@thekiranbedi The nepal tragedy is not just one. There are lots of coming and @Advait_Prashant awaring about this from last 20 years.
In today's world @Advait_Prashant is the last hope to save this world.
We all need to join him.
With warming of the earth due to unrestricted exploitation and abuse—or use of it out of compulsions of increasing population in greed or need of development of infrastructure
It’s not the flood but—-
Glaciers every where, which will crack and break and fall below—-Causing obstructions in rivers below.
Sweeping away all below.
It can now be anywhere and every where.
Humanity is at risk. Whoever survives only nature know. Listen to @Advait_Prashant
नेपाल: बाढ़ कैसे आई? || आचार्य प्रशांत https://t.co/ij9s6Wla01 via @YouTube
कल बहन की बेटी ने मुझे कॉल किया। उससे बात करते हुए ध्यान गया कि मेरा जीवन कितना बदल गया है। तो सोचा, जो याद आया है, उसे थोड़ा लिख ही देती हूँ।
कितनी बड़ी लोकधार्मिक गटर में थी मैं - और आचार्य जी मुझे वहाँ से कहाँ ले आए हैं।
मुझे फरवरी 2018 का गोवा शिविर याद है। पहली बार आचार्य जी के सामने बैठी थी। सत्र में उन्होंने पूछा, *“क्या चल रहा है?”*
मैंने तुरंत जवाब दिया - *“शांति।”*😭
अभी हँसी आ रही है। मूर्ख मैं!
फिर उसके बाद जो शुरू हुआ, वो लंबे समय तक कुछ ऐसा ही था -
*सत्र सुनो, रोओ।*
*फिर सत्र सुनो, फिर रोओ।*
क्योंकि जिस दुनिया को मैं सच मानकर जी रही थी, वो धीरे-धीरे टूट रही थी।
कितनी काल्पनिक दुनिया थी मेरी।
और आचार्य जी रोज़ थोड़ा-थोड़ा आईना दिखाते गए।
और एक बात मेरे लिए बहुत-बहुत बड़ी रही - *कबीर साहब, “कबीर (साहब)” नहीं, साहब हैं।*
पहले मैं बड़ी आसानी से “कबीर (साहब)” बोलती थी और साथ में कहती थी कि मैं उनके भजन गाती हूँ।
आचार्य जी ने दिखाया कि जिन्हें मैं बस नाम से पुकार रही हूँ, उनकी ऊँचाई का मुझे अंदाज़ा ही नहीं है।
ये मेरे लिए भाषा का छोटा-सा सुधार नहीं था।
*ये पहली बार समझ में आना था कि कबीर साहब, साहब क्यों हैं।*
संस्था में मैंने काम volunteering से शुरू किया था। लेकिन एकदम सीधी बात कहूँ तो volunteering और Greater Noida आकर full-time काम करने के बाद के मेरे जीवन में भी बहुत बड़ा अंतर है।
अभी पुरानी photos खोज रही थी तो वो फर्क आँखों के सामने दिख रहा था।
*दिन में संस्था में काम।*
*और रात में आचार्य जी के सामने बैठकर सत्र।*
*ये मुझे मिला है।*
*कोई बाहर से देखकर कैसे जानेगा कि मुझे क्या मिला है?*
असल में काम क्या होता है, ये भी यहाँ आकर जाना।
सिर्फ task पूरा करना काम नहीं होता। काम में कितनी ईमानदारी चाहिए, कितनी स्पष्टता चाहिए, अपनी सुविधा और डर कितनी बार बीच में आ जाते हैं, ये सब यहीं दिखाई दिया।
*जो भी आचार्य जी से सीखते हैं, वो काम के ज़रिए तुरंत दिखाई देता है। अपने काम में ही दिख जाता है कि अहंकार सुधार का काम कैसा चल रहा है।*
और सीखना अभी बहुत बाकी है।
2023 के महोत्सव में हमें हजार लोगों के सामने skits perform करनी थीं।
और मैंने पाया कि stage पर मैं बहुत सहज थी - न डर था, न वैसी हिचकिचाहट जैसी पहले हुआ करती थी।
मैं ऐसी बिल्कुल नहीं थी कि इतने लोगों के सामने stage पर जाकर सहजता से perform कर लूँ।
उस समय मेरे लिए ये बहुत साफ़ था - *ये आचार्य जी के बिना हो ही नहीं सकता था।*
इन दिनों HIDP चल रहा है। ये भी मेरे लिए बहुत अलग अनुभव है।
आचार्य जी हमें सिखाते हैं, और फिर हमें वही बात बाकी गीता स्टूडेंट्स के साथ activities के माध्यम से देखनी और करवानी होती है।
HIDP में दुनिया में क्या चल रहा है, वो तो सामने आता ही है - लेकिन उससे ज्यादा मेरे भीतर क्या-क्या बैठा हुआ है, वो सामने आता है।
कहाँ judgement है।
कहाँ hesitation है।
कहाँ मैं पहले से निष्कर्ष लेकर बैठी हूँ।
कहाँ सिर्फ जानकारी है, समझ नहीं।
आचार्य जी मुझे एक काल्पनिक दुनिया से निकालकर ऐसी जगह ले आए हैं जहाँ अब *बेईमानी दिखने लगी है, आलस दिखने लगा है, अपने बहाने दिखने लगे हैं।*
*अब बात नीयत की है।*
हाँ, बहुत कुछ होगा जो मुझे अभी भी दिखाई नहीं देता होगा।
लेकिन आज पीछे देखकर इतना साफ़ है कि जहाँ मैं थी और जहाँ आज खड़ी हूँ, उसमें बहुत-बहुत बड़ा अंतर है।
*अब एक ही प्रार्थना है कि आप जो आईना दिखा रहे हो, उस आईने से नज़र न चुराऊँ।*
*आचार्य जी 🙏*
#AcharyaPrashant #HIDP
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