समाहरणालय सभागार मे आयोजित जिला आपदा प्रबंधन समिति की बैठक में विभिन्न दुर्घटनाओं से सम्बन्धित 30 मामलों पर बिंदुवार चर्चा करते हुए समिति सदस्यों के सर्व सहमति से मृतक के आश्रित को अनुग्रह अनुदान राशि स्वीकृत करने का निर्णय लिया गया।
@HemantSorenJMM@prdjharkhand@sp_saraikela
दादाजी चल बसे #मुआवजा और #नियोजन के लड़ाई में , पिताजी भी जिंदगी को अंतिम पड़ाव पे है ,अब बेटा लड़ रहा है । तीन पीढियां बर्बाद हो गई इस लड़ाई में आखिर कबतक लड़ेंगे । जमीन हमारा और हमारे लोगों पे ही जुल्म ।
#JairamMahto
शेड्यूल 5 में जो 17,986 घर बने है क्या ये घर मूल रैयतों की है जिसको मालिकाना हक़ दिलाने की बात एक पुर्व सीएम और मंत्री करते है? अगर इनको लीज एरिया से बाहर किया जा रहा तो इस जमीन को मूल रैयतों को लौटाना चाहिए। जब नीति बनी थी की जो ज़मीन उद्योग में जमीन उपयोग नहीं होगी उसे मूल रैयतों को लौटा दिया जायेगा तो फिर अलग से नियम बना कर ज़मीन में अवैध कब्ज़ाधारियों को मालिकाना हक़ क्यों दिया जा रहा है?
आज झारखण्ड समेत पूरा देश मंईयां सम्मान की इस ऐतिहासिक योजना का गवाह बनेगा। झारखण्ड की मेरी हर बहना को हर साल मिलेगा मान, सम्मान और स्वाभिमान का ₹30 हजार। इस शुभ अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं और जोहार।
जय मंईयां!
जय जोहार!
जय झारखण्ड! https://t.co/Njab1CuFv5
"झारखण्ड मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना" के तहत बहन-बेटियों को खुशियों का उपहार प्राप्त हो रहा है। साथ ही
हर मंईयां के खाते में हर माह ₹2,500 और साल के ₹30,000.....
@JharkhandCMO@HemantSorenJMM@prdjharkhand
आज आपको मंईयां सम्मान योजना का लाभ मिला है, पेंशन का लाभ मिला है, बिजली का बकाया बिल भी माफ हो रहा है। आपके इस भाई और बेटे ने संकल्प लिया है कि जब तक हम गांव को मजबूत नहीं करेंगे, यह राज्य मजबूत नहीं हो पायेगा। उसी लक्ष्य के साथ हम आगे बढ़े हैं।
पूर्व की डबल इंजन भाजपा सरकार के पास गरीबों को पैसा देने के लिए पैसा नहीं था, बुजुर्गों को पेंशन देने के लिए पैसा नहीं था, महिलाओं को सम्मान देने के लिए पैसा नहीं था, किसानों का कर्जा माफ करने के लिए इनके पास पैसा नहीं था; लेकिन बड़े-बड़े अरबपतियों का कर्जा माफ करने के लिए इनके पास पैसा था।
बेटी, हम शर्मिंदा हैं कि झारखंड की यह निकम्मी सरकार और उसके नकारा स्वास्थ्य मंत्री तुम्हें चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं करवा पाये।
हमें अफसोस है कि राज्य बनने के 24 साल बाद भी, इस राज्य की सरकारों की प्राथमिकता सूची में हम आदिवासी, हमारा स्वास्थ्य और हमारे मुद्दे कहीं नहीं दिखाई देते।
यह शर्मनाक है कि हर दूसरे दिन ऐसी रिपोर्ट्स आने के बावजूद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बेफिक्र और मुख्यमंत्री बेपरवाह दिखते हैं, क्योंकि उन्हें चुनाव में आदिवासियों से ज्यादा उनके राजनीतिक समीकरणों पर भरोसा है।