जबलपुर जिले से दमोह जिले जाने के लिए मैंने आज दिनांक 09-06-2025 को “नूरी ब्रदर्स ट्रांसपोर्ट कंपनी दमोह” की एसी नॉन स्टॉप बस में यात्रा की।बस चालक व कंडेक्टर द्वारा बस की मानक क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाया गया था।
जिसके कारण रिजर्व्ड टिकट के यात्रियों को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। चालक द्वारा इस कृत्य के किए जाने से उसने ना केवल मोटर यान अधिनियम के तहत कानून का उल्लंघन किया अपितु तमाम यात्रीगणों की जान जोखिम में डाला गया।
अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम
दास मालूका कह गये सबके दाता राम
अर्थात्
इससे काम नहीं चलेगा
कर्मयोग तो बनना पड़ेगा।
वर्तमान में बहुतेरे इस प्रवर्ती के मिल जाएँगे विशेषकर अंधभक्त 😝
नमस्ते दोस्तों 2 दिन के अवकाश के बाद फिर मिलेंगे...और लड़ेंगे..
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हम लड़ेंगे तब तक जब तक
कि आदिवासी भाई पर
पेशाब की जाती है
खिल हुए सरसों के फूलों को
बीजने वाले जब तक ख़ुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
जंग से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने ही भाइयों का गला दबाने के लिए विवश हैं
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में सच के लिए लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है...
‘’हम लड़ेंगे साथी..
जब बंदूक़ न हुई, तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ तो सच के लिए
लड़ने की ज़रूरत होगी लेकिन हम लड़ेंगे साथी‘’
मोदी सरकार ने रेलवे को तहस-नहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी !
🚉बालासोर जैसे बड़े हादसे होने के बाद, बहुप्रचारित "कवच" सुरक्षा का एक भी किलोमीटर नहीं जोड़ा।
🚉आम Sleeper Class से रेल यात्रा करना हुआ बहुत महंगा, Sleeper Coach भी घटाएं।
🚉इस साल 10% से ज़्यादा ट्रेनें हुई लेट।
रेल बजट ख़त्म कर, के मोदी सरकार ने जवाबदेही से छुटकारा पा लिया है।
मोदी जी केवल वाहवाही बटोरने के लिए, सफ़ेद रंग दी गई ट्रेनों को हरी झंडी दिखाने के PR Stunt में व्यस्त हैं !
पर आम जनता की सुरक्षा, सुविधा, सहूलियत और राहत पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं दे रहें हैं।
पहले इस्तीफ़ा, फिर किताब :
राहुल गांधी पर सच लिखना कितनी मुश्किलें खड़ी करेगा, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था। ऐसे समय जब सत्ताधीशों पर गाथा-पुराण लिखने की होड़ लगी हो, मैंने सोचा था कि एक लोकनीतिक विचारक की सोच, दृष्टि और दृढ़ता को संकलित कर प्रस्तुत करना किसी को क्यों परेशान करेगा? लेकिन मैं ग़लत साबित हुआ। लिखना और व्यक्त करना हमारा काम है। लेकिन इसी के विस्तार से अचानक कंपनी की धड़कनें बढ़ गईं। मेरे पास विकल्प था कि मैं किताब वापस ले लूं। नौकरी करता रहूं। चुप रहूं। लेकिन, मैंने किताब को चुना। जो हमारा बुनियादी काम है, उसको चुना। सच कहने को चुना। इसलिए, पहले इस्तीफ़ा, फिर किताब।
यह किताब असल में न्यूज़रूम के हर उस समझौते का प्रायश्चित है, जिसने छापा नहीं, छिपाया। इसमें राहुल गांधी के ख़िलाफ़ 2011 से शुरू हुए दुष्प्रचार की तथ्यात्मक कहानी और ठोस प्रतिवाद है। किस तरह से मीडिया ने लोकतंत्र में अपनी परंपरागत और गौरवशाली विपक्ष की भूमिका से पलटते हुए न केवल सत्ता के साथ जाना स्वीकार किया, बल्कि विपक्ष यानी जनता की प्रतिनिधि आवाज़ को जनता से ही दूर करने, उसकी छवि को ध्वस्त करने की पेशागद्दारी की। न्यूज़रूम और दुष्प्रचारी IT सेल के अंतर को मीडिया ने मिटा दिया। यह किताब साम्प्रदायिकता, दुष्प्रचार और तानाशाही के खिलाफ राहुल गांधी के संघर्ष का विश्लेषण है।
संवैधानिक संस्थाओं पर केंद्र का क़ब्ज़ा, अन्ना हजारे के साथ मिलकर केजरीवाल की प्रोपेगेंडा राजनीति का चक्रव्यूह, पाठक इसमें आसानी से समझ सकते हैं। यह किताब हालिया इतिहास में लोकतंत्र और संविधान पर हुए हमलों को सिलसिलेवार 11 अध्यायों में बताने का सहज प्रयास है।
आप पढ़िएगा और बताइएगा कि हिंदुत्व की राजनीति में मॉब लिंचिंग की स्थापना, झूठ और दुष्प्रचार की प्रभुसत्ता, हिंदू संप्रदायवाद का नया राष्ट्रवाद बनना, लोकतंत्र से लोकतांत्रिक मूल्यों का विलोपन… ये भारत पर खरोंच हैं जो कुछ समय में ठीक हो जाएंगी या यह एक दशक का सत्तानीतिक ‘सांविधानिक विकास’ है, जिसके निदेशक तत्व आज भारत को चला रहे हैं और दशकों तक चलाएंगे।
क्या पढ़े लिखे लोगों को वोट देने की अपील करना अपराध है? यदि कोई अनपढ़ है, व्यक्तिगत तौर पर मैं उसका सम्मान करता हूँ। लेकिन जनप्रतिनिधि अनपढ़ नहीं हो सकते। ये साइंस और टेक्नोलॉजी का ज़माना है। 21वीं सदी के आधुनिक भारत का निर्माण अनपढ़ जनप्रतिनिधि कभी नहीं कर सकते।
जरूरत है ऐसे लोगो की जो लोगो की आवाज को सरकार के समक्ष प्रस्तुत कर सके।
लोगो ने जिन्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में पहुंचाया वे केवल मात्र अपना राजनैतिक भविष्य सुनिच्चित् करने के लिए है।
आखिर कब आप हाथो की चूड़ियाँ व मेहंदी उताकर धरातल में आयेंगे।
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