensable mediator between Trump and Iran.
Apparently, Pakistan has emerged as the newest miracle worker in diplomacy.
Thread 👇
#Hormuz #UNSC #Diplomacy
#IndianDiplomacy #WorldAffairs #Geopolitics
भारत की सांस्कृतिक चेतना, उसकी आत्मा और उसकी निरंतर धारा को समर्पित एक नई प्रस्तुति—
“नये भारत का उन्मेष”
अब यह गीत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पहुँचने की ओर—
DistroKid के माध्यम से जल्द ही आप सब तक।
#NayaBharat#CulturalRenaissance#IGNCA
https://t.co/jDbiF2FPMf
लबों पे तहज़ीब, निगाहों में अदब का जलवा था,
मगर दिल के तहख़ाने में तअस्सुब का ही पहरा था।
उम्मत के ग़म में अश्क-ए-रवाँ, फ़लक तक फ़रियाद,
अपने ही वतन का दर्द आया—तो ख़ामोशी का फ़तवा था
you too #brutus Mr Jung😀
#IranWar
कुछ महीने पहले तक देश में एक अजीब-सी विलाप-सभा चल रहा था। कुछ लोगों को हर जगह एक ही नाम दिखाई देता था—#ambani
कहा जा रहा था कि #NarendraModi की सरकार सस्ते रूसी तेल के बहाने अंबानी को फायदा पहुँचा रही है। रूस से आने वाला डिस्काउंटेड क्रूड मानो किसी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा नहीं, बल्कि किसी एक उद्योगपति की जेब भरने की कहानी बना दिया गया था।
आज वही लोग अगर खबरें पढ़ें, तो शायद उन्हें अपनी ही भविष्यवाणियों की गूँज सुनाई दे।
क्योंकि अब अमेरिका में बनने जा रही एक नई रिफाइनरी—जिसे Donald Trump ने अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा निवेश बताया है—उसमें प्रमुख विदेशी निवेशक के रूप में उसी अंबानी की कंपनी सामने आई है। टेक्सास के Port of Brownsville में प्रस्तावित यह विशाल रिफाइनरी परियोजना लगभग 300 अरब डॉलर के निवेश से बनने जा रही है।
इस परियोजना में प्रमुख विदेशी साझेदार है भारत की Reliance Industries—वही कंपनी जो गुजरात के Jamnagar Refinery में दुनिया की सबसे बड़ी एकल-स्थल रिफाइनरी चलाती है।
कभी कहा गया था कि सस्ता रूसी तेल भारत के उद्योगपतियों के लिए “अनुचित लाभ” है।
आज वही उद्योगपति अमेरिका की ऊर्जा संरचना के सबसे बड़े निवेशकों में शामिल हो रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिस कथा को कुछ लोग घरेलू राजनीति के चश्मे से देखते रहे, वही कहानी अब वैश्विक ऊर्जा रणनीति का हिस्सा बन चुकी है।
भारत एक तरफ रूसी तेल खरीदता है, अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
दूसरी तरफ उसकी निजी कंपनियाँ अमेरिकी ऊर्जा ढाँचे में निवेश कर रही हैं।
यह विरोधाभास नहीं—यह नए दौर की कूटनीति और अर्थनीति है, जहाँ राष्ट्र हित भावनाओं से नहीं, विकल्पों से तय होते हैं।
इसलिए शायद आज उन लोगों को थोड़ा ठहरकर सोचना चाहिए, जो कुछ महीने पहले “भेड़िया आया” की तरह चिल्ला रहे थे।
क्योंकि जिस अंबानी को वे सस्ते रूसी तेल का लाभार्थी बता रहे थे, वही अब अमेरिका की ऊर्जा महत्वाकांक्षा का प्रमुख निवेशक बनकर उभरा है। @trump@reliancegroup@RIL_Updates
दुनियां के प्रख्यात सैन्य इतिहासकार और हवाई युद्धों पर 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक, टॉम कूपर ने साबित कर दिया है कि किराना हिल्स, जिसे पाकिस्तान के परमाणु प्रोग्राम का 'गढ़' माना जाता है, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उस पर भारत ने सटीक हमला किया था, और पाकिस्तान को हिला दिया था । ये बात भारत लगातार भारत कहता आ रहा था
यह भारतीय वायु सेना की ताकत का सबूत है कि भारत जब चाहे, जहाँ चाहे, और जिसे चाहे निशाना बना सकता है। इस लड़ाई में भारत का दबदबा था।
नरवाने की किताब पर हंगामा मचाने के चंद दिनों के बाद ही यह मुहर, एक तमाचा है विरोधियों के मुंह पर । ☺️😂
@IAF_MCC जय हो
@adgpi #OperationSindoor
वंदे मातरम्’ tableau ने ट्रॉफी जीती…और साथ में फ्री में राष्ट्रीय बहस भी ले आया। कोई इसे भावना से देख रहा है, कोई विचार से। लोकतंत्र की यही तो खूबसूरती है —एक मंच, अनेक प्रतिक्रियाएँ।
#VandeMataram "भारत कोकिला"
@DainikBhaskar@MinOfCultureGoI@narendramodi
UGC बिल: शोर नहीं, शतरंज की चाल
UGC बिल को लेकर जो चीख़ है, उसे “कानूनी भूल” कहना नासमझी है।
जिस शासन में हर कॉमा तक PMO की निगाह से गुजरता हो, वहाँ इतनी बड़ी सामाजिक अनदेखी संयोग नहीं हो सकती।
👉 यह कानून नहीं—राजनीति है।
ऊँची जातियाँ नाराज़ हैं, लेकिन जाएँगी कहाँ?
हाँ, ऊँची जातियाँ ग़ुस्से में हैं।
उन्हें लगता है उनके साथ अन्याय हुआ है।
लेकिन सच्चाई यह है—
•यह वर्ग नाराज़ हो सकता है,
•लेकिन वोट नहीं बदलता।
यह क्रोध BJP के लिए जोखिम नहीं, बल्कि कंट्रोल्ड प्रेशर है।
असल टारगेट: SC–ST–OBC
BJP का सबसे फिसलनभरा वोट बैंक यही है।
और यहीं UGC बिल काम करता है।
संदेश साफ़ है👇
“हमने कोशिश की।
हमने सोचा।
हम आपके साथ खड़े थे।”
बिल पास हो या न हो—
इरादे की छवि नीचे तक जाती है।
सुप्रीम कोर्ट का स्टे? राजनीतिक बोनस
कानून रुका।
पर कहानी बच गई।
अब नैरेटिव यह है—हम चाहते थे, सिस्टम ने रोका।
राजनीति में इससे बेहतर ढाल नहीं होती।
राजनीति कानून से नहीं, मनोविज्ञान से चलती है
यह सामाजिक न्याय नहीं है।
यह सामाजिक जड़ता का इस्तेमाल है।
•ऊँची जातियाँ नाराज़, फिर भी साथ
•निचली जातियाँ उम्मीद में बंधी
हिंदू वोट बैंक विभाजित नहीं, नियंत्रित रहता है।
निष्कर्ष
UGC बिल कोई गलती नहीं।
यह एक गणना है।
जिसे लोग “भेदभाव” कह रहे हैं,
वह दरअसल चुनावी इंजीनियरिंग हो सकती है।
राजनीति में सबसे ख़तरनाक चाल वही होती है
जिसे जनता भूल समझ ले।
#UGC_RollBack #SupremeCourt
प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे के बाद ये तीसरा बड़ा हादसा है महाराष्ट्र के राजनैतिक गलियारे में।
स्तब्ध हूँ, अजित पवार का बारामती किसी सल्तनत से कम नहीं था।
🙏
#ajitpawar
The return of the #Piprahwa relics is not an isolated administrative success; it is part of a longer, quieter civilizational resolve. When the Buddha’s relics stood on the verge of being scattered once again under the auctioneer’s hammer, the response was neither impulsive nor theatrical. It was deliberate, methodical, and anchored in the conviction that some inheritances are non-negotiable.
@divs13 writes a very interesting piece in today's @IndianExpress
What distinguishes the Piprahwa effort is the depth of its civilizational meaning. The Government of India’s role in this recovery reflects a maturity of approach. The story stands as a record of how modern India negotiates with history—calmly, confidently, and without apology for reclaiming what is rightfully hers. Must Read
#BuddhasRelics
#Piprahwa
#BuddhistHeritage
#HeritageReturns
#NotForAuction
वेनेज़ुएला के संकट पर हायतौबा मची है, इतिहास गवाह है कि सभ्यताओं का उत्थान उनके संसाधनों से नहीं, बल्कि उनके चरित्र से होता है, और उनका पतन बाहरी हमलों से पहले उनके आंतरिक मूल्यों के क्षरण से होता है।
वेनेज़ुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, फिर भी वह असहाय है। यह इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि "संसाधन बिना सामर्थ्य के अभिशाप बन जाते हैं।"
चौदहवीं सदी में इब्न खालदून ने अपनी पुस्तक 'मुकद्दिमा' में लिखा था कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी 'असाबिया' (सामाजिक एकजुटता और सामूहिक संकल्प) में होती है। जब कोई समाज विलासिता में डूब जाता है और केवल अपने संसाधनों पर निर्भर हो जाता है, तो वह अपना 'पौरुष' खो देता है।
16वीं शताब्दी का स्पेनिश साम्राज्य। अमेरिका से लूटे गए सोने और चांदी के भंडार के बावजूद स्पेन का पतन हो गया, क्योंकि उन्होंने उत्पादन और उद्यम के बजाय केवल संपदा पर निर्भर रहना चुन लिया था। वहीं, संसाधनों की कमी के बावजूद ब्रिटेन और नीदरलैंड अपनी उद्यमशीलता (Entrepreneurship) के बल पर आगे निकल गए।
"लोहा सोने से अधिक शक्तिशाली है, क्योंकि जो लोहे पर नियंत्रण रखता है, वह अंततः सोने का भी मालिक बन जाता है।" — मैकियावेली ने कहा था,
यह तर्क कि "शक्ति केवल अस्तित्व बचाने के लिए होनी चाहिए," चाणक्य ने 'मंडल सिद्धांत' में स्पष्ट किया था कि एक राजा को हमेशा शक्तिशाली होना चाहिए, क्योंकि एक कमजोर राष्ट्र अपने पड़ोसियों के लिए केवल एक 'भोज' के समान होता है।
इतिहास बताता है कि भारतीय राजाओं के पास अपार संपदा और वीरता थी, लेकिन रणनीतिक 'शक्ति संतुलन' और शत्रुओं को समूल नष्ट करने के 'विवेक' की कमी ने उन्हें लंबे समय तक पराधीन रखा।
शांति का अर्थ युद्ध की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि वह शक्ति है जो युद्ध को होने से रोक सके। महान रोमन साम्राज्य के साथ भी यही हुआ था। रोम को किसी बाहरी सेना ने नहीं हराया था; वह तब गिरा जब उसके नागरिक 'Bread and Circuses' (मुफ्त भोजन और मनोरंजन) के आदी हो गए और उनके भीतर का सैन्य अनुशासन खत्म हो गया। जब रोम की सेना में 'बर्बर' (mercenaries) भर्ती होने लगे और रोम के अपने पुरुष विलासिता और आंतरिक राजनीति में उलझ गए, तो दुनिया की सबसे ताकतवर युद्ध मशीन ध्वस्त हो गई।
आज अमेरिका में 'वेलफेयर स्टेट' की मांग और सांस्कृतिक पहचान का संकट इसी ऐतिहासिक ढलान की याद दिलाता है।
कठिन समय शक्तिशाली पुरुषों को जन्म देता है। शक्तिशाली पुरुष समृद्ध समय लाते हैं। समृद्ध समय कमजोर पुरुषों को जन्म देता है। और कमजोर पुरुष कठिन समय लाते हैं।
इतिहास यह सिद्ध करता है कि वेनेज़ुएला जैसे देश संसाधनों के बावजूद 'विवेक और शक्ति' के अभाव में बिखर जाते हैं, और अमेरिका जैसे महासाम्राज्य अपनी शक्ति के अहंकार और 'आंतरिक सांस्कृतिक क्षरण' के कारण खोखले हो जाते हैं।
सभ्यता की सुरक्षा का एकमात्र मार्ग वही है -शक्ति अर्जित करो—दमन के लिए नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, शांति और भविष्य के संरक्षण के लिए।
सुरक्षित अमेरिका भी नही है क्योंकि अमेरिका आज एक अजीब अंतर्विरोध में जी रहा है। दुनिया के सामने Liberal Superpower दिखने की होड़ में वह अपनी सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा के साथ समझौते करता रहा है। Immigration के कारण उत्पन्न हो रही आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को दरकिनार कर, 'मानवतावाद' का मुखौटा पहनना एक 'सामरिक आत्मघाती' कदम साबित हो सकता है। अमेरिका, जो कभी 'मेरिटोक्रेसी' और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतीक था, आज 'वोकइज़्म' के कारण एक वैचारिक द्वंद्व में फंसा है। रणनीतिक दृष्टि से इसे Cognitive Warfare माना जा सकता है, जहाँ समाज के आधारभूत स्तंभों—परिवार, इतिहास और राष्ट्रीय गौरव—को ही समस्याग्रस्त बताकर चुनौती दी जा रही है।
ओसवाल्ड स्पेंगलर ने 'The Decline of the West' में भविष्यवाणी की थी कि पश्चिम का पतन उसकी अपनी ही बौद्धिक विकृतियों के कारण होगा। और वही हो रहा है.,.
#Venezuela #VenezuelaLibre #Trump #IranRevolution