@GaganPratapMath सर हम ताकतवर इस लिए नहीं हैं क्योंकि सारा युवा तो सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहा और सभी शिक्षक उसे अफसर बनाने में लगे हैं। नवाचार तो खत्म किया है सरकारी नौकरी के सपने ने
स्त्री की तुलना नर्क के द्वार से की गई,कभी पूछो इनसे कि सोचा है यदि तुम्हारी तुलना करने का मौका मिला तो वो क्या हो सकता है,
शायद कुछ भी नहीं क्योंकि तुलना उसकी होती है जो जीवित है,पर तुम तो मरे हुए हो अपने विचारों से व्यक्तित्व से और अपने कर्मों से।
बाहरी दुनिया को दिखता शांत मन विचारों की बाढ़ से तर–बतर है,एक के बाद एक मानों कोई द्वंद चल रहा हो और उन्हें हराने का डर हो आने वाले विचार से,
समय और शब्द दोनों की सीमाओं को पकड़ पाना नामुमकिन होता जा रहा है,और मन भी इतना भार उठाने के लिए अभी तैयार नहीं है, कहीं ये कमज़ोर तो नहीं।
तुम्हे स्वतंत्रता चाहिए जबकि पता भी नहीं कि किस स्वरूप में चाहिए, हां माना की उन्हें मिली थी स्वतंत्रता तो उन्होंने अपने हिसाब से उसकी परिभाषा बना ली पर तुम भी तो उसी परिभाषा को उतारना चाहती हो, कहां तुमने कोई अलग परिभाषा बनाई है।
कुछ नया चाहिए जो उन्हें भी इस रास्ते पर ले आए।
जिम्मेदार तुम भी हो ठीक उतनी ही जितने वो, भला कैसे कोई काम या आचरण एक पक्ष से हो सकता है पर तुमको कहा मानना है तुम तो हो ही कमज़ोर, मारी हुई, बेचारी, असहाय और जरूरत पड़ने पर इस बात का खूब फायदा उठाना सीख लिया है तुमने।
तुम ऐसे ही रहोगी,
यदि ऐसी ही रही तो।
प्रेम वो चेतना है जो व्यक्ति को उत्साहित और आत्मविश्वासी रखती है, प्रेम कोई उत्सव नहीं अपितु संपूर्ण जीवन है, जब प्रेमी की उपस्थिति मात्र ही आपको जीवन कि संपूर्णता की ओर ले जा रही हो भले ही उससे मिलन संभव न हो,प्रेम है।कभी भी प्रेम में दोनों पक्ष की पूर्णता जरुरी नहीं होती।
तुमने महसूस की है वो गंध जो लगातार निकलती है तुमसे और जिसने स्त्री को होश में न आने वाली स्थिति में रखा हुआ है,
जिस दिन आसपास का वातावरण ज्यादा शुद्ध होगा ये गंध स्वतः समाप्त हो जाएगी फिर क्या करोगे तब तो तुम जी भी नहीं पाओगे,क्योंकि बस यही तो है जो तुमको जिंदा रखी हुई है।
फ़िल्में समाज का दर्पण होती हैं इस बात में अब शायद सच्चाई कम हो गई है क्योंकि अब फिल्में ही समाज का निर्माण कर रही हैं,
पर्दे के कलाकार समाज को आईना दिखा रहे,जो एक समय समाज का प्रतिबिंब हुआ करते थे ।
अतः वर्तमान में समाज की दिशा और दशा का पथप्रदर्शक सिनेमा है।
एक छोटे से बच्चे की परवरिश की सारी जिम्मेदारी स्त्री की होती है,जिसका अर्थ है कि उसे बहुत ज्यादा अनुभवी होना चाहिए पर यहां सब उलट है,स्त्री घर में बंद है और उसकी सुरक्षा का बेरंग चोला पहने पुरुष उसे शक्ति प्रदान करने की बात कर रहे हैं,जिसका पूरा प्रतिबिंब बच्चे पर प्रतिबिंबित है।
अनेक रंगों को एक साथ जोड़ता हुआ तिरंगा शांति ,उत्साह ,एकता ,भाईचारा और प्रकृति प्रेम को संजोए हुए खुले आसमान में स्वच्छंदता से कुछ इस तरह लहरा रहा है कि उसे निहारना बड़ा ही सुखद अनुभव है जिसे शब्दों में उतरना थोड़ा मुश्किल है।तिरंगा और उसे थामा हुआ हर व्यक्ति यूं ही आबाद रहे।🇮🇳
टेबल पर बैठे थे सामने एक खुला संसार था जिसके रंग बिरंगे स्वरूप को देख और अनुभव कर रहे थे और तभी धूमिल होती स्मृति पुनः वापस आ गई और सारे रंग बेरंग हो गए , आंसुओं की धारा बहने लगी , इसका कारण था कि ये संसार हमारा नहीं था इस संसार में जो हमारा था अब वो नहीं है ।
सामाजिक होने के लिए बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि पढ़ा–लिखा होना चाहिए,क्योंकि पढ़ें लिखे बहुत सारे लोग सामाजिक स्तर पर मरे हुए होते हैं,जिनकी सोचने–समझने की क्षमता समाप्त हो चुकी होती है,और मन विछिप्त हो चुका होता है अतः पढ़े–लिखे पर मरे हुए समाज से बेहतर है अनपढ़ और समझदार समाज।
तुम मुझे अपनी शक्ति, ताकत , पहचान या पैसों से नहीं लुभा सकते, तुम्हारी ये सारी ताकतें अचानक समाप्त हो जाएंगी जब कभी तुम बैठोगे घोर अंधेरे में अपने आप को लेकर , और पाओगे कि तुम हारे हुए हो खुद से , मेरे से , और सब से।
और बहते आंसु पुष्टि करेंगे हारी जिंदगी की।
सोच –
मैं सोच रहा हूँ कि मैं दुःखी हूं, मैं सोच रहा हूं कि मैं परेशान हूं , मैं सोच रहा हूं कि कष्ट में हुं , मैं सोच रहा हूं कि चोटों से घिरा हुआ हूं , मैं सोच रहा हूं कि सब कुछ खराब है या होने वाला है।
अब मैने सोचना बंद कर दिया और मैं स्थिर और खुश हूं ।
सत्य है हमारे चारों तरफ, इसकी उपस्थिति अपने होने का अहसास नहीं कराती क्योंकि इसका कोई रूप , रंग , आकार नहीं होता और क्यों है ये भी समझना आसान नहीं है।
पर वहीं असत्य हमें खोजना पड़ता है हर बार, और हमारा समय भी उसे ही दूर रखने में जाता है अर्थात् हमारी खोज असत्य की है न कि सत्य की।