कितनी भी सिद्धियाँ हासिल कर लो, इन्द्रपद पा लो लेकिन यदि संयम जीवन में नहीं है तो कोई लाभ नहीं, आत्मसाक्षात्कार नहीं होगा । संयम जीवन में बहुत आवश्यक है।
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तीन चीज़ें श्राद्ध में प्रशंसनीय हैं:-
एक तो शुद्धि, दूसरा अक्रोध और तीसरा आत्वरिता (जल्दबाजी नहीं)।
तीन चीज़ें श्राद्ध में पवित्र :-
तिल श्राद्ध में पवित्र हैं। बेटी का बेटा श्राद्ध कराता है तो पवित्र माना जाता है और कुतुप काल पवित्र माना जाता है। 11 बजकर 36 मिनट से लेकर 12 बजकर 24 मिनट तक वो विशेष काल माना जाता है।
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#श्राद्ध_महिमा
जिनके घर में श्राद्ध नहीं होता, उनके कुल खानदान में दीर्घ आयुष्य वाली आत्माएं पैदा नहीं होती और सद्बुद्धि वाले छोरे, छोरियां जल्दी पैदा नहीं होते और उनके घर में रोग, कलह, क्लेश बना रहता है। एक ऐसा मंत्र है कि विधि विधान आदि की त्रुटि हो, कमी हो, ना आता हो, तो भी एक ऐसा बढ़िया मंत्र मिला है, जिसमें चार बीज मंत्र हैं-
ओम ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा।
स्वधा देवी पितरों को तृप्त करने में सक्षम हैं और ये चार बीज मंत्र हैं मतलब सॉलिड ! तो पितरों को तृप्ति और सद्गति होनी होनी है। जो भी जिसके निमित्त करेंगे उनको मंगल होगा तृप्ति होगी, बिल्कुल पक्की बात है। सूर्य नारायण को अर्घ्य दे देना अमावस्या को, “हे सूर्य नारायण आप हमारे इस अर्घ्य से प्रसन्न रहो, हम श्राद्ध कर्म में विधि विधान नहीं जानते, आपकी शरण हैं।” अपनी बगल दिखा दो सूर्य नारायण को। मतलब हम शरण हो गए। “आपके पुत्र यमराज हमारे पिता को सुख, शांति दें सद्गति दें।” हे यमराज संयमपुरी के देवता! हमारी दादी मां को … या जो भी मर गए उनको याद करके उनके लिए सद्भाव करके फिर अर्घ्य दो। अबीर, गुलाल, जौ, तिल और दूध मिलाकर तर्पण करते गए, फलाने … जिसकी याद आए वो तृप्त हों, हम उनकी भलाई के लिए अर्पण कर रहे हैं । सद्भाव आपका विकसित होगा और उनको शांति मिलेगी तो उनके भी आशीर्वाद मिलेंगे। आशीर्वाद दें इस लालच से क्यों करें ! उनका भला हो हमको आशीर्वाद मिले ना मिले, गुरु का हाथ है बस चल जाएगा ।
श्राद्ध करते समय भगवत गीता के सातवें अध्याय का महात्म्य पढ़के और फिर सातवें अध्याय का पाठ करके, जिसके लिए तुम श्राद्ध करते हो उसको अर्पण करो तो सद्गति होती है, ऐसा शास्त्र में लिखा है। अपने आश्रमों में अमावस्या के दिन सामूहिक श्राद्ध करवाते हैं, ब्राह्मण को रख के। अकेले बेचारे कितना ब्राह्मण को देंगे कितना खर्चा करेंगे। आश्रम में ही भोजन बनता है, खीर ये, वो सब और सब आके वहां श्राद्ध करवा देते हैं अमावस्या के दिन! जो श्राद्ध आदि सत्कर्म करते हैं तो दशरथ जी करते तो राम जी प्रकट हुए और राम जी भी करते श्राद्ध दशरथ का, तो लव और कुश प्रकट हुए, हनुमान जी को भी बांध के दिखा दिया। तो इससे दैविक शक्तियां विकसित होती हैं।
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मरने के बाद भी हमारा अस्तित्व रहता है इसलिए श्राद्ध कर्म करने वालों को, अपने पूर्वजों का जो श्राद्ध करते हैं, उनके घर में तेजस्वी संतान आती है। धन संपदा और यश बिन बुलाए आते हैं, जिनके यहां श्राद्ध परंपरा नहीं है उनके यहां चिरंजीवी आत्माओं का अवतरण नहीं होता, उनके यहां रुपए पैसे तो आ जाएंगे लेकिन आत्मतृप्ति देने वाला सत्कर्म, शुभकर्म, उत्साह आनंद से नहीं होता है।
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सनातन धर्म की सच्चाई देखना चाहो तो कदम कदम पर ऐतिहासिक ढंग से, साधना के ढंग से, वैदिक ढंग से आपको मिल सकती है। किसी पीर ने या किसी साधु ने या पैगंबर ने, अपनी भावना में आए ऐसा कुछ लिखकर धर्म ग्रंथ नहीं बनाया। यह तो सनातन सत्य है। हिंदू धर्म ने इतनी बड़ी हिम्मत की कि विश्व के और किसी धर्म ने इतना साहस नहीं किया। भगवान को माता के रूप में अगर कोई मानने वाला धर्म है तो वह हिंदू धर्म है। अंबे मात की जय। महाकाली मात की जय। माता में, पिता में, गुरुजनों में, अरे पशु पक्षियों में भी परमेश्वर को देखने की कला अगर विश्व को किसी ने दी तो वो सनातन धर्म ने दी। संपूर्ण वैज्ञानिक कसौटियों से सर्वोपरि अगर कोई धर्म दिखा है तो विज्ञानियों को वैदिक धर्म दिखा है, हिंदू धर्म दिखा है। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:! भारतीय संस्कृति का सनातन धर्म राम और कृष्ण के पहले था और श्री रामचंद्र जी धरती पर 12 वक्त आ चुके हैं, उसके पहले सनातन धर्म था। श्री कृष्ण 16 बार आ चुके हैं, उसके पहले सनातन धर्म था। सभी धर्मों का हम सम्मान, इज्जत करते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति सभी का मूल है और ये वैदिक संस्कृति किसी व्यक्ति की बनाई हुई नहीं है। किसी ऋषि मुनि की बनाई हुई नहीं है। यहां तक कि भगवान राम ने भी नहीं बनाई। राम भी वैदिक संस्कृति की विधि से, यज्ञ से, श्री रामचंद्र जी भी प्रकट हुए। कृष्ण भी वैदिक विधि से पधारे हैं। ये वैदिक विधि परंपरागत सनातन है। तो जो हिंदू धर्म को काटना चाहते हैं, वैदिक विधि को, उनसे हम प्रार्थना करते हैं कि भाई ये मानवता को काटने जैसा है। और उनके प्रति भी हमारी नफरत नहीं है। अगर नफरत होती तो ये ईसाई बच्चा मेरे पास काहे को रहता !
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संसार में फँस मरने के लिए, पशु-योनि में धकेले जाने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ, परमात्म-ज्ञान पाकर मुक्ति का अनुभव करने के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है ।
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अब आप समझना हिंदू धर्म की महानता। ये हमारा स्थूल शरीर है, 27 तत्वों का होता है । जब ये स्थूल शरीर मर जाता है तो सूक्ष्म शरीर रह जाता है 17 तत्वों का। उसमें पृथ्वी तत्व और जल तत्व नहीं होता बाकी वायु, तेज और आकाश तत्व होता है। उसको बोलते हैं प्रेतात्मा। मृतक हुआ और प्रेत कर्म करो। उन्होंने जो देखा है, खाया है, भोगा है। स्थूल शरीर उनके पास नहीं है लेकिन ख्वाइशें तो अंदर होती हैं तो घूमते रहते हैं तो वर्ष में एक दिन, हमारा एक वर्ष बीतता है तो पितृ लोक का एक दिन होता है तो पितृ लोक में तो उनको पहुंचने की गति हुई न हुई तो घूमते रहते हैं तो जब #श्राद्ध_पक्ष आता है, प्रत्येक महीने में भी श्राद्ध कर सकते हैं लेकिन अभी जो श्राद्ध पक्ष आया उसका प्रभाव विशेष होता है।
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